लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

पश्चिम बंगाल में संकीर्ण राजनीतिक पांसे तेजी से फेंके जा रहे हैं। इससे सामाजिक जीवन में अनुदार भावबोध पुख्ता होगा। इसे चालू भाषा में बौनी राजनीति कहते हैं। बौनी राजनीति वे करते हैं जिनके पास राष्ट्रीय विज़न नहीं होता। ममता बनर्जी के सत्ता में आने के साथ यह उम्मीद जगी थी कि राज्य सरकार नीतिगत बौनेपन से बाहर निकलेगी।लेकिन विगत एक साल में पश्चिम बंगाल में नीतिगत संकीर्णतावाद से निकलने की बजाय और भी ज्यादा अनुदार भावों-विचारों के हमले तेज हुए हैं।

ममता सरकार की विशेषता है राष्ट्रीयविज़न का अभाव और अंध-वाम विरोध।यह वस्तुतःजनघाती नजरिया है। राजनीति विशेषज्ञ आशाए लगाए बैठे थे कि अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन से मिलने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आंतरिक कट्टरता खत्म होगी। लेकिन हुआ एकदम उलटा। अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन ने ममता बनर्जी को जब राज्य में अमेरिकी पूंजी निवेश का आश्वासन दिया था तो उनके दिमाग में यह था कि राज्य में सेजनीति है और अमेरिकी धनाढ़्यों को पश्चिम बंगाल में धन लगाने के लिए प्रेरित करने में कोई खास दिक्कत नहीं होगी। लेकिन अभी ममता-हिलेरी मुलाकात की खबरों की स्याही सूखी भी नहीं थी कि ममता सरकार ने सेजनीति खत्म करने का फैसला कर लिया।

सेजनीति के खत्म होने का अर्थ है कि आने वाले समय में पश्चिम बंगाल में कोई औद्योगिक निवेश नहीं आने वाला। देशी-विदेशी इजारेदार और बहुराष्ट्रीय कंपनियां सेज के अभाव में पश्चिम बंगाल में पूंजी निवेश के लिए आने वाली नहीं हैं। वैसे भी ममता सरकार की निष्क्रियता और गिरती साख के कारण विगत अक साल में एकदम पूंजी निवेश नहीं हुआ । न कोई नया कारखाना खुला और नहीं किसी पूंजीपति ने इस राज्य में दिलचस्पी ली। सिर्फ मीडिया इवेंट के प्रचार-प्रसार में विगत एक साल खत्म हुआ है।

लोग आस लगाए बैठे थे कि ममता बनर्जी दूसरे साल के आरंभ होने पर कुछ नये कदम उठाएंगी लेकिन उनको निराशा हाथ लगी है।अपनी सरकार के एक साल पूरा होने पर सार्वजनिक तौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि राज्य सरकार ने 3लाख लोगों के लिए नए पद सृजित किए हैं। कई लाख लोगों को वे निजी क्षेत्र में रोजगार मिलने के चांस हैं।लेकिन व्यवहार में उन्होंने किया उलटा। राज्य की 2003 में बनी सेजनीति खत्म करने का फैसला ले लिया। इससे राज्य में औद्योगिक विकास की संभावनाएं पूरी तरह खत्म हो गई हैं। इस फैसले का दोमुंहापन जगजाहिर है। मसलन् वामशासन में सेजनीति के तहत लिए गए फैसलों को बरकरार रखा गया है। साथ ही कई कंपनियों को आगामी वर्षों के लिए एक्सटेंशन भी दिया है। खडगपुर स्थित श्रेई इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी को ममता सरकार ने सेज नीति के तहत एक्सटेंशन दिया है। पूर्व सरकार के सेज संबंधी फैसले नहीं बदले जाएंगे। यानी पूर्व फैसलों पर सेजनीति लागू रहेगी। लेकिन नए फैसले नहीं लिए जाएंगे।

दूसरी समस्या यह है कि मौजूदा सेज प्रकल्पों को किस नीति के तहत जारी रखा जाएगा ? सेजनीति जब खत्म हो गयी है तो पुराने सेज फैसलों पर किस नीति के तहत फैसले लिए जाएंगे? मुश्किल यह है कि ममता सरकार माओवादियों के विज़न के आधार पर राज्य की अर्थव्यवस्था को दुरूस्त करना चाहती है। भारत में सभी राज्यों में सेज नीति लागू है। अब सिर्फ पश्चिम बंगाल में सेज नीति नहीं होगी। कारपोरेट घराने सेज के तहत जहां बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं वहां पर पूंजी निवेश करने जा रहे हैं। उल्लेखनीय है पश्चिम बंगाल में सेजनीति 2003 में बनाई गई थी। लेकिन 23मई 2012 को राज्य की मंत्रीमंडलीय उपसमिति ने सिफारिश की है कि राज्य की 2003 की सेजनीति को खत्म कर दिया जाए। उम्मीद है कि इस महीने के अंत में मंत्रीमंडलीय उपसमिति का फैसला मंत्रीमंडल के सामने रखा जाएगा। कायदे से ममता सरकार में शामिल अन्य मंत्रियों, खासकर कांग्रेस के मंत्रियों को इस मसले पर खुलकर बोलना चाहिए और उपसमिति के फैसले को एकसिरे से खारिज करने के लिए दबाब डालना चाहिए।

एक अन्य मुश्किल यह भी है कि केन्द्र में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में साझीदार है, और केन्द्र सरकार राष्ट्रीय सेजनीति से प्रतिबद्ध है। फलतः केन्द्र में ममता बनर्जी का दल भी सेज से बंधा है। उल्लेखनीय है पहलीबार जब सेज के बारे में बातें हुई थीं तो ममता बनर्जी ने इस नीति का समर्थन किया था। सन् 1997-2000 के बीच में आयात-निर्यात नीति हुआ करती थी, उसको ही कुछ संशोधनों के बाद सन् 2000 में विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति (सेजनीति) के नाम से लागू किया गया। इसके तहत कंपनियों को विभिन्न किस्म के करों में रियायतें दी गयी हैं। ममता बनर्जी ने न तो कभी आयात-निर्यात नीति का विरोध किया और न कभी राष्ट्रीयसेज नीति का ही विरोध किया। सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन के दौरान नक्सलियों के प्रभाव के चलते ममता बनर्जी ने पहलीबार सेज का विरोध किया था और विधानसभा चुनाव घोषणापत्र में सेजनीति समाप्त करने का वायदा किया था।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का तर्क है कि उनके दल ने चूंकि चुनाव में सेजनीति रद्द करने का वायदा किया था अतः उन्होंने सेजनीति रद्द करके अपने चुनावी वायदे का पालन किया है। यह तर्क बेहद खतरनाक है और इसके आधार पर किसी भी राज्य में स्थिर आर्थिक विकास को सुनिश्चित नहीं बनाया जा सकता है। राज्यों में हर पांच साल में नई सरकारें आती हैं।यदि विगत सरकार का कोई नीतिगत फैसला राज्यनीति तक ही सीमित है तो उसे बदला जा सकता है ,लेकिन यदि कोई नीतिगत फैसला राष्ट्रीय नीति के परिप्रेक्ष्य और समर्थन में लिया गया है तो उसे नहीं बदला जा सकता।

सभी राज्य सरकारों की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वे अपने यहां केन्द्र सरकार की नीतियों को लागू करें। राष्ट्रीय सेजनीति भारत की संसद से पारित नीति है , उसे लागू करना प्रत्येक राज्य की जिम्मेदारी है। एक अन्य पक्ष यह भी है कि जब एकबार केन्द्र को कोई राज्य सरकार आश्वासन देती है तो आने वाली सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उसका पालन करे।

राष्ट्रीय नीतियों के मामले में यदि ममता बनर्जी क्षेत्रीयतावाद के हथियार का प्रयोग करती हैं तो इससे राज्य के विकास में अनेक बाधाएं आएंगी। ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई दल केन्द्र में सत्ता में रहे, और राज्य में केन्द्र की नीतियों का अनुमोदन न करे। दूसरी ओर यह कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व की भी समस्या है कि उनके यूपीए गठबंधन में एक ऐसा दल सरकार में है जो नव्य आर्थिक उदारतावाद की एक महत्वपूर्ण नीति,राष्ट्रीय सेज नीति ,को नहीं मानता तो क्या राजनीतिक तौर पर ऐसे दल को केन्द्र सरकार में रखना सही होगा?

