लेख

अंधकार को चीरकर सतोगुण का मार्ग प्रशस्त करने वाले भगवान कल्कि

-अशोक “प्रवृद्ध”

सनातन धर्म की काल गणना और ऐतिहासिक दर्शन में अवतारवाद केवल एक धार्मिक विश्वास नहीं, अपूर्णता से पूर्णता की ओर अग्रसर होने का एक गत्यात्मक सिद्धान्त है। श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय के प्रसिद्ध श्लोक -यदा यदा ही धर्मस्य…, से संपुष्ट यह परम्परा युग संधियों पर चेतना के अवतरण को रेखांकित करती है। दशावतार परम्परा के नौ सोपान अतीत और वर्तमान के क्रमिक विकास, अधर्म के उन्मूलन और धर्म के संस्थापन के साक्षी रहे हैं, किन्तु इस परम्परा का दसवां और अन्तिम सोपान- कल्कि अवतार, भविष्योन्मुखी है। यह काल के चरम ह्रास अर्थात कलियुग के अवसान और एक नवीन, निष्पाप युग अर्थात सत्ययुग के प्राकट्य का संधि बिन्दु है। 

कल्कि शब्द की व्युत्पत्ति और इसका दार्शनिक अर्थ इसके प्रयोजन को स्पष्ट करता है। संस्कृत व्याकरण और कोष ग्रंथों के अनुसार कल्क शब्द का अर्थ मल, पाप, पंक या अज्ञान होता है। जो इस कल्क अर्थात पाप, मल का समूल नाश करता है, वह कल्कि अर्थात कल्कं यति, नाशयति इति कल्कि है। अमरकोष के अनुसार कल्कि को विष्णुयशा और कलिनाशक कहा गया है। यह नाम उस दैवीय ऊर्जा का प्रतीक है, जो कलियुग के अंधकार को चीरकर सतोगुण का मार्ग प्रशस्त करेगी। कल्कि अवतार का अभिन्न अंग उनका श्वेत अश्व देवदत्त है। वैदिक प्रतीकात्मकता में अश्व को गति, ऊर्जा और समय (काल) का प्रतीक माना गया है। अतः कल्कि का अश्वारूढ़ स्वरूप यह दर्शाता है कि यह अवतार काल की गति को तीव्र कर अधर्म का संहार करेगा।


 कल्कि अवतार का वर्णन किसी एक विशिष्ट ग्रंथ तक सीमित नहीं है, अपितु इसका ताना-बाना महाभारत से लेकर अष्टादश पुराणों तक विस्तृत है। महाभारत के वनपर्व अध्याय 188-189 में महर्षि मार्कण्डेय युधिष्ठिर को कलिदोष और कल्कि के प्राकट्य का विस्तृत विवरण देते हुए कहते हैं-

ब्राह्मणः शम्भलग्रामे विष्णुयशा नाम द्विजन्मा उत्पत्स्यते… कल्किर्विष्णुयशा नाम द्विजः कालप्रचोदितः।
यहां स्पष्ट उल्लेख है कि शम्भल ग्राम में विष्णुयशा नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण के गृह पर कल्कि का प्राकट्य होगा। वे अपनी आत्मशक्ति और क्षत्रिय पराक्रम से म्लेच्छों और आततायियों का अंत करेंगे।
भागवत पुराण के प्रथम, द्वितीय और द्वादश स्कंध में कल्कि का प्राकट्य काल और उनके स्वरूप का सविस्तार वर्णन है। द्वादश स्कंध के द्वितीय अध्याय में शुकदेव जी कहते हैं-
शम्भल ग्राममुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः।
भवने विष्णुयशसः कल्किः प्रादुर्भविष्यति ।।

-भागवत 12/2/18
भागवत के अनुसार जब सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति एक साथ पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करेंगे, तब सत्ययुग का प्रारम्भ होगा और उसी काल संधि पर भगवान कल्कि का अवतार होगा। वे देवदत्त नामक शीघ्रगामी अश्व पर आरूढ़ होकर अपनी कराल करवाल (तलवार) से दुष्टों का दलन करेंगे।
विष्णु पुराण के चतुर्थ अंश अध्याय 24 में भी इसी तथ्य की पुष्टि होती है। पराशर मुनि कहते हैं कि कलि के अंत में पाषंडियों की वृद्धि होने पर, धर्म की रक्षा के लिए भगवान अपने अंशांश रूप में अवतरित होंगे। वे अष्ट सिद्धियों से युक्त होकर पृथ्वी को दुष्टों से मुक्त करेंगे और मनुष्यों के चित्त में सत्वगुण का बीजारोपण करेंगे।
 
