महात्मा गाँधी: न हत्या न वध?

जब 30 जनवरी 1948 की शाम को जब महात्मा गांधी की हत्या हुई, तब से लेकर आज तक आरएसएस का कट्टर पक्ष हत्या को सही ठहराता है और आरएसएस विरोधी इस बात को जिन्दा रखता आ रहा है कि नाथूराम गोडसे और आरएसएस वाले गाँधी के हत्यारें हैं. हालाँकि आरएसएस हत्यारा संगठन है या नहीं, यह एक अलग प्रश्न है. इस संदर्भ में आप अपनी राजनीतिक विचारधारा के हिसाब से असहमत और सहमत हो सकते हैं.

आरएसएस से जुड़े संगठनों का दावा है कि आरएसएस भारतीय समाज के लिए काम करने वाला गैर-राजनीतिक संगठन है. लेकिन कुछ लोग उसे अपने फायदे के लिए नफ़रत की दृष्टि से देखते आ रहे हैं. आरएसएस को आतंकी संगठन घोषित करने के राजनीतिक फायदे भी हो सकते हैं.  यह भी हो सकता है कि आरएसएस से लोगों को दूर इस लिए भी रखना चाहते हों, जिससे बहुसंख्यक वर्ग एकता के साथ अपनी मांगे न रख पाए. लोकतांत्रिक देश में बहुसंख्यक लोग जब एक ही विचारधारा से जुड़ते है तो इसके ख़तरे भी बहुत अधिक हो जाते हैं. बहुसंख्यक कई बार कई खतरों को जन्म देते हैं और न्याय की अवहेलना करते हैं. गाँधी हत्या की सुनवाई करने वाले जज जस्टिस जीडी खोसला ने अपनी पुस्तक ‘द मर्डर ऑफ द महात्मा’ (The Murder Of Mahatma) में इस डर को अपने शब्दों में लिखी भी है. इसमें उन्होंने एक टिप्पणी की है, जो इतिहास को झकझोर कर नाथूराम गोडसे को एक नई रोशनी में देखने को प्रेरित करती है. उन्होंने लिखा है, ‘मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि यदि उस दिन अदालत में उपस्थित दर्शकों को संगठित कर ज्यूरी (Jury) बना दिया जाता. इसके साथ ही उन्हें नाथूराम गोडसे पर फैसला (Verdict) सुनाने को कहा जाता, तो भारी बहुमत के आधार पर गोडसे ‘निर्दोष’ (Not Guilty) करार दिया जाता.’

मैं नाथूराम के कृत्य से असहमत हूँ, लेकिन उसकी भावना विचार करने पर मजबूर करती है. ठीक वैसे जैसे गाँधी द्वारा 55 करोड़ पाकिस्तान को दिए जाने के पीछे को भावना थी. इसके बावजूद सहमति और असहमति की दशा में हत्या को जायज नहीं ठहराया जा सकता. श्री राजगोपालाचारी अपनी पुस्तक ‘गाँधी की शिक्षा और उनका तत्वज्ञान’ में लिखते हैं कि ‘सरदार पटेल के शब्द थे कि पाकिस्तान को 55 करोड़ दिए जाने की ज़िद उनकी हत्या का वजह बना’. गाँधी हत्या पर नाथूराम गोडसे का पक्ष रखते हुए, नाथूराम के भाई गोपाल गोडसे ने अपनी किताब ‘गांधी वध और मैं’ में लिखा है, नाथूराम जेल में बंद था, तब गाँधी पुत्र देवदास गाँधी गोडसे से मिलने संसद भवन थाने गए थे. तब गोडसे ने कहा, ‘मैंने आपको एक संवाददाता सम्मेलन में देखा था. आप आज पितृविहीन हो चुके है और उसका कारण बना हूँ, आप पर और आपके परिवार पर जो वज्रपात हुआ है उसका मुझे खेद है. लेकिन आप विश्वास करें, किसी व्यक्तिगत शत्रुता की वजह से मैंने ऐसा नहीं किया है.’

आज गाँधी के हत्यारों के अभियुक्तों में वीर सवारकर का नाम जोर-शोर से उठाया जा रहा है, हालाँकि उठाया पहले भी जा रहा था. लेकिन इतने सालों बाद अगर पूरा विपक्ष नाम ले रहा है तो इसके पीछे कारण है, उनको भारतरत्न देने की वकालत करने वाली की संख्या बढ़ गयी है या उनके विचार को मानने वाले सत्ता में आ गए है. सावरकर की आत्मकथा ‘सावरकर:इकोज फ्रॉम द फॉरगटेन पास्ट’ के विमोचन में शिवसेना प्रमुख ठाकरे ने भी उनको भारतरत्न देने की वकालत की. उन्होंने कहा कि गाँधी और नेहरु के अलावा किसी अन्य सेनानियों के महत्व को समझा ही नहीं गया. गाँधी की हत्या में सावरकर की कोई भूमिका नहीं थी. इन बातों से स्पष्ट है कि सावरकर कहीं न कहीं ईष्या के पात्र किसी खास विचारधारा में जीवित हैं.

