प्रेम इतना भी न करो किसी से,

कि दम उसका ही घुटने लगे,

फ़ासले तो हों कभी,

जो मन मिलन को मचलने लगे।

भले ही उपहार न दो,

प्रेम को बंधन भी न दो,

एक खुला आकाश दे दो,

ऊंची उड़ान भरने का,

सौभाग्य दे दो…..

लौट के आयेगा तुम्हारे पास ही,

ये तुम वरदान ले लो।

प्रेम बंधन है, न बलिदान है,

प्रेम मे विस्तार है,

प्रेम मे गहराई है,

प्रेम मे संग साथ है,

साथी का विश्वास है,

प्रेम तो बस प्रेम है,

समझ है,

ना कि उन्माद है।

1 thought on “प्रेम

Leave a Reply

-विजय कुमार- love

हमें सांझा करना था

धरती, आकाश, नदी

और बांटना था प्यार

मन और देह के साथ आत्मा भी हो जिसमें !

और करना था प्रेम एक दूजे से !

और हमने ठीक वही किया !

 

धरती के साथ तन बांटा

नदी के साथ मन बांटा

और आकाश के साथ आत्मा को सांझा किया !

 

और एक बात की हमने जो

दोहराई जा रही थी सदियों से !

 

हमने देवताओ के सामने

साथ साथ मरने जीने की कसमे खायी

और कहा उनसे कि वो आशीष दे

हमारे प्रेम को

ताकि प्रेम रहे  सदा जीवित !

 

ये सब किया हमने ठीक पुरानी मान्यताओं की तरह

और जिन्हें दोहराती आ रही थी अनेक सभ्यताए सदियों से !

और फिर संसार ने भी माना कि हम एक दुसरे के स्त्री और पुरुष है !

पर हम ये न जानते थे कि

जीने की अपनी शर्तें होती है !

हम अनचाहे ही एक द्वंद में फंस गए

धरती आकाश और नदी पीछे,

कहीं बहुत पीछे;

छूट गए !

मन का तन से, तन का मन से

और दोनों का आत्मा से

और अंत में आत्मा का शाश्वत और निर्मल प्रेम से

अलगाव हुआ !

प्रेम जीवित ही था

पर अब अतीत का टुकड़ा बन कर दंश मारता था !

मैं सोचता हूं,

कि हमने काश धरती, आकाश और नदी को

अपने झूठे प्रेम में शामिल नहीं किया होता !

मैं ये भी सोचता हूं की

देवता सच में होते है कहीं ?

हां, प्रेम अब भी है जीवित

अतीत में और सपनो में !

और अब कहीं भी;

तुम और मैं

साथ नहीं है !

हां, प्रेम है अब भी कहीं जीवित

किन्हीं दुसरे स्त्री-पुरुष में !

1 thought on “प्रेम

  1. aupacharik rah gayi ab prem ki batein
    jindagi me prem ab dhudhe nahi milta
    bech dali budhdhhi jo karti niyantranh
    nadi sukhi bhav ki kaise su-man khilta

Leave a Reply

%d bloggers like this: