लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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Madhya_Pradeshएक नवम्बर को सुबह-सुबह भोपाल के एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र ने फ़ोन पर कहा कि, देखो मध्य प्रदेश में अब तक काफी शांति थी. अब यहाँ भी “राजनीति” अलगाव पैदा करने की तैयारी कर रही है. वहाँ के एक अखबार में छपे मुख्यमंत्री के साक्षात्कार के आधार पर उनका कहना था कि वहाँ राज्योत्सव पर इस बार सरकार ने “आओ बनाए अपना मध्य प्रदेश” का नारा दिया है. अब देखना वहाँ भी यह नारा क्या-क्या गुल खिलाता है. शिष्टाचारवश उनकी बातें सुनने का ढोंग करते हुए भी सोच रहा था कि आखिर ये पत्रकार लोग भी ना, जब देखो तब तिल का ताड़ बना देने की फिराक में रहते हैं. अगर कोई मुखिया अपने राज्य में अपनापन की बात करता है तो इसमें अलगाव की कौन सी बात हो गयी? हर व्यक्ति को हक है अपने राज्य की बेहतरी के बारे में सोचने का. लेकिन राजनीति की राहें इतनी रपटीली होती है कि आप कूद कर किसी नतीजे पर नहीं पहुच सकते. विश्लेषण करने और नेताओं के अगले कदम के बारे में आकलन करने के लिए लम्बे अनुभव की दरकार होती है,जैसा की उस पत्रकार मित्र में था. वास्तव में “उत्सव” का समापन भी नहीं हो पाया था कि शांति के शायद अंतिम टापू मध्य प्रदेश के भी डूबने की शुरुआत हो चुकी थी. सतना में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने भाषण में कहा कि “ये नहीं हो सकता कि उद्योग यहाँ लगे और नौकरी बिहार वालों को करने दी जाए. हम यह नहीं होने देंगे” यदि मेरे सामने अपने वरिष्ठ मित्र का पूर्व-आकलन नहीं होता तो मैं भी यही समझता कि जुबान किसी की भी फिसल सकती है, आखिरकार शिवराज भी आदमी ही हैं,और उन्होंने एक घंटे बाद ही सफाई भी दे ही दी थी. लेकिन उस आकलन के आलोक में यह भरोसा करने का पर्याप्त कारण है कि बयान देने से लेकर पलटने तक का नेताओं का पूरा का पूरा ड्रामा पूर्व-नियोजित ही होता है और इस मामले में भी वही था. यह मानने का अब पर्याप्त कारण है कि चूंकि श्री चौहान के वोट का बाज़ार अब “सेचुरेशन पॉइंट” तक पहुच गया है तो अब उन्हें नए-नए रास्ते तलाशने ही थे, अगली पारी के लिए शायद अलगाव के बीज को रोपना ज़रूरी था ताकि विधान सभा चुनाव तक “फसल” पक कर तैयार हो जाए,अगला चुनावी मार्ग भी आसानी से इस “पाथेय” के सहारे काटी जाए. मध्य प्रदेश स्थापना दिवस पर एक अखबार को दिए साक्षात्कार में मुख्यमंत्री का दर्द ये था कि प्रदेश में लोग विंध्य से लेकर मालवा तक बंटे हुए हैं अतः “अपना मध्यप्रदेश” की भावना किसी में नहीं है, इसलिए सूबा पिछड़ रहा है.