4 Responses to “राष्ट्रीयविज़न के बिना ममता बनर्जी की बौनी राजनीति”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbalhindustani

    ममता को वामपंथियों की ग़लती का लाभ मिला जो जनता को 5 साल भुगतना ही होगा अलबत्ता ममता ने लालू करुणनिधि और माया की तरह दिखाना शुरू कर दिया है की वे चुनाव तो जीत सकते है लेकिन सफल सरकार चलाने का अगेंडा उनके पास नही है.

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  2. आर. सिंह

    आर.सिंह

    ममता बनर्जी अपने हीं जाल में फंस गयी है.ममता बनर्जी ने वाम पंथी सरकार को हटाने के लिए सफल आन्दोलन चलाया .उसके लिए वे प्रसंशा की अधिकारी हैं.अपने चौंतीस वर्ष के कुशासन में वाम पंथियों ने बंगाल को जिस हालत में पहुंचा दिया था,लोग उससे छुटकारा पाने के लिए तडफडा रहे थे.ममता को उसका और उनके अपने जुझारू व्यक्तित्व का लाभ मिला और उन्होंने बंगाल की सत्ता हथिया ली.पर आज तो यह लग रहा है है कि उनके पास बंगाल को उसके उस हालत से बाहर निकालने का कोई कार्यक्रम नहीं था.लगता है कि वे हमेशा चापलूसों से घिरी रहीं हैं,जो उनकी छत्रछाया में पलते रहे हैं.अगर एक नारी वाम पंथ जैसे तंत्र को ललकार सकती है और जान की बाजी लगाने के लिए तैयार है तो उसके पीछे चलने वाले तो मिल ही जायेंगे.ममता बनर्जी का सबसे बड़ा आधार तल था,बंगाल के बुद्धिजीवियों का सहयोग.पर वे भूल गयीं कि बुद्धिजीवियों का सहयोग अपनी एक कीमत माँगता है.बुद्धिजीवी पीछ लगू नहीं होते.उनका एक नजरिया होता है,जो बुद्धिजीवी वाम पंथ को सहयोग दे रहे थे उनका नजरिया अलग था,पर ममता इस बात को अभी भी नहीं समझ पा रहीं है कि जो बुद्धजीवी उनका साथ दे रहे थे.वे उनसे कुछ अलग की अपेक्षा कर रहे थे.आज एक वर्षों के मामता के शासन काल में उनका भी मोह भंग हुआ है.
    अगर वाम पंथ के बंगाल के शासन काल के अंत के कुछ वर्षों पर नजर डाला जाए तो उन्होंने अपनी नीतिगत दुर्बलता समझ ली थी और वे भी बदलने का प्रयास कर रहे थे,पर एक तो उनका कैडर यह सब समझ पाने में असमर्थ हो रहा हा,दूसरे कैडरों में भ्रष्टाचार इतना बढ़ चुका था कि जनता उनको पूरी तरह नकार चुकी थी.डर का माहौल जिसके कारण वे अपनी धाक जमाने में कामयाब रहे थे,ममता के दुसाहस के कारण धीरे धीरे समाप्त हो रहा था.
    नंदी ग्राम या उसके बाद के आन्दोलनों पर नजर डाला जाय तो क्या ऐसा नहीं लगता कि ये आन्दोलन एक तरह से परिवर्तन के इच्छुक वाम पंथियों के विरुद्ध कट्टर वाम पंथियों का आन्दोलन था.मैंने उस समय भी टिप्पणी की थी कि ममता बनर्जी वाम पंथियों के अस्त्र से वाम पंथियों को निशाना बना रहीं है.आज उसका नतीजा सामने है.ममता बनर्जी दिग्भ्रमित है.पर अफ़सोस तो यह है कि शायद अब भी उन्हें पता नहीं चल रहा है कि वे दिग्भ्रमित हैं सच पूछिए तो वाम पंथ शासन के अंतिम काल आते आते बंगाल की आर्थिक स्थिति .इतने खराब हो चुकी थी कि उसे दिवालिया घोषित किया जा ससकता था.वह तो केंद्र में मिलीजुली सरकार की मजबूरी थी जिसने बंगाल को २००४ से जिन्दा रखा है.वाम पंथ सरकार ने इसको अंत में समझ लिया था,इसीलिये नंदीग्राम और सेज का मार्ग अपनाया था,पर उनकी विगत कालीन नीतियों के चलते वही उनके कफ़न में अंतिम कील साबित हो गया.ममता को जो उसी के बल पर सत्ता में आयी थी,अब अपना मार्ग ढूंढना कठिन हो रहा है.रेल मंत्री के अपने काल में और उसके बाद अपने चाटुकार को वहां बैठा कर रेल मंत्रालय का जो बुरा हाल उन्होंने किया है,उसका दूसरा उदाहरण मिलना कठिन है.एक दो वर्ष तक तो ऐसे भी केंद्र पर दबाव डाल कर वे अपना काम निकाल लेंगी.पर उनकी दुधारी तलवार का वार बंगाल के साथ पूरे राष्ट्र को रसातल में ले जा रहा है,यह समझना अब कठिन नहीं रह गया है.
    मैं यह नहीं कहता कि ममता जिस सुधार की राह में रोड़े अटका रही है ,वह सब रोगों की दवा है,पर कुछ न करने से कुछ करना हमेशा अच्छा होता है.ममता बनर्जी क्या सोच कर यह सब कर रही हैं,यह तो नहीं पता,पर जिस मार्ग पर वह चल रहीं हैं, मेर विचार से वह मार्ग न केवल बंगाल को,बल्कि पूरे राष्ट को रसातल में ले जाने वाला सिद्ध होगा.

