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    मलेशिया जो मैंने अब तक देखा

    आज मैं मलेशिया में हूँ या यों कहिये कि मलेशिया में यह मेरा चौथा दिन है और मलेशिया के एक छोटे शहर करतेह में पहला दिन.अब करीब करीब चौबीस घंटे होने जा रहे हैं,जब मैं क़वालालम्पुर से यहाँ पहुंचा.
    मैंने सुना और पढ़ा था कि मलेशिया एक विकासशील मुस्लिम देश है,पर पिछले चार दिनों से मैं जो देख रहा हूँ उससे न तो यह एक विकासशील देश लग रहा है और न मुस्लिम बहुल देश.इससे दो बातें मेरे जेहन में उभरी है.एक तो यह कि अगर यह विकासशील देश है तो हमारा भारत किस श्रेणी में आएगा,क्योंकि जिस मलेशिया को मैंने अब तक देखा है उससे मुझे लगने लगा है कि अभी हमलोग इस देश से अनेक मामलों में अत्यंत पीछे हैं. दूसरी बात यह कि अगर यह मुस्लिम देश है,तो धर्म निरपेक्ष देश कैसा होता है?
    हाँ तो मैं वर्णन कर रहा था अपनी मलेशिया यात्रा का,जहाँ के लिए मैं सात अक्टूबर की रात्रि बेला में दिल्ली एअरपोर्ट से रवाना हुआ था.दिल्ली का नया एअरपोर्ट मुझे सचमुच अच्छा लगता है.क्या स्मार्ट एअरपोर्ट है?सच में नाज करने लायक है हमारा यह एअरपोर्ट.दिल्ली की गन्दगी और भीड़ से निकल कर सचमुच एक सकून का एहसास होता है.मैं मानता हूँ कि हम पूरी दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों को इतना भव्य नहीं बना सकते,पर क्या हम उतनी सफाई भी अन्य इलाकों में नहीं ला सकते?
    हम लोग यानि मैं और मेरी पत्नी दस बजे रात्रि में दिल्ली से रवाना हुए.साढ़े पांच घंटे की हवाई उड़ान समाप्त कर जब हमलोग क्वाला लम्पुर एअरपोर्ट पर उतरे तो मेरी घड़ी साढ़े तीन बजा रही थी,जबकि यहाँ सुबह के छः बज चुके थे.चूँकि हमलोगों को कुछ दिन यहाँ बिताने थे,अतः सबसे पहले मैंने अपनी घडी ठीक की.और तब धीरे धीरे इधर उधर नजर दौड़ाने लगा.सच कहूँ तो मुझे लगा कि हमारा भारत तो यहां से बहुत आगे है.ऐसे क्वाला लम्पुर का एअरपोर्ट कोई कम नहीं था ,पर दिल्ली एरपोर्ट के सामने यह कुछ नहीं था.साफ सफाई तो यहां भी कमनहीं थी.एअरपोर्ट में किसी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा.लोगों का व्यवहार बहुत ही मित्रवत था.कही भी किसी मुस्लिम संस्कृति का कोई ख़ास चिह्न नहीं दृष्टिगोचर हो रहा था.बुरका का तो कहीं नामोनिशान नहीं था.लगा कि यहाँ तो अधिकतर विदेशी हैं,अतः इस तरह का दृश्य आश्चर्य का कारण नहीं होना चाहिए.अभी भी लग रहा था कि बाहर निकलने पर सब कुछ बदला हुआ दिखेगा.
    ऐसे मुस्लिम देश की यह मेरी पहली यात्रा नहीं थी.इसके पहले मैं यू.ए.ई में एक सप्ताह बीता चूका था.वह २००४ की बात थीअबूधाबी,दुबई और शारजाह तीनों में मैं जा चूका था.वहां का भी बहुत मधुर अनुभव था.बेटे ने हम दोनों यानी पति पत्नी को एक पाकिस्तानी टैक्सी ड्राइवर के हवाले जो हमें प्रतिदिन सुबह लेकर निकल जाता था और शाम को होटल में छोड़ देता था.बेटे की उस समय वहां कोई गृहस्थी नहीं थी.वह एक बैचलर हॉस्टल में रहता था और हमलोगों के लिए बगल में एक होटल में प्रबंध कर दिया था.
    यहाँ हमलोगों को लेने के लिए बेटा,बहु और साढ़े सात वर्षीय पोता मौजूद थे.हमलोग एअरपोर्ट से बाहर निकले और फर्क समझ में आने लगा.न भीड़ भाड़ और न बेतरतीबी. अब हमलोग बाहर निकल गए थे और होटल (नोवोटेल)तक पहुँचने के लिए पचपन किलोमीटर का रास्ता तय करना था.मुझे लगा कि यह दूरी तय करने में एक से डेढ़ घंटें तो लग ही जाएंगे, पर जब बेटे ने कहा कि करीब पैंतालीस मिनट लगेंगे तो मुझे आश्चर्य अवश्य हुआ,क्योंकि अब हमलोग हाई वे पर तो थे,पर जब गाडी सड़क पर चली तो बात समझ में आने लगी.सड़क इतनी अच्छी थी कि मैं किसी विकासशील देश में शहर के बीच ऐसी सड़क की कल्पना भी नहीं कर सकता था.दिल्ली एअरपोर्ट से बाहर निकलने पर भी करीब दस किलोमीटर तक अच्छी सड़क है,पर उसके बाद?सबसे बड़ी बात तो लेन अनुशासन की थी.हॉर्न तो लगता था कियहां की गाड़ियों में है ही नहीं.ऐसा ही मैंने अमेरिका,कनाडा और यु,ए,ई.में भी देखा था,जबकि हमारे देश में,ख़ास कर उत्तर और पूर्व भारत में हॉर्न बजाते रहना शान और न बजाना नादानी समझी जाती है और लेन अनुशासन?