शिवराज जी को जानने वाले लोग आपको कहते मिलेंगे कि उनकी “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” पर जबरदस्त पकड़ है. इस विषय पर भाषण दे कर वो लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं. लेकिन अफ़सोस तो ये है कि संघ द्वारा पिलाये इस घुट्टी का वो ककहरा ही भूल गए. सीधी सी बात यह है कि प्रशासनिक आधार पर अपनी सुविधा के लिए बनाए गये प्रदेश या राजस्व इकाई का केवल राजस्व एवं प्रशासनिक कार्य के लिए ही महत्व होता है. अलग से किसी में अगर अपना मध्यप्रदेश जैसी भावना नहीं है तो इसका कारण ये है कि वह एक सांस्कृतिक इकाई है ही नहीं. अपनापन के लिए सांस्कृतिक एकता की दरकार होती है. किसी संस्कृति के आधार पर कोई प्रदेश अस्तित्व में आ जाय यह तो संभव है लेकिन किसी राज्य का निर्माण कर आप “संस्कृति” बना लेंगे यह संभव नहीं. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूल भाव यही है. अगर राजनीतिक रूप से जनम लेकर ही कोई राज्य अपना हो सकता है तब तो आप भारत के इतिहास पर गर्व ही नहीं कर सकते. इस तरह तो अपने देश का इतिहास केवल ६२ साल का है. अभी भी लाखों बुजुर्ग ऐसे हैं जो उम्र में “भारत” से बड़े हैं.

यह बात शिवराज सिंह बेहतर जानते हैं कि विभिन्न उप-संस्कृतियों की जो अपनी-अपनी एकात्मता है वह किसी भी राज्य का मूह्ताज़ नहीं होता. मध्यप्रदेश में बुंदेलखंड, बघेलखंड या मालवा से लेकर विंध्य-महाकौशल तक, या उत्तर प्रदेश में नेपाल की सीमा से लेकर दिल्ली की चौखट तक, बिहार में भोजपुरी, मैथिली भाषा-भाषी से लेकर बज्जिका और अंगिका बोलने वालों तक, सबकी अपनी मौलिकता है और उस मौलिकता को किसी राज्य का निर्माण कर आप अलग नहीं कर सकते. प्रशासनिक सहूलियत के लिए राज्य निर्माण के हुए ढेर सारे प्रयोगों ने यह साबित किया है कि उसका किसी संस्कृति विशेष से कोई लेना-देना नहीं होता.लेकिन अगर आप उप संस्कृतियों के आधार पर प्रदेश का निर्माण कर सकें तो अच्छी बात है. इसकी वकालत कभी दीनदयाल उपाध्याय ने भी की थी, उनके अनुसार ऐसे १०० राज्यों का निर्माण किया जाना भारत में ज़रूरी था. लेकिन सामान्यतः जिस तरह रेलवे अपना अलग ज़ोन और डिविजन बनाता है. न्यायपालिका का जिस तरह राज्यों के स्ट्रक्चर से अलग इकाई होता है, सेनायें अपना अलग-अलग उप इकाइयां स्थापित करती है,कंपनियां अपनी इकाई अपने सहूलियत के आधार पर बनाती है उसी तरह प्रदेशों का निर्माण भी तात्कालिक ज़रूरतों के हिसाब से होता है ना कि किसी संस्कृतियों के आधार पर. और अपनापन की यह भावना केवल कागज़ पर उकेर दी गयी लकीर से ना बनती है और ना बिगड़ती है. भावनाएं कोई ऐसी चीज़ नही है जिसे आप सहूलियत के हिसाब से अदल-बदल सके. आप सोचिये…. ऐसे में तो आज के मध्य प्रदेश में पहले “अपना मध्य भारत” अपना “सी. पी एंड बरार” और फिर आपकी अँगुलियों के इशारे पर अपना “मध्यप्रदेश” जैसी भावना होनी चाहिए. या उसी प्रदेश से निकले छत्तीसगढ़ की बात करें तो इतने अपनापन के बहाने के बाद फिर “अपना छत्तीसगढ़” की भावना होगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं है.