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  3. GGShaikh

    पश्चिम बंगाल को और वहां की आम जनता को हम खुशहाल देखना चाहते है…ममता जी रोड़े न डालिए. रेलवे तंत्र में कुछ ख़ास हम ने नहीं देखा आपके शासन काल में…अपने विरोधी बुद्धि- जीवियों की बातों को नज़रंदाज़ मत कीजिए…ऐसे बहुत हैं बंगाल में जिनके सहयोग से पश्चिम बंगाल में सुख-सुविधा और समृद्धि लाई जा सके…’सेज’ नीति के बारे में पुनर्विचार अती आवश्यक है…आपको सब ‘दीदी’ कहते हैं तो दीदी होने का दाइत्व निर्वाह कीजिए…और बंगाल के लोगों को आजीविका प्रदान कर उन्हें और मेहनतकश बनाइये…और उनके भविष्य के सुखों को सुनिश्चित कीजिए…

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  4. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    वर्षों पहले विदेशी साम्रज्यवादी शाशकों ने पुरलिया में हथियार क्यों गिराए थे? भारत के मुख्यमंत्रियों में से सिर्फ ममता से ही ‘मिलने’ की घटिया हरकत अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने क्यों की?बंगाल का आंचलिक पूंजीवाद समर्थक मीडिया और वे लोग जो ‘ अतिवाम’ के नाम से कुख्यात हैं और वे लोग जो सिर्फ ‘परिवर्तन’ को हवा देने के भ्रम में वेबकूफ बने -ये सभी आज के बंगाल में हो रहे बलात्कार,लूट,हत्याओं और किसानों की आत्म हत्याओं पर’मुसीका’ क्यों लगाए हुए हैं? बंगाल के क्रन्तिकारी साथियों की शहादत का असर अभी बाकि है .ममता रूपी मृगमरीचिका से मुक्त होकर बंगाल की जनता पुन; प्रगतिशील वामपंथ के रस्ते पर अग्रसर होगी.वामपंथ को जो अभी विपक्ष की भूमिका दी गई उसे सही ढंग से निभाने और अपनी गलतियों,चूकों से सीखने का दौर है. जनता को एक बार बरगला के ममता सत्ता में भले ही आ गई किन्तु ही काठ की हांड़ी द्वारा न चढ़ पाए यह न केवल बंगाल के मेहनतकशों की बल्कि देश के सजग प्रहरियों की भी नैतिक जिम्मेदारी है. वर्ना वैश्विक ताकतें क्षेत्रीयता को भड़काकर भारत राष्ट्र को मज़बूत नहीं होने देंगी. इन ताकतों की कुल्हाड़ी में जो बेंट लगा है उसी का नाम ‘ममता’ है. इस पूंजीवादी कुल्हाडी से काटने वाली आवाम को जागरूक करने में आदरणीय जगदीश चतुर्वेदी जैसे सच्चे देश भक्त जुटे है ,उन्हें धन्यवाद…प्रवक्ता.कॉम की टीम को और युवा साथी संजीव सिन्हा जी को साधुवाद…की वो प्रवक्ता .कॉम पर इतने सही और सम सामयिक विषयों को देश हित में प्रस्तुत करने में महती भूमिका अदा कर रहे हैं.

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