राजनीति

डोनाल्ड ट्रंप को क्यों भा गया भारतीय निर्वाचन आयोग ?


सौरभ वार्ष्णेय
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो भारत के साथ टैरिफ पर टैरिफ खेल रहे थे अचानक युद्व छोड़कर भारत की चुनाव व्यवस्था और मतदाता पहचान प्रणाली यानी भारतीय निर्वाचन आयोग को पंसद कर रहे हैं। ज्ञात रहे कि हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी चुनाव व्यवस्था की तुलना भारतीय चुनाव मतदाता पहचान प्रणाली से की है। ट्रंप ने भारत के विशाल चुनावी तंत्र, फोटो पहचान-पत्र की व्यवस्था और सीमित डाक मतपत्र व्यवस्था को अमेरिका के लिए उदाहरण के रूप में पेश किया। उन्होंने भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से कथित बातचीत का भी उल्लेख किया, हालांकि इस बातचीत का स्वतंत्र सार्वजनिक रिकॉर्ड अभी स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान केवल भारत की चुनाव प्रणाली की प्रशंसा भर नहीं है। इसके पीछे अमेरिकी राजनीति, मतदाता पहचान, चुनावी पारदर्शिता और आगामी अमेरिकी मध्यावधि चुनावों की राजनीति भी दिखाई देती है। सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि आखिर भारत की चुनाव व्यवस्था में ऐसा क्या है जो दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्रों में से एक अमेरिका के राष्ट्रपति को आकर्षित कर रहा है? भारत का निर्वाचन आयोग कोई सामान्य प्रशासनिक संस्था नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत उसे संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण का संवैधानिक दायित्व प्राप्त है। निर्वाचन आयोग स्वयं भी इसे स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण के रूप में वर्णित करता है।
भारत में चुनाव कराना अपने आप में दुनिया का एक असाधारण प्रशासनिक अभियान है। करोड़ों मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक पहुंचाना, मतदाता सूची तैयार करना, पहचान सुनिश्चित करना, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए समान अवसर बनाए रखना तथा परिणामों को घोषित करना—यह पूरा तंत्र विशाल स्तर पर काम करता है। ट्रंप ने भारत के हालिया आम चुनाव में लगभग 646 मिलियन मतदाताओं का उल्लेख करते हुए भारतीय फोटो पहचान व्यवस्था को अमेरिका के संदर्भ में उपयोगी बताया। यहीं से भारत और अमेरिका के चुनावी मॉडल में एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है। अमेरिका में चुनावों का संचालन काफी हद तक राज्यों के स्तर पर होता है और नियमों में राज्यवार अंतर दिखाई देता है। इसके विपरीत भारत में निर्वाचन आयोग एक केंद्रीय संवैधानिक संस्था के रूप में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए व्यापक अधिकार रखता है। ट्रंप की नजर में यही केंद्रीकृत चुनाव प्रबंधन एक आकर्षक मॉडल हो सकता है। ट्रंप की टिप्पणी को समझने के लिए अमेरिकी राजनीति को समझना आवश्यक है। अमेरिका में मतदाता पहचान और नागरिकता सत्यापन लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहे हैं। ट्रंप लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि चुनावी प्रक्रिया में पहचान और नागरिकता की पर्याप्त जांच होनी चाहिए।इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने भारत का उदाहरण दिया। उनका उद्देश्य केवल भारत की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि अमेरिकी मतदाता पहचान कानूनों के पक्ष में राजनीतिक समर्थन जुटाना भी है। ट्रंप प्रशासन  के माध्यम से मतदाता पंजीकरण में नागरिकता प्रमाण और देशव्यापी फोटो पहचान जैसे प्रावधानों पर जोर दे रहा है।इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि ट्रंप को भारत इसलिए भा रहा है क्योंकि भारतीय चुनाव प्रणाली का एक हिस्सा उनके घरेलू राजनीतिक एजेंडे के अनुकूल दिखाई देता है।यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या ट्रंप वास्तव में भारतीय चुनाव प्रणाली को अमेरिकी चुनाव व्यवस्था का आदर्श मानते हैं या वे भारत का उदाहरण अपनी घरेलू राजनीति में एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं?