वीर सावरकर अपने जीवन काल में कभी हत्या को वध की संज्ञा नहीं दे पाए यानि वो हत्या को हत्या ही मानते थे वध नहीं! अगर प्राप्त तथ्यों के आधार पर कहें तो गांधी जी की हत्या से जुड़े दस्तावेज़ गोपनीय हैं और इन्हें सार्वजनिक करने को लेकर केंद्रीय सूचना आयोग में एक मामले की सुनवाई चल रही है. इस दौरान ऐसे कई पहलुओं का ज़िक्र हुआ है जो बताते हैं कि गांधी जी की हत्या के केस में किस दर्जे की लापरवाही हुई थी. उनकी हत्या के मामले में नाथूराम गोडसे के अलावा 11 और लोगों को आरोपी बनाया गया था. इन 12 लोगों में से 9 लोगों को या तो सज़ा हुई या तो वे बरी हो गए.लेकिन सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक तीन आरोपी गंगाधर दंडवते, गंगाधर जाधव और सूर्यदेव शर्मा केस चलने के समय से ही फरार हैं. इन 71 सालों में इनका कोई पता नहीं चला.(संदर्भ-लल्लनटॉप वेबसाइट)

कुलदीप नैयर बीबीसी से बात करते हुए कहते हैं (गाँधी के मौत के समय अंजान अख़बार में काम करते थे) कि ‘अदालत में गोडसे ने स्वीकार किया कि उन्होंने ही गांधी को मारा है. अपना पक्ष रखते हुए गोडसे ने कहा, “गांधी जी ने देश की जो सेवा की है, उसका मैं आदर करता हूँ. उनपर गोली चलाने से पूर्व मैं उनके सम्मान में इसीलिए नतमस्तक हुआ था किंतु जनता को धोखा देकर पूज्य मातृभूमि के विभाजन का अधिकार किसी बड़े से बड़े महात्मा को भी नहीं है. गाँधी जी ने देश को छल कर देश के टुकड़े किए. क्योंकि ऐसा न्यायालय और कानून नहीं था जिसके आधार पर ऐसे अपराधी को दंड दिया जा सकता, इसीलिए मैंने गाँधी को गोली मारी.”(संदर्भ बीबीसीहिंदी)

आज जब भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा नाथूराम गोडसे के पक्ष में पर अपना बयान देते हैं तो सियासत में बवाल होने लगता है, बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व सफाई जारी करता है. लेकिन कभी उन नेताओं को पार्टी से या संगठन से निकाला नहीं गया. हर बार यहीं कहा जाता रहा कि नेताओं के ये बयान उनके निजी बयान हैं और पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं है. नाथूराम गोडसे को मानने वालों को जनता अपना प्रतिनिधि भी बना कर उच्च सदन और निम्न सदन में भेजती रही है.आखिर क्या कारण है कि नाथूराम की स्वीकारित है, इस दिशा में भी विचार करने की जरुरत है. इस बात से यह भी स्पष्ट होता है कि विपक्ष जिनको हत्यारा कहता रहा है वो जनता की नजर में हत्यारा नहीं है.

‘गोडसेज़ चिल्ड्रेन’ के लेखक सुभाष गताडे 15 नवम्बर को गोडसे शहादत दिवस मनाने को बेवकूफी की संज्ञा देते हैं वो कहते हैं कि “ये एक तरह से आतंकवाद को ग्लोरिफ़ाई करने का मामला है. मैं नाथूराम गोडसे को आज़ाद हिंदुस्तान का पहला आतंकवादी मानता हूँ. अगर आप महाराष्ट्र जाएं तो पाएंगे कि बड़े स्तर पर नहीं छोटे स्तर पर ही हर 15 नवंबर को गोडसे का शहादत दिवस मनाया जाता है. ये दिलचस्प बात है कि एक तरफ़ आप गाँधी को अपने से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ आप उनके हत्यारे गोडसे को ग्लोरिफ़ाई कर रहे हैं. इससे उनकी मानसिकता पता चलती है. मैं समझता हूँ कि हमारे मुल्क में जिस तरह भिंडरावाले को ग्लोरिफ़ाई नहीं किया जा सकता उसी तरह गोडसे को भी ग्लोरिफ़ाई नहीं किया जा सकता.” लेखक शहादत दिवस मनाने वालों के पक्ष पर विचार इसलिए भी नहीं कर पाते हैं. क्योंकि अपने आदर्श को धार्मिक आस्था जैसी प्रवृति से देखने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं. हालाँकि यह भी नहीं कहा जा सकता कि उनका पक्ष तार्किक नहीं है, लेकिन तर्क निश्चित मापदंडों के सहारे नहीं दिया जा सकता है.

