– ललित गर्ग –
भारत ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि यदि संकल्प, वैज्ञानिक दृष्टि और नवाचार का संगम हो तो आकाश भी सीमा नहीं, बल्कि संभावनाओं का प्रारंभ बन जाता है। भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ का सफल प्रक्षेपण केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत, नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था और विज्ञान-प्रधान भविष्य की ओर बढ़ते राष्ट्र का एक नया घोषणापत्र है। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से ‘मिशन आगमन’ के अंतर्गत हुई यह ऐतिहासिक उड़ान भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक ऐसे स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि अब अंतरिक्ष विज्ञान केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निजी उद्यम भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत का नेतृत्व करेंगे। निश्चित ही विक्रम-1 नए भारत की अंतरिक्ष उड़ान का स्वर्णिम अध्याय एवं निजी अंतरिक्ष क्रांति की आकाशीय सफलताओं की नई जमीन है।
विक्रम-1 की सफलता उस महान वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई के स्वप्न को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिन्होंने कभी कहा था कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए अंतरिक्ष विज्ञान विलासिता नहीं, बल्कि विकास का अनिवार्य साधन है। आज उसी विचार की आधुनिक अभिव्यक्ति स्काईरूट एयरोस्पेस के रूप में दिखाई देती है, जिसने अपने पहले ही प्रयास में इतिहास रच दिया। यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है क्योंकि इस समय दुनिया में केवल कुछ ही देशों के निजी उपक्रम ऑर्बिटल रॉकेट विकसित कर पाए हैं। भारत अब उस विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है, जहां नवाचार, वैज्ञानिक कौशल और उद्यमशीलता मिलकर नई संभावनाओं का निर्माण कर रहे हैं। अमेरिका के स्पेसएक्स ने जिस निजी अंतरिक्ष क्रांति की शुरुआत की थी, भारत ने अब उसका अपना स्वदेशी संस्करण प्रस्तुत कर दिया है।
विक्रम-1 की तकनीकी विशेषताएं भी इसे विशिष्ट बनाती हैं। पूरी तरह कार्बन कंपोजिट से निर्मित यह रॉकेट अपेक्षाकृत हल्का, अधिक मजबूत तथा कम लागत वाला है। थ्री-डी प्रिंटिंग जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के उपयोग ने इसके निर्माण खर्च को उल्लेखनीय रूप से कम किया है। इसका सीधा अर्थ है कि भविष्य में छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण का वैश्विक बाजार भारत के लिए नए आर्थिक अवसर लेकर आएगा। आज दुनिया में संचार, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, रक्षा, आपदा प्रबंधन, इंटरनेट सेवाएं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों के लिए हजारों छोटे उपग्रहों की आवश्यकता बढ़ रही है। ऐसे में भारत कम लागत और उच्च विश्वसनीयता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकता है। ‘विक्रम-1’ को विकसित करने वाली निजी कंपनी ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर इस रॉकेट का नामकरण कर न सिर्फ उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है, बल्कि हमारे औद्योगिक घरानों को भी यह संदेश दिया है कि कारोबार करते हुए भी अपने देश की समृद्ध विरासत का सम्मान किया जाना चाहिए।
गौर कीजिए, अप्रैल 1975 में जब भारत ने अपना पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा था, तब उसका नामकरण महान खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्ट के नाम पर किया गया था। यह सफलता केवल एक कंपनी की उपलब्धि नहीं है। यह उस नई नीति का परिणाम भी है जिसके अंतर्गत भारत सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी निवेश और स्टार्टअप के लिए खोलने का साहसिक निर्णय लिया। नई अंतरिक्ष नीति, इन-स्पेस जैसी संस्थाओं की स्थापना तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए उदार प्रावधानों ने भारतीय युवाओं के सामने नए अवसरों के द्वार खोल दिए हैं। आज देश में अनेक स्पेस स्टार्टअप उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण प्रणाली, अंतरिक्ष संचार और डेटा सेवाओं के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह परिवर्तन भारत को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में मजबूत आधार प्रदान करेगा। किन्तु हर सफलता अपने साथ नई चुनौतियां भी लेकर आती है।
विक्रम-1 की पहली उड़ान सफल अवश्य रही है, परंतु अंतरिक्ष उद्योग में स्थायी सफलता केवल एक प्रक्षेपण से सुनिश्चित नहीं होती। स्काईरूट एयरोस्पेस को अब वैश्विक बाजार में स्पेसएक्स, रॉकेट लैब तथा चीन की अनेक निजी कंपनियों जैसी सशक्त प्रतिस्पर्धा का सामना करना होगा। नियमित ग्राहक, समय पर प्रक्षेपण, कम लागत, उच्च विश्वसनीयता तथा भविष्य में पुनः प्रयोज्य रॉकेट तकनीक विकसित करना उसकी अगली बड़ी परीक्षा होगी। अंतरिक्ष उद्योग में विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होता है और वह निरंतर सफल अभियानों से ही अर्जित किया जा सकता है। इस ऐतिहासिक सफलता के बीच एक गंभीर प्रश्न भी हमारे सामने खड़ा है-क्या इसरो अपनी वैज्ञानिक प्रतिभाओं को लंबे समय तक अपने साथ बनाए रख पाएगा? हाल के वर्षों में अनेक अनुभवी वैज्ञानिक निजी क्षेत्र की ओर आकर्षित हुए हैं। इसका कारण केवल अधिक वेतन नहीं, बल्कि बेहतर कार्य संस्कृति, अनुसंधान की स्वतंत्रता, त्वरित निर्णय प्रक्रिया और नवाचार के लिए अनुकूल वातावरण भी है।
