मां और मौसी


मां पर सभी कवि लिखते हैं,
मौसी पर कभी नहीं लिखते है।
मौसी भी तो मां जैसी है पर ,
उस पर क्यो नहीं हम लिखते है ?

मौसी भी तो मां के समान है,
उसका भी तुम सम्मान करो।
देखो उनमें कितना प्यार है,
उस पर तुम अभिमान करो।।

मां मरती है तो मौसी पालती है,
अपने बच्चो को छोड़ तुम्हे खिलाती है।
भूलना न कभी एहसान उसका तुम,
जो अपना दूध तुम्हे पिलाती है।।

मां मौसी दोनों एक समान है,
दोनों ही एक कोख से जन्म लेती है।
ये उपवन की दो कलियां है,
दोनों ही एक रंग रूप लेेती है।।

देखो ये कैसे समाज के नियम है,
शादी के बाद दोनों अलग हो जाती है।
जन्म लेती है एक परिवार में,
फिर दूसरे परिवार में चली जाती है।।

मौसी में भी मां शब्द छिपा है,
इस पर भी तुम जरा गौर करो
मां मौसी दोनों एक ही तो,
इसका भी तुम जरा आभास करो।।

भाई भाई से तुमने लड़ता देखा होगा,
उनका बटवारा भी तुमने देखा होगा।
पर तुमने दो सगी बहनों में कभी,
भाई वाला न बटवारा देखा होगा।।

मां और मौसी दोनों ही तो
गंगा यमुना जैसी बहना है।
मिलती हैं जब एक दूजे से,
बन जाती प्यार का गहना है।।

आर के रस्तोगी

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