मोटे तौर पर संस्कृतियाँ या उप संस्कृतियाँ एक ऐसी पूछ हुआ करती है जिसे आप किसी राज्य या राष्ट्र की नलकी से “सीधा” नहीं कर सकते, अपने हिसाब से बदल नहीं सकते. इस तरह का बेजा प्रयास तो कई बार उस “नलकी” को ही टेढा कर देती है जैसा पूर्वी पाकिस्तान के मामले में हुआ था जहां की बंगाली संस्कृति को हटा कर राज्य निर्माण के नाम पर पाक संस्कृति या उर्दू भाषा लादने का प्रयास किया गया था, फलतः टुकड़े ही हो गए थे पाकिस्तान के. निश्चय ही शिवराज सिंह कम से कम राज ठाकरे जैसे उजड्ड-असभ्य या लालू यादव की तरह गवांर नहीं हैं कि उनको इन विचारों की जानकारी नहीं हो. उन्हें उपरोक्त विचारों की बेहतर समझ है. इन्ही सब तर्कों के सहारे एवं भाषणों की बदौलत वो आज अपने मंजिल तक पहुचे हैं. अभी तक के उनके हर भाषणों में सहजता, सरलता एवं राष्ट्रभक्ति की बातें लोगों में उम्मीद जगाती रही है. लेकिन उन्हें ही यदि अब अपने विचारों से अलग किसी रणनीतिक ज़रूरतों के हिसाब से शब्दों से खिलवाड़ करना पड़े तो फिर क्या बच जाता है. अगर एक स्वयंसेवक ही लालू यादव, रामबिलास पासवान, मुलायम, मायावती, करूणानिधि या राज ठाकरे की जुबान बोलने लग जाए तो देश का क्या होगा?

सवाल अपना या पराया मध्य प्रदेश या बिहार या उत्तर प्रदेश का बिल्कुल नहीं है. सवाल तर्क का नहीं “नीयत” का है. निश्चित रूप से हर वो बहाना या तर्क जायज है जो किसी भी तरह “जोड़ने” की बात करता हो. अगर “अपना मध्यप्रदेश” के नारे से ही लोगों में विकास का उमंग, आगे बढ़ने का जज्बा पैदा हो, जैसा की पहले इस लेखक को भी लगा था तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं है? लेकिन अगर इस नारे में छुपी हुई कोई और भावना हो जिसका प्रकटीकरण पांच दिन के बाद ही सतना में हो गया हो गया तो वास्तव में आपको सोचना पड़ेगा कि आखिर हम कहाँ जा रहे हैं.आज देश जिस तरह के संकटों से घिरा हुआ है, एक तरफ चीन के बुद्धिजीवी भारत को पचीस-तीस टुकड़े में बांटने की बात करते हैं. नक्सलियों को हथियार सहित तमाम ज़रूरतों की पूर्ति कर देश में गृह-युद्ध के हालात पैदा किये जा रहे हैं. मयन्मार में परमाणु ठिकाना बना कर, नेपाल तक राजमार्ग बना, पाकिस्तान को प्रोत्साहन दे कर जिस तरह देश को चौतरफा घेरने का प्रयास किया जा रहा है. इन चुनौतियों से निपटने में भारतीय एकात्मता का मूलमंत्र ही उपयोगी होगा. आखिर जब देश रहेगा तब ही सब लोग अपनी-अपनी दूकान भी चला सकेंगे.

शिवराज जी, आप बहुत अच्छा कम कर रहे हैं, लोगों ने आपको बिना किसी भड़काऊ भाषण के भी दुबारा समर्थन दिया है. सत्ता कभी किसी एक की नहीं रही है लेकिन अभी आपके पास काम करने का काफी समय बचा है. भविष्य के किसी चिंता में या किसी सलाहकार की बातों में आ कर कोई नया ध्रुवीकरण, नए समीकरण बनाने की आपको कोई ज़रूरत नहीं है. किसी भी तरह के असुरक्षा बोध से भयभीत होने की आपको ज़रूरत नहीं है. इसी कार्यकाल के पूरे चार साल आपके पास बचे हुए हैं. इतना काफी है प्रदेश को “लाड़ली लक्ष्मी” से संपन्न करने के लिए. यदि आपने अपने सतना के सुनियोजित “व्याख्यान” के द्वारा किसी अज्ञात लक्ष्य का संधान भी कर लिया हो तो कृपया आगे ऐसा कोई प्रयास भगवान के लिए ना करें. भाजपा अपने को अलग पार्टी होने का दावा इसलिए कर पाती है क्युकि वह घोषित रूप से यह कहती है कि उसकी प्राथमिकता में पहले देश, फिर पार्टी और उसके बाद व्यक्ति शामिल होता है. आप भी देश सेवा को ही अपना सर्वोपरि लक्ष्य रक्खे. निश्चित ही इसी में आपके खुद का भी भला वैसे ही होता रहेगा जैसे….बाटन वाड़े को लगे ज्यों मेहंदी का रंग.