मार्कण्डेय ऋषि द्वारा कथित माना जाने वाला कल्कि पुराण पूर्णतः इसी अवतार को समर्पित है। यह ग्रंथ तीन प्रभागों में बंटा है, जो अवतार के जन्म, विवाह (पद्मा और रमा से), युद्ध, दिग्विजय और अंततः वैकुंठ प्रस्थान की कथा को समाहित करता है। इसमें बौद्ध, जैन और म्लेच्छ शक्तियों, जो उस काल में धर्म विरोधी प्रवृत्तियों के प्रतीक माने गए के साथ कल्कि के वैचारिक और भौतिक संघर्ष का प्रतीकात्मक चित्रण है।

कल्कि अवतार के सम्बन्ध में पौराणिक ग्रन्थों में विशद व विविध वर्णन अंकित हैं। मत्स्य पुराण में पिता विष्णुयशा (ब्राह्मण) वाहन- अश्व, आयुध-  खड्ग और वैशिष्ट्यता- म्लेच्छों का संहार, युग परिवर्तन कहा गया है। अग्नि पुराण में पिता विष्णुयशा वाहन- अश्व, आयुध धनुष-बाण और वैशिष्ट्य वर्णसंकरता का अंत, सदाचार स्थापना कहा गया है। वायु पुराण में पिता प्रमति (समानार्थी नाम) वाहन- अश्व, आयुध- अस्त्र-शस्त्र और वैशित्य 20 वर्ष की आयु में दुष्टों का शमन कहा गया है। लिंग पुराण में पिता विष्णुयशा, आयुध चक्र, खड्ग वैशिष्ट्य धर्म के ह्रास को रोककर सतयुग लाना बताया गया है।


कल्कि अवतार के संदर्भ में शम्भलग्राम का उल्लेख अपरिवर्तनीय है। इस स्थल को लेकर शोधकर्ताओं में दो प्रकार के मत हैं- भौगोलिक दृष्टिकोण और आध्यात्मिक दृष्टिकोण। पहले मत वालों के अनुसार उनके अवतरण के तीन संभावित क्षेत्र -उत्तर प्रदेश का संभल, ओड़िशा का शम्भलपुर और तिब्बती बौद्ध परम्परा माना जाता है। वहीं आध्यात्मिक दृष्टिकोण वालों के अनुसार यह हृदय का विशुद्ध चक्र, शांति एवं शम की स्थिति व चेतना की उच्चतम अवस्था का प्रतीक है। भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मुरादाबाद मंडल में स्थित संभल अथवा ओड़िशा के कुछ क्षेत्रों को इसका लौकिक केंद्र माना जाता है। तिब्बती बौद्ध परंपरा में भी शम्भला को एक रहस्यमयी, गुप्त साम्राज्य माना गया है, जहां काल चक्र तंत्र सुरक्षित है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से शम् का आध्यात्मिक अर्थ है -शांति और भल का अर्थ है -रक्षा करना या लाना। अर्थात- वह स्थान या चेतना की वह अवस्था, जहां पूर्ण शांति (शम) का वास हो। मानव शरीर के संदर्भ में इसे विशुद्ध चक्र या अनाहत चक्र की उस अवस्था से जोड़ा जाता है, जहां से चेतना का ऊर्ध्वारोहण होता है।
पौराणिक आख्यानों की एक अनूठी विशेषता यह है कि वे कालखंडों को आपस में जोड़ते हैं। कहा गया है कि कल्कि अवतार में पूर्व युगों के महापुरुष और अमर आत्माएं अर्थात चिरंजीवी उनके सहायक के रूप में पुनः सक्रिय होंगे। कल्कि पुराण के अनुसार भगवान परशुराम कल्कि के अस्त्र-शस्त्र के गुरु होंगे। वे उन्हें महेंद्र पर्वत पर अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा और शिव-दत्त संहारक आयुध प्रदान करेंगे। यह त्रेतायुग और कलि-अंत का महामिलन है। कृपाचार्य, अश्वत्थामा, व्यास और हनुमान सभी चिरंजीवी दुष्टों के विरुद्ध होने वाले धर्मयुद्ध में कल्कि की सेना का मार्गदर्शन करेंगे। सूर्यवंश के राजा मरु, जो कलाप ग्राम में तपस्यारत हैं और चंद्रवंश के राजा देवापि को कल्कि पुनः स्थापित करेंगे, जिससे सतयुग में पुनः सूर्यवंश और चंद्रवंश की मर्यादा का उदय होगा।