इसरो ने भारत को चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य-एल1, गगनयान जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियां दी हैं। सीमित संसाधनों में विश्वस्तरीय परिणाम देकर इसरो ने पूरी दुनिया का सम्मान अर्जित किया है। किंतु यदि प्रतिभाशाली वैज्ञानिक धीरे-धीरे संस्थान से बाहर जाते रहे तो दीर्घकाल में अनुसंधान और राष्ट्रीय अंतरिक्ष कार्यक्रम प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए इसरो के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल नए मिशन तैयार करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रतिभाओं को प्रेरित, सम्मानित और संतुष्ट बनाए रखना भी है। सरकार को चाहिए कि इसरो के वैज्ञानिकों के लिए प्रतिस्पर्धी वेतन संरचना, अत्याधुनिक अनुसंधान सुविधाएं, निर्णय लेने की अधिक स्वतंत्रता तथा नवाचार को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां विकसित करे। सरकारी संस्थानों और निजी कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहयोग का वातावरण तैयार होना चाहिए। निजी क्षेत्र इसरो का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सहयोगी बन सकता है। जिस प्रकार अमेरिका में नासा और स्पेसएक्स मिलकर अंतरिक्ष कार्यक्रमों को नई ऊंचाइयों तक ले जा रहे हैं, उसी प्रकार भारत में इसरो और निजी कंपनियों का समन्वय देश को वैश्विक नेतृत्व प्रदान कर सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की भी है कि अंतरिक्ष विज्ञान को विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के स्तर तक पहुंचाया जाए। विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं का विषय न रहकर जन-आंदोलन बने। युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और नवाचारकर्ताओं को स्टार्टअप संस्कृति से जोड़ने के लिए विशेष प्रोत्साहन दिया जाए। यदि प्रत्येक राज्य में स्पेस टेक्नोलॉजी इनोवेशन सेंटर स्थापित किए जाएं, उद्योगों और विश्वविद्यालयों के बीच अनुसंधान साझेदारी विकसित की जाए तथा अंतरिक्ष तकनीक में निवेश को बढ़ावा दिया जाए तो भारत अगले दशक में विश्व का अग्रणी अंतरिक्ष नवाचार केंद्र बन सकता है। भविष्य की आकाशीय सफलताओं की नई जमीन तैयार करने के लिए कुछ रचनात्मक कदम अत्यंत आवश्यक हैं-इसरो और निजी कंपनियों के बीच संयुक्त अनुसंधान परियोजनाएं प्रारंभ हों; पुनः प्रयोज्य रॉकेट तकनीक और हरित प्रणोदन (ग्रीन प्रोपल्शन) पर विशेष निवेश किया जाए; अंतरिक्ष विनिर्माण के लिए स्वदेशी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत किया जाए; युवाओं के लिए अंतरिक्ष उद्यमिता को बढ़ावा देने वाले विशेष कोष बनाए जाएं; तथा अंतरिक्ष कानूनों को सरल, पारदर्शी और निवेश-अनुकूल बनाया जाए। साथ ही, अंतरिक्ष मलबे (स्पेस डेब्रिस) के प्रबंधन, पर्यावरणीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा, क्योंकि भविष्य का अंतरिक्ष विकास केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व का भी विषय है।
विक्रम-1 ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत अब केवल अंतरिक्ष में पहुंचने वाला देश नहीं, बल्कि अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने की क्षमता रखने वाला राष्ट्र बन चुका है। यह सफलता नए भारत के आत्मविश्वास, युवाओं की प्रतिभा और वैज्ञानिक सोच की विजय है। यह उस राष्ट्र की कहानी है जिसने कभी साइकिल और बैलगाड़ी पर रॉकेट के पुर्जे ढोए थे और आज निजी क्षेत्र के माध्यम से वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करा रहा है। वास्तव में, विक्रम-1 केवल एक रॉकेट नहीं, बल्कि भारत के वैज्ञानिक आत्मविश्वास का उड़ता हुआ प्रतीक है। यह सफलता हमें यह संदेश देती है कि यदि नीति, प्रतिभा, उद्योग और राष्ट्रीय संकल्प एक दिशा में आगे बढ़ें तो असंभव भी संभव बन जाता है। निजी क्षेत्र की यह सफलता विज्ञान में अभिरुचि रखने वाले भारतीयों के लिए एक आह्वान है- अंतरिक्ष सेनानिया करो प्रयाण, सारा आकाश तुम्हारा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इस ऐतिहासिक उपलब्धि को एक शुरुआत मानते हुए भारत अंतरिक्ष विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार की ऐसी मजबूत नींव तैयार करे, जहां इसरो की गौरवशाली परंपरा और निजी क्षेत्र की नई ऊर्जा मिलकर विश्व को नई दिशा दें। तभी सच अर्थों में यह कहा जा सकेगा कि अब केवल धरती ही नहीं, बल्कि पूरा आकाश भी भारत की नई विकास-गाथा का विस्तार बन चुका है।