-पंकज झा

4 Responses to “क्या अभी तक पराया था मध्य प्रदेश !”

  1. sk maltare

    मेरे जैसे अनेक लोग जो पैदा हुए एक राज्य में और नोकरी करते हुए अनेक राज्यों में रहते हुए अंत में अपने गृह राज्य में लौटना चाहते है वे किस
    वर्ण में फिट बैठेगे , कौन सा सर्टिफिकेट बताएगा की मै ४० वर्षो पूर्व यही का खाना खता था . राज्यों कि लड़ाई में अभी तो मुझसे झूठे प्रमाण पत्र बनवाये
    जाते है कि मै उसी राज्य का परमानेंट निवासी हूँ जहाँ रह रहा हूँ . ट्रान्सफर होने नये राज्य में वही कहानी दुहरायी जाती है . किसी पढ़े
    लिखे से बात करो तो मामला साफ हो जाता है कि यह अधिकार तो राज्य सरकार का है . केंद्र इस मामले में ध्रुस्ट राष्ट्र कि भूमिका में दिखाई देता है
    क्योकि यह कही से भी वोट बैंक नहीं है . अंग्रेज जब भारत आये थे तब भी देश छोटे छोटे अलग अलग राज्यों में बंटा हुआ था वर्तमान भी में
    कई राज नेता इसी और प्रयास रत है . मुझे मालूम नहीं कभी मै अपने गृह राज्य में लौट पाउँगा . और उसे अपना गृह राज्य कह सकूंगा . जब देश
    गुलाम था कई नेताओ ने देश को एकता में पिरोने और बाँधने का कार्य किया , और अब उसका उल्टा देखने को मिल रहा है . मेरा भारत महान कोंन बनाएगा . सभी के प्रयास मेरा प्रदेश प्रथक बनाने कई तरफ है.

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  2. Jeet Bhargava

    ना तो शिवराज राज ठाकरे या अबू आजमी किस्म के नेता है, ना ही मध्यप्रदेश में उनकी कोइ ऐसी मजबूरी है कि ऐसे बयान देने पड़े. भाजपा जैसी राष्ट्रवादी पार्टी के ऐसे एकाद तथाकथित बयानों को लेकर मीडिया बहुत हाय-तौबा मचाती है, ताकि भा ज पा को आसानी से टार्गेट किया जाए… और कोंग्रेस कम्युनिस्टो सहित अबू आजमियों का काम सुगम हो जाए. दूसरी और गोवा के कोंग्रेसी मुख्यमंत्री, दिल्ली की कोंग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, वहां के राज्यपाल कपूर, महाराष्ट्र के शिक्षा मंत्री (कोंग्रेसी) सुरेश शेट्टी भी कई बार उत्तर भारतीयों के खिलाफ विष वमन कर चुके हैं. लेकिन किसकी मजाल की कोइ मीडियाकर्मी हो-हल्ला मचाये.

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  3. dhiru singh

    शिवराज सिंह जैसे लो प्रोफ़ाईल व्यक्ति चर्चा में आने के लिये बेतुके ब्यान देते ही रह्ते है . सफ़ल शिवराज सिंह इसलिये है क्योकि कान्ग्रेस के नेता आपस मे टान्ग खिचाई मे लगे है

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  4. nirmla.kapila

    आपका आलेख बहुत अच्छा लगा। नेता ही क्या जो बातों से लोगों को भडका न सके और गुमराह न कर सके। धन्यवाद

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