कल्कि अवतार के स्वरूप को समझने के लिए इसे केवल एक सशरीर योद्धा के रूप में देखना संकुचित दृष्टिकोण होगा। इसके रूपकात्मक एवं प्रतीकात्मक आयाम का सत्यान्वेषण यह संकेत देता है कि कलियुग की बुराइयां -लौभ, काम, क्रोध, पाखंड ही वे असुर हैं जिनका वध होना है। श्वेत अश्व शुद्ध मन और नियंत्रित इन्द्रियों का प्रतीक है। उद्यत खड्ग (चमकती तलवार) विवेक और ज्ञान की तलवार, जो अज्ञान के अंधकार को काटती है। राजा शशध्वज से युद्ध भक्ति और शरणागति का रूपक है, जहां अंततः राजा कल्कि के प्रति समर्पित हो जाता है।
पुराणों में कलियुग के लक्षणों का जो वर्णन मिलता है, जैसे- शासकों का कर शोषक होना, वेदों का लुप्त होना, सदाचार का ह्रास, पर्यावरण संकट, वह आज के वैश्विक परिदृश्य से अत्यधिक मेल खाता है। कल्कि अवतार इस सामाजिक अराजकता के विरुद्ध एक महाक्रांति का प्रतीक है, जो न्याय पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना करता है। यह अवतार महान चक्र या महायुग के अंत का सूचक है। यह भौतिकी के एंट्रोपी (अव्यवस्था की वृद्धि) के सिद्धांत और उसके बाद होने वाले बिग क्रंच या पुनर्गठन के सिद्धांत के आध्यात्मिक समतुल्य है।
कल्कि अवतार केवल भविष्य के गर्भ में छिपा कोई चमत्कार मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना के भीतर निरंतर चलने वाला एक आत्म साक्षात्कार का युद्ध है। जब-जब मनुष्य के भीतर का कलि (तमोगुण) प्रबल होता है, तब-तब उसे परास्त करने के लिए विवेक रूपी कल्कि (सतोगुण) को जाग्रत करना अनिवार्य हो जाता है। स्पष्ट है कि कल्कि अवतार निराशा में आशा का, विनाश में सृजन का और अंधकार में परम प्रकाश का दैदीप्यमान उद्घोष है। यह सनातन संस्कृति की उस अटूट जिजीविषा का प्रमाण है जो मानती है कि अधर्म चाहे कितना भी सघन क्यों न हो, अंततः विजय धर्म की ही सुनिश्चित है।

शाश्वत सत्य है कि दृश्य जगत नश्वर हो सकता है, परंतु नैतिक मूल्य और ईश्वरीय न्याय अपरिवर्तनीय हैं। दशावतार परम्परा में विष्णु का कल्कि अवतार मानवता को निराशा के गहन गर्त से निकालकर आशा के स्वर्णिम आलोक की ओर ले जाने वाला अंतिम आश्वासन है। यह अवतार हमें सिखाता है कि अंधकार चाहे कितना भी सघन और सर्वव्यापी क्यों न हो, सत्य के निष्कलंक तेज की एक सूक्ष्म किरण भी उसका अस्तित्व समाप्त करने के लिए पर्याप्त है। कल्कि का आगमन काल की गति का नियमन है, जो यह विश्वास दिलाता है कि हर विनाश के गर्भ में एक नूतन, दिव्य और भव्य सृजन की रूपरेखा सुरक्षित रहती है।