कमाल की है मैडम की जूती

हास्य- व्यंग 
  प्रभुनाथ शुक्ल 

लोकतंत्र में जब बात से बात नहीँ बनती तब शायद जूती स्ट्राइक का सहारा लेना पड़ता है। आजकल हमारे संस्कार में जूता,चप्पल और सैन्डिल की संस्कृत गहरी पैठा बना चुकी है। इसकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए हम कह सकते हैं कि जूती है तो सबकुछ मुमकिन है। अपुन के मुलुक के इतर सात समंदर पार भी इसका जलवा कायम है। लोकतंत्र में अब चप्पल से बात बनती हैं। राजनीति और राजनेताओं का यह बेहद लोकप्रिय फॉर्मूला है। जूती जब किसी राजनीति रसूख वाली मैडम का हो तो यह अधिक प्रभावशाली होती है। कोरोना काल की मंदी में अगर फोकटिया जूती मिल जाय तो क्या कहने। 

अपुन की मैडम की जूती स्ट्राइक टीवी और सोशलमीडिया में छायी है। लोग स्ट्राइक अटैक करते खूब वीडियो शेयर कर रहे हैं। इस हमले के बाद विरोधियों कि माउथ स्ट्राइक भी तेज हो गई है। सोशलमीडिया पर जितनी एयर स्ट्राइक ने टीआरपी नहीं जुटा पायी थी उससे कहीं अधिक मैडम कि जूती पा रहीं है। मैडम का यह प्रसाद जिसने भी खाया वह भी पछतावे न खाए वह भी। वैसे इस तरह का फल अक्सर आशिकी में ही मिलता है।  लेकिन उस भाग्यवान को जाने कहाँ से मिल गया। 

टीवी पर आंख गड़ाए पत्नी ने कहा देखो, जी! तुम हमारे बेलन से रोज पीटते हो, लेकिन टीवी वाले तुम्हें घास तक नहीं डालते। लेकिन उस मैडम ने अभागे पर जूती क्या बरसाई पूरे दिन ब्रेकिंग का किंग बन गया है।  काश! आपको भी मैडम की जूती का सुनहला मौका मिलता। कम से कम आपको टीवी पर तो देख लेती। वैसे आपकी का भी तो पद- कद और विभागीय समानता एक जैसी है। काश ! मेरी यह मुराद पूरी होती। कई लोग तो जूता पहन कर भी महान बन गए। कितनों के पुतलों को भी यह सौभाग्य मिला। मुए विरोधी नारा लगाते फिर रहे है कि जूती हैं तो सबकुछ मुमकिन है।

जूती का विश्लेषण करें तो यह अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष से जुड़ी है। इसमें सतो और तमो गुण की प्रधानता है। इसका परिस्कृत उत्पाद सैंडिल है। जिसने जूता खाया वह नेतृत्वकर्ता बन गया और सैंडिल जिसके भाग्य में आयी वह प्रेमिका के गले का हार बन गया। जूती धनार्जन के साथ परिमार्जन से भी जुड़ी है। सच कहते हैं कि लातों के भूत बातों से नहीँ मानते हैं। जूती प्रहार की संस्कृति राष्ट्रीय नहीँ बल्कि अंतरराष्ट्रीय है। देश और विदेश के कई भूतपूर्व और वर्तमान नेता जूते के महाप्रहार से भूतपूर्व से अभूतपूर्व बन गए हैं। जूते की महिमा से लोग सीएम से पीएम तक बन गए। 

पिछले दिनों हम सुसुराल गए तो मुंह बोली साली ने कहा जीजू आपके जूते चुराने का जी करता है। हमने कहां डियर! जमाना फोर-जी में पहुंच चुका है और तू  टूजी की स्पीड में अटकी हो। प्रिये ! आजकल जूता- जूती खाने में जितना मजा है वो चुराने में कहां ? हमारे जैसे कई घरवालियों कि जूती का महाप्रसाद ग्रहण कर अपना जीवन सफल बना चुके हैं। किसी महान कवि ने इस पर एक दोहा भी लिखा है… जीभिया ऐसी बांवरी, कही गई सरग पताल!! आपुनि कहि भीतर गई, जूती खात कपार!! कहते हैं जब अहम टकराता है तो पैर का जूता सिर चढ़ बोलता है। इसका साहित्यिक इतिहास भी पुराना है। बात-बात में यह कहावत भी खूब चलती है कि आपका जूता मेरा सिर। लोकतंत्र और राजनीति में जूता संस्कृति का रिश्ता बेहद पुराना है। जूते की महानता और बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए यह कहना मुमकिन होगा कि …मैडम जूती राखिए, बिन जूती सब सून!! जूती गए न उबरे, राजनीति के चून!! यानी जूती है तो सबकुछ मुमकिन है।

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