कुमार कृष्णन
भारत की स्वतंत्रता का संघर्ष केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन का आंदोलन नहीं था। वह भारतीय समाज के आत्मसम्मान, स्वावलंबन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी अभियान था। यही कारण है कि महात्मा गांधी ने चरखा, खादी, स्वदेशी, ग्राम स्वराज, सत्य और अहिंसा के साथ-साथ भाषा को भी स्वतंत्रता का मूल प्रश्न माना। उनके लिए भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक नींव थी।
भागलपुर छात्र सम्मेलन में दिया गया गांधी का भाषण इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भाषण केवल हिंदी के समर्थन में नहीं, बल्कि मातृभाषा, भारतीय भाषाओं और राष्ट्रभाषा के व्यापक प्रश्न पर गांधी के समग्र चिंतन का दस्तावेज है। लगभग एक शताब्दी बाद भी यह भाषण आश्चर्यजनक रूप से समकालीन प्रतीत होता है, क्योंकि आज भी भारत शिक्षा, प्रशासन और ज्ञान की भाषा को लेकर उसी दुविधा से गुजर रहा है।
गांधी ने अपने भाषण में इंग्लैंड और अन्य यूरोपीय देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बच्चे अपनी मातृभाषा में पढ़ते हैं। विद्यालय में जो सीखते हैं, उसे घर जाकर माता-पिता, भाई-बहनों और पड़ोसियों तक पहुंचाते हैं। इस प्रकार शिक्षा केवल विद्यालय तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज का ज्ञान बन जाती है।
भारत की स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत थी। अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ा छात्र जो कुछ सीखता था, वह परिवार और समाज से साझा नहीं कर पाता था। गांधी ने इस स्थिति की तुलना उस कंजूस से की, जो अपना धन जमीन में गाड़कर रख देता है। ज्ञान का स्वभाव तो हवा की तरह फैलने का है, लेकिन विदेशी भाषा उसे सीमित कर देती है।
आज भी यह प्रश्न उतना ही प्रासंगिक है। देश के लाखों प्रतिभाशाली विद्यार्थी केवल इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि परीक्षा उनकी प्रतिभा की नहीं, अंग्रेज़ी पर पकड़ की हो जाती है। ज्ञान और भाषा के बीच यह असंतुलन सामाजिक असमानता को जन्म देता है।
गांधी ने भागलपुर में अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि “मातृभाषा का अनादर मां के अनादर के बराबर है।”
यह केवल भावुक अपील नहीं थी। गांधी जानते थे कि जिस समाज को अपनी भाषा पर विश्वास नहीं रहता, वह धीरे-धीरे अपनी संस्कृति, अपने इतिहास और अपनी बौद्धिक क्षमता पर भी विश्वास खो देता है।
उन्होंने उन लोगों की आलोचना की जो यह कहते थे कि भारतीय भाषाओं में आधुनिक विज्ञान, दर्शन या राजनीति की अभिव्यक्ति संभव नहीं है। गांधी ने इसका उत्तर देते हुए कहा कि किसी भाषा में शब्दों का अभाव उसका दोष नहीं होता। भाषा का विकास उसके बोलने वालों का दायित्व है।
उन्होंने याद दिलाया कि अंग्रेज़ी भी एक समय सीमित भाषा थी। अंग्रेज़ समाज ने उसे समृद्ध बनाया। यदि भारतीय अपनी भाषाओं को आधुनिक ज्ञान से नहीं जोड़ पाए, तो दोष भाषा का नहीं, हमारा होगा।
आज भारतीय भाषाओं में चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून और विज्ञान की शिक्षा शुरू करने के प्रयास गांधी की इसी सोच की पुष्टि करते हैं।
आज राष्ट्रभाषा का प्रश्न अक्सर राजनीतिक विवाद बन जाता है, लेकिन गांधी की दृष्टि कहीं अधिक व्यापक और संतुलित थी।
वे किसी भारतीय भाषा को दूसरी भाषा पर थोपने के पक्षधर नहीं थे। उनका मानना था कि भारत की प्रत्येक मातृभाषा समान सम्मान की अधिकारी है। बंगला, तमिल, उड़िया, मराठी, पंजाबी, गुजराती, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम या अन्य सभी भाषाएं भारत की सांस्कृतिक धरोहर हैं।
लेकिन साथ ही वे यह भी मानते थे कि इतने विशाल देश को जोड़ने के लिए एक ऐसी संपर्क भाषा आवश्यक है, जिसे अधिकांश भारतीय सहजता से समझ सकें। इसीलिए उन्होंने हिंदी या व्यापक अर्थ में हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखा।
उनकी राष्ट्रभाषा की अवधारणा एकता की थी, एकरूपता की नहीं।
अंग्रेज़ी से विरोध नहीं, प्रभुत्व से असहमति
गांधी के विचारों को अक्सर गलत ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, मानो वे अंग्रेज़ी के विरोधी थे। जबकि भागलपुर के भाषण में उन्होंने स्पष्ट कहा कि अंग्रेज़ी ज्ञान का विशाल भंडार है और उससे उनका कोई वैर नहीं है।
उनका विरोध केवल इस बात से था कि यदि पूरा ज्ञान अंग्रेज़ी में कैद रहेगा तो भारत की विशाल जनता उससे वंचित रह जाएगी।
उन्होंने तीन सरल प्रश्न उठाए—
नए ज्ञान की आवश्यकता पूरे समाज को है।
यदि नया ज्ञान केवल अंग्रेज़ी जानने वालों तक सीमित रहेगा, तो लोकतांत्रिक समाज की रचना कैसे होगी?