गाँधी हत्यारें गोडसे पर ज्यादा उदार महात्मा गाँधी के पौत्र गोपाल गांधी नज़र आते हैं, उनका का कहना है कि उनके परिवार की गोडसे से कोई कटुता नहीं है. गाँधी के पुत्र देवदास गाँधी ने तो गोडसे को क्षमादान देने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया था. 

गाँधी की हत्या से जुड़े कोई भी दस्तावेज़ या विचार सही नहीं ठहराता है, लेकिन उस दौर के राजनैतिक व्यवस्था पर शक जरुर पैदा कर देता है. गाँधी को गोली लगने के बाद घायल अवस्था में किसी अस्पताल नहीं ले जाया गया, बल्कि उनको घटना स्थल पर ही मृत घोषित कर दिया गया, उनके शव को बिना डॉक्टरों से दिखाए, बिना पोस्टमार्टम किये बिरला हाऊस में रखा गया. जो गलत था, तात्कालिक सरकार को इतनी जल्दी क्या थी? दरअसल, गांधी की हत्या से जुड़े हर पहलू को नेहरू की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने अनावश्यक रूप से रहस्यमय बना दिया. देश के लोग आज तक ढेर सारे बिंदुओं से अनजान है. गांधी की हत्या क़रीब सात दशक से पहेली बनी हुई है. यहां तक कि गांधी के जीवन के निगेटिव पहलुओं को उकेरते हुए जितनी भी किताबें छपती थीं, सब पर सरकार की ओर से प्रतिबंध लगा दिया जाता था, जिससे बाद में लेखक-प्रकाशक कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते थे और कोर्ट के आदेश के बाद वह प्रतिबंध हटता था.

आज जब गाँधी की मौत को सभी राजनीतिक धाराओं ने हत्या मान लिया है, गाँधी सभी के लिए पोस्टर बॉय की तरह प्रयोग होने लगे हैं. उसके बाद भी इस बहस को समाज में बनाये रखना राजनीतिक मंच पर सियासी फायदा पहुंचा सकता है? ऐसा प्रतीत होता नज़र नहीं आ रहा है. फिर भी कोई मेरे से सवाल करता है कि गाँधी की हत्या या वध? तो मेरा जवाब ये होगा गाँधी की हत्या हो ही नहीं सकती है क्योंकि उनके विचार समुन्द्रमंथन् से निकला हुआ है, और मंथन में अमृत निकला वो गाँधी के हिस्से आया. वध पापी और राक्षसों का होता है, गाँधी पापी और राक्षस थे, ये मैं कतई नहीं मानता हूँ. अब आप विचार कर सकते हैं कि गाँधी क्या थे जो मेरे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करते हैं. गाँधी के विचारों से आने वाले भविष्य को भी ये सीख देने की कोशिश करता रहूँगा कि गाँधी को समझें, गाँधी को जिये और गाँधी के विचारों को विस्तार दें!

संदर्भ

  • https://www.newsstate.com/specials/exclusive/mahatma-gandhi-murderer-nathuram-godse-found-was-not-guilty-by-an-overwhelming-majority-if-says-justice-gd-khosla-bapu-109125.html
  • https://www.jansatta.com/national/savarkar-supported-jinnah-two-nation-theory-also-accused-in-mahatma-gandhis-murder-case/1158705/
  • https://hindi.news18.com/blogs/hari-govind/mahtma-gandhi-502075.html
  • क्रान्त, मदनलाल वर्मा (2006). स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास3 (1 संस्करण). नई दिल्ली: प्रवीण प्रकाशन.
  • Mahatma GandhiRichard Attenborough.(1982).The Words of Gandhi. NY:New Market Press.
  • गोपाल गोडसे.(2015). गाँधी वध क्यों ?. दिल्ली: हिन्द पॉकेट बुक.
  • नाथूराम गोडसे और गोपाल गोडसे.(2017).मैंने गाँधी का वध क्यों किया?. दिल्ली: साक्षी प्रकाशन.
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