लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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प्रेम इतना भी न करो किसी से,

कि दम उसका ही घुटने लगे,

फ़ासले तो हों कभी,

जो मन मिलन को मचलने लगे।

भले ही उपहार न दो,

प्रेम को बंधन भी न दो,

एक खुला आकाश दे दो,

ऊंची उड़ान भरने का,

सौभाग्य दे दो…..

लौट के आयेगा तुम्हारे पास ही,

ये तुम वरदान ले लो।

प्रेम बंधन है, न बलिदान है,

प्रेम मे विस्तार है,

प्रेम मे गहराई है,

प्रेम मे संग साथ है,

साथी का विश्वास है,

प्रेम तो बस प्रेम है,

समझ है,

ना कि उन्माद है।

One Response to “प्रेम”

  1. Nem Singh

    प्रेम मे गहराई है………………………..Nice poem God grace you more!

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लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-विजय कुमार- love

हमें सांझा करना था

धरती, आकाश, नदी

और बांटना था प्यार

मन और देह के साथ आत्मा भी हो जिसमें !

और करना था प्रेम एक दूजे से !

और हमने ठीक वही किया !

 

धरती के साथ तन बांटा

नदी के साथ मन बांटा

और आकाश के साथ आत्मा को सांझा किया !

 

और एक बात की हमने जो

दोहराई जा रही थी सदियों से !

 

हमने देवताओ के सामने

साथ साथ मरने जीने की कसमे खायी

और कहा उनसे कि वो आशीष दे

हमारे प्रेम को

ताकि प्रेम रहे  सदा जीवित !

 

ये सब किया हमने ठीक पुरानी मान्यताओं की तरह

और जिन्हें दोहराती आ रही थी अनेक सभ्यताए सदियों से !

और फिर संसार ने भी माना कि हम एक दुसरे के स्त्री और पुरुष है !

पर हम ये न जानते थे कि

जीने की अपनी शर्तें होती है !

हम अनचाहे ही एक द्वंद में फंस गए

धरती आकाश और नदी पीछे,

कहीं बहुत पीछे;

छूट गए !

मन का तन से, तन का मन से

और दोनों का आत्मा से

और अंत में आत्मा का शाश्वत और निर्मल प्रेम से

अलगाव हुआ !

प्रेम जीवित ही था

पर अब अतीत का टुकड़ा बन कर दंश मारता था !

मैं सोचता हूं,

कि हमने काश धरती, आकाश और नदी को

अपने झूठे प्रेम में शामिल नहीं किया होता !

मैं ये भी सोचता हूं की

देवता सच में होते है कहीं ?

हां, प्रेम अब भी है जीवित

अतीत में और सपनो में !

और अब कहीं भी;

तुम और मैं

साथ नहीं है !

हां, प्रेम है अब भी कहीं जीवित

किन्हीं दुसरे स्त्री-पुरुष में !

One Response to “प्रेम”

  1. mahesh sharma

    aupacharik rah gayi ab prem ki batein
    jindagi me prem ab dhudhe nahi milta
    bech dali budhdhhi jo karti niyantranh
    nadi sukhi bhav ki kaise su-man khilta

    Reply

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