आज भी यही प्रश्न हमारे सामने खड़ा है। क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, चिकित्सा और विज्ञान का ज्ञान केवल अंग्रेज़ी जानने वालों तक सीमित रहेगा, या वह भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध होगा?
व्यवहार में भाषा का स्वदेशी
गांधी केवल सिद्धांत नहीं देते थे; वे व्यवहार बदलने का आग्रह करते थे। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे विद्यालय में जो अंग्रेज़ी में पढ़ें, उसका हिंदी में अनुवाद करें और अपने घरों में उसे साझा करें।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि एक बिहारी दूसरे बिहारी को अंग्रेज़ी में पत्र लिखता है, तो यह स्वाभाविक नहीं है। भाषा का उपयोग जीवन के व्यवहार में होना चाहिए, तभी उसका विकास होगा।
आज सोशल मीडिया, मोबाइल और इंटरनेट ने भारतीय भाषाओं को नई ऊर्जा दी है। लोग अपनी भाषाओं में लिख रहे हैं, पढ़ रहे हैं और संवाद कर रहे हैं। यह वही परिवर्तन है जिसकी कल्पना गांधी ने बहुत पहले की थी।
भागलपुर के भाषण में गांधी ने शिक्षा के उद्देश्य पर भी गहरी बात कही। उन्होंने विद्यार्थियों से पूछा कि शिक्षा का लक्ष्य क्या है—केवल नौकरी प्राप्त करना या चरित्र निर्माण?
उनका उत्तर स्पष्ट था कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य बनाना है। यदि शिक्षा केवल रोजगार का साधन बन जाएगी, तो समाज ज्ञानवान तो हो सकता है, लेकिन नैतिक नहीं।
मातृभाषा में शिक्षा इसलिए आवश्यक है क्योंकि वह व्यक्ति को अपने समाज, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ती है।
आज रोजगार-केंद्रित शिक्षा के दौर में गांधी का यह दृष्टिकोण नई बहस को जन्म देता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा को महत्व देने की बात कही है। अनेक राज्यों में इंजीनियरिंग और चिकित्सा की पढ़ाई भारतीय भाषाओं में प्रारंभ हुई है। राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी शब्दावली और डिजिटल अनुवाद की दिशा में भी कार्य हो रहा है।
यह परिवर्तन अचानक नहीं आया। इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि गांधी, रवींद्रनाथ ठाकुर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, काका कालेलकर और अनेक भारतीय चिंतकों के लंबे संघर्ष में निहित है।
हालांकि चुनौती अभी भी बनी हुई है। रोजगार, न्यायपालिका, उच्च प्रशासन और वैश्विक अवसरों में अंग्रेज़ी की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिए समाधान अंग्रेज़ी का विरोध नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं को समान अवसर देना है।
लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं चलता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक शासन, कानून, विज्ञान और नीति को अपनी भाषा में समझ सकें।
यदि कानून अंग्रेज़ी में हो, न्याय अंग्रेज़ी में हो, चिकित्सा अंग्रेज़ी में हो और उच्च शिक्षा भी अंग्रेज़ी में हो, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे अभिजात वर्ग का उपकरण बन जाता है।
गांधी इसी खतरे की ओर संकेत कर रहे थे। उनके लिए भाषा का प्रश्न लोकतंत्र का प्रश्न था।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन अनुवाद और डिजिटल तकनीक ने भारतीय भाषाओं के लिए नए अवसर खोले हैं। अब ज्ञान का अनुवाद पहले की तुलना में कहीं अधिक सरल हो गया है।
लेकिन तकनीक तभी सार्थक होगी, जब भारतीय भाषाओं में मौलिक ज्ञान का सृजन भी होगा। केवल अनुवाद से कोई भाषा महान नहीं बनती; शोध, साहित्य, विज्ञान और दर्शन का नया लेखन ही उसे जीवंत बनाता है।
गांधी की यह बात आज भी उतनी ही सटीक है कि भाषा का विकास स्वयं समाज को करना होगा।
भागलपुर छात्र सम्मेलन में महात्मा गांधी का भाषण हमें बताता है कि भाषा का प्रश्न किसी एक भाषा की श्रेष्ठता का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत के आत्मसम्मान का प्रश्न है। मातृभाषा व्यक्ति की चेतना का आधार है, राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता का सेतु है और विदेशी भाषा विश्व से संवाद का माध्यम हो सकती है; किंतु यदि विदेशी भाषा अपने ही समाज पर शासन करने लगे, तो सांस्कृतिक स्वराज अधूरा रह जाता है।
आज आवश्यकता गांधी की उसी संतुलित दृष्टि को अपनाने की है, जिसमें मातृभाषा का सम्मान, सभी भारतीय भाषाओं का समान आदर, राष्ट्रव्यापी संवाद के लिए एक संपर्क भाषा और वैश्विक ज्ञान के लिए विदेशी भाषाओं का विवेकपूर्ण उपयोग—ये चारों साथ-साथ चलें।
स्वतंत्र भारत की असली पहचान तभी बनेगी, जब उसका नागरिक अपनी भाषा में सोच सके, अपनी भाषा में सीख सके, अपनी भाषा में सृजन कर सके और आत्मविश्वास के साथ पूरी दुनिया से संवाद भी कर सके। गांधी का भागलपुर भाषण हमें यही सांस्कृतिक स्वराज का मार्ग दिखाता है।