    यह किस चिड़िया का नाम है?
    क्वाला लम्पुर कैसा शहर है,तो विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं,पर एक दो बातों का बर्णन करना मैं आवश्यक समझता हूँ.
    पहला तो चिलप्पों और गन्दगी का अभावसड़क के किनारे या किसी अन्य जगह भी मुझे गन्दगी का नामोनिशान नहीं दिखा.हॉर्न की आवाज या अन्य तरह की कांव कीच कहीं भी सुनाई नहीं पड़ा.चिल्ड्रन पार्क हो या बाजार,सफाई तो हर स्थान पर दिखा.गन्दगी तो दिखा ही नहीं,ऐसे तो हमलोग क्वाला लम्पुर के सबसे अच्छे इलाके में ठहरे थे,वहां का वातावरण तो ऐसा था,जैसा मुझे अपने भारत के किसी शहर में नहीं दिखा.पता नहीं ,मुझे गन्दगी नहीं दिखा या इस नगर में गन्दगी है ही नहीं?हमलोग बहुत भीड़ भाड़ वाले इलाके में भी गए.वहां भीड़ अवश्य थी,पर न कोई बेहूदा हरकत न चिल्पों जिसके हम दिल्ली निवासी आदि हो चुके हैं.ये जगहें बहुत सजी धजी तो नहीं कही जा सकती,पर गन्दगी नहीं दिखाई दे रही थी.
    सबसे बड़ी बात जो नजर आई,वह यह थी कि एक मुस्लिम देश की राजधानी में अपने तीन दिवस के पड़ाव में मुझे केवल तीन बुर्काधारी महिलायें दिखीं.बेटे का मानना था कि वे मलेशिया निवासी नहीं हो सकती.हो सकता है कि उसका कहना सही हो,क्योंकि यहां करतेह में तो कोई महिला बुर्के में अब तक नहीं दिखीं.कारण शायद यही हो कि यहां पर्यटक तो हैं नहीं.क्वाला लामपुर में अधिकतर महिलायें मिनी स्कर्ट और मिनी पैंट में दिखाई पड़ रही थी. जींस वाली महिलाओं की संख्या भी बहुत ज्यादा थी,पर पारम्परिक पोशाक धरी महिलायें गिनी चुनी ही थीं.जींस वाली या पारम्परिक पोशाक वाली महिलाओं के सर पर हिजाब अवश्य था,पर अपने चेहरे किसीने नहीं ढके हुए थे.मेरे गाइड यानि मेरे बेटे के अनुसार मिनी स्कर्ट और मिनी पैंट वाली युवतियां या प्रौढ़ महिलाएं तो चीनी थी,जिनकी संख्या मलेशिया में बहुत ज्यादा है. जींस वाली युवतियां और प्रौढ़ा,खाकर जनके सर पर हिजाब था,मलेशिया की निवासी हैं.मैंने पुछा कि क्या यही यहां का आम पहनावा है,तो मुझे बताया गया कि यहां आम पहनावा तो कम कम ही दिख रहा है,पर छोटे शहरों में पारम्परिक पहनावा दिख जाएगा,पर बुर्क़ा नहीं.
    एक अन्य बात ने भी मेरा ध्यान आकृष्ट किया.मेन रोड के अच्छे दूकान में मैंने पोर्टेबल मंदिर बिकते हुए देखा और malashiaदेखा भगवान और भगवती की मूर्तियां बिकते हुए.भारतीय खाना खिलाने वाले एक रेस्त्रां में मैंने हिन्दू देवताओं के बहुत से फोटो भी टंगे हुए देखे.मैंने विवेकानंद आश्रम भी देखा और मोनो रेल से यात्रा करते हुए रस्ते में एक भव्य मंदिर के भी दर्शन हुए.मुस्लिम देश है,अतः मस्जिद तो होंगे ही.शायद इसीलिये उस तरफ मेरा ध्यान नहीं गया.
    अब हमलोग कर्तेह आ गए हैं, जहाँ पुत्र और पुत्रवधु के साथ हमें कुछ महीने बिताने हैं. यह एक छोटा शहर है,जहाँ सबसे महत्त्व पूर्ण स्थान मलेशिया के सबसे बड़े पेट्रोलियम कंपनी का तेल शोधक कारखाना.यद्यपि हमारा निवास तेल शोधक कारखाने से जयदा दूर नहीं है,तथापि तेल शोधक कारखाने के चलते होने वाले प्रदुषण का नामोनिशान नहीं.हमलोग तो उस हाई वे से आये जो क्वाला लम्पुर से निकल कर यहाँ से होते हुए थाई लैंड तक जाती हाई,अतः उसको तो अच्छा होना ही था.पर अच्छी बात यह लगी कि शहर के बीच वाली सड़कें भी चकाचक लगी.सड़कों के बीच बड़े की को कहे छोटे गड्ढे भी कहीं नहीं दिखे.इस शहर में लोगों की पोशाकें अवश्य ज्यादा पारम्परिक है, सर पर हिजाब है पर चहरे खुले हुए है.

    आर. सिंह
    आर. सिंह
    बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

    1 COMMENT

    1. इस लेख के बाद भी करीब पंद्रह दिन होने जा रहे हैं मलेशिया में.मलेशिया एक धनी देश है,अतः यहाँ झुग्गियों का न दिखना कोई आश्चर्य नहीं है,पर सम्पन्नता और सफाई कासीधा सम्बन्ध मैं नहीं मानता.हर जगह सफाई का श्रेय मैं यहाँ के निवासियों को देता हूँ.

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