भारत की चुनाव व्यवस्था की अपनी खूबियां हैं। लेकिन भारत भी पूर्ण व्यवस्था होने का दावा नहीं कर सकता। मतदाता सूची में नाम जुडऩे या हटने, पहचान संबंधी समस्याओं, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को लेकर समय-समय पर राजनीतिक विवाद उठते रहे हैं। हाल के वर्षों में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर भी तीखी राजनीतिक बहस हुई है। 2026 में विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष और नागरिक समूहों ने सवाल उठाए हैं, जबकि निर्वाचन आयोग ने अपने संवैधानिक अधिकारों के भीतर काम करने का पक्ष रखा है। इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय में भी निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची तैयार करने की शक्तियों को लेकर प्रश्नों पर विचार हुआ है।इसलिए ट्रंप की प्रशंसा को भारत की चुनाव प्रणाली के लिए अंतिम प्रमाणपत्र मान लेना उचित नहीं होगा।किसी भी चुनाव की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि कितने लोगों ने मतदान किया। असली सफलता तब होती है जब हारने वाला उम्मीदवार और उसके समर्थक भी परिणाम को स्वीकार करें।
भारत में निर्वाचन आयोग की भूमिका इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। संविधान ने उसे चुनावी प्रक्रिया की देखरेख का व्यापक अधिकार दिया है ताकि सत्ता परिवर्तन शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से हो सके। निर्वाचन आयोग स्वयं अपने संवैधानिक दायित्व को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने से जोड़ता है।लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा केवल संवैधानिक प्रावधानों से नहीं बनती। वह जनता के विश्वास से बनती है। इसलिए निर्वाचन आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती आज यही है कि उसकी प्रत्येक कार्रवाई ऐसी हो जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को समान रूप से भरोसा हो।
ट्रंप के बयान के बाद भारत में राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अमेरिका ले जाने संबंधी व्यंग्यात्मक टिप्पणी की। यह प्रतिक्रिया बताती है कि भारत में निर्वाचन आयोग को लेकर राजनीतिक विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है।यदि सरकार निर्वाचन आयोग की प्रशंसा करे तो विपक्ष को संदेह हो सकता है। यदि विपक्ष आयोग पर सवाल उठाए तो सरकार इसे राजनीतिक हमला बता सकती है। लेकिन इन दोनों के बीच संस्थागत निष्पक्षता का प्रश्न कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।निर्वाचन आयोग को न तो सरकार के पक्ष में दिखाई देना चाहिए और न विपक्ष के। उसे केवल संविधान के पक्ष में दिखाई देना चाहिए।
 यदि अमेरिका भारत से कुछ सीखना चाहता है तो केवल मतदाता पहचान-पत्र की व्यवस्था को देखकर बात पूरी नहीं हो सकती। भारत की चुनाव प्रणाली एक पूरे संस्थागत ढांचे पर आधारित है। मतदाता सूची, निर्वाचन क्षेत्र, मतदान केंद्रों का प्रबंधन, चुनावी आचार संहिता, राजनीतिक दलों के साथ संवाद, चुनाव अधिकारियों की तैनाती और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से लेकर मतगणना तक एक विस्तृत व्यवस्था काम करती है।
भारत में चुनाव आयोग को चुनावों के दौरान समान अवसर उपलब्ध कराने और आदर्श आचार संहिता लागू करने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है। संविधान का अनुच्छेद 324 इस पूरे ढांचे की आधारशिला है।
अमेरिका यदि भारतीय अनुभव से कुछ ग्रहण करता है तो उसे केवल पहचान-पत्र नहीं, बल्कि चुनाव प्रबंधन की संस्थागत संरचना पर भी विचार करना होगा। यहां बात केवल अमेरिका को भारत से सीखने की नहीं है। भारत को भी अपने चुनावी तंत्र में लगातार सुधार करते रहना होगा। आज मतदाता पहले से अधिक जागरूक है। सोशल मीडिया के दौर में चुनावी जानकारी कुछ सेकंड में करोड़ों लोगों तक पहुंच सकती है। गलत सूचना, डीपफेक, फर्जी वीडियो और डिजिटल प्रचार चुनावी वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं।ऐसे में निर्वाचन आयोग की पारदर्शिता और संवाद की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।मतदाता सूची में किसी नागरिक का नाम क्यों जोड़ा गया या क्यों हटाया गया, चुनावी निर्णय किस आधार पर लिया गया, राजनीतिक दलों की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई—इन सभी सवालों के जवाब समय पर और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना लोकतंत्र के हित में है।डोनाल्ड ट्रंप का भारतीय निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की ओर ध्यान जाना निश्चित रूप से भारत के लिए गर्व का विषय हो सकता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की चुनावी व्यवस्था को अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा उदाहरण के तौर पर पेश करना भारत की संस्थागत क्षमता को अंतरराष्ट्रीय पहचान देता है।लेकिन लोकतंत्र में बाहरी प्रशंसा से ज्यादा महत्वपूर्ण आंतरिक विश्वास है।यदि भारत के नागरिक अपने निर्वाचन आयोग पर भरोसा करते हैं, यदि राजनीतिक दल चुनावी परिणामों को स्वीकार करते हैं और यदि हर मतदाता को यह विश्वास रहता है कि उसका वोट सुरक्षित है तथा उसकी आवाज सुनी जाएगी, तभी चुनाव प्रणाली वास्तव में मजबूत कही जाएगी।आज आवश्यकता इस बात की है कि निर्वाचन आयोग अपनी उपलब्धियों पर संतुष्ट होकर न रुके। उसे लगातार खुद को और अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और तकनीकी रूप से सक्षम बनाना होगा।ट्रंप को भारत इसलिए भाया क्योंकि उन्हें अपनी घरेलू राजनीतिक बहस के लिए भारतीय मॉडल में कुछ उपयोगी तत्व दिखाई दिए। लेकिन भारत के लिए इससे बड़ा संदेश यह है कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं दुनिया के लिए उदाहरण बन सकती हैं—बशर्ते हम उनके प्रति जनता का विश्वास बनाए रखें। चुनाव केवल सत्ता चुनने की प्रक्रिया नहीं है। चुनाव लोकतंत्र में नागरिक और राज्य के बीच विश्वास का सबसे बड़ा सेतु है। निर्वाचन आयोग उस सेतु का प्रहरी है।
इसलिए ट्रंप की प्रशंसा अच्छी खबर हो सकती है, लेकिन असली परीक्षा यह है कि भारत का आम मतदाता अपने निर्वाचन आयोग के बारे में क्या सोचता है। लोकतंत्र की अंतिम कसौटी वाशिंगटन की प्रशंसा नहीं, बल्कि भारत के मतदान केंद्र पर खड़ा वह सामान्य नागरिक है जो अपने हाथ में मतदाता पहचान-पत्र लेकर यह विश्वास करता है कि उसकी एक-एक वोट की कीमत है। और यही विश्वास भारत के निर्वाचन आयोग की सबसे बड़ी पूंजी है।