हिन्दुस्तान के मस्तक की मणि मणिकर्णिका द क्वीन ऑफ झांसी’

विवेक कुमार पाठक
ब्रिटानी हुकूमत को अपने शौर्य से हिला देने वाली झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई का शौर्य एक दफा फिर सिनेमा के पर्दे पर मणिकर्णिका ‘‘द क्वीन ऑफ झांसी’’ के रूप में साकार होने जा रहा है। यह फिल्म हिन्दुस्तान में किस जज्बात से देखी जाएगी इसका ट्रेलर इसके टीजर ने ही दिखा दिया है। कंगना रनौत की केन्द्रीय भूमिका  वाली इस पीरियड फिल्म का टीजर रिलीज होने के कुछ घंटों में ही 1 करोड़ लोगों द्वारा देखा जा चुका था। टीजर में सफेद घोड़े पर सवार रानी लक्ष्मीबाई जब दासता के प्रतीक यूनियन जैक को तलवार से भेदते हुए दिखती हैं तो रोयां रोयां खड़ा हो जाता है।
ये स्वाभाविक प्रतिक्रिया ही भारत में महारानी लक्ष्मीबाई के प्रति अगाध श्रद्धा को बयां करती है। 
1857 के संग्राम में ब्रिटानी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का जो युद्ध शुरू हुआ उसमें झांसी की रानी का नाम अदम्य शौर्य और वीरता के लिए अमर हो गया है। रुपहले पर्दे से समाज और कला के विभिन्न मंचों तक रानी लक्ष्मीबाई को देशवासियों ने अपने अपने तरीकों से पूजा है।
महारानी लक्ष्मीबाई पर मणिकर्णिका फिल्म हम नए साल में 25 जनवरी 2019 को देख पाएंगे।
इस फिल्म में कंगना रनौत तलवार से फिरंगियों को खदेड़ती हुई हिन्दुस्तान के सिनेप्रेमियों की स्मृति में रानी लक्ष्मीबाई की छवि में दर्ज हो जाएंगीं। कंगना के सिने करियर में महारानी लक्ष्मीबाई की केन्द्रीय भूमिका उन्हें नया मुकाम देने वाली होगी।
अब तक कंगना हिन्दी सिनेमा में पर्दे पर और पर्दे के बाहर विद्रोही स्वभाव की अदाकारा के रुप में सामने आयी हैं। तनु वेड्स मनु और तनु वेड्स मनु रिटर्न दोनों में कंगना का किरदार परंपरागत नायिका की फ्रेम को तोड़ता नजर आता है। फिल्म में बिंदास तनु उर्फ तनुजा त्रिवेदी और हरियाणवी एडलीट कुसुम सांगवान के डबल रोल में वे अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहीं थीं। फैशन में उनका किरदार भी नायिका के परंपरागत किरदार से जुदा था। मणिकर्णिका के लिए अगर जी स्टूडियो और निर्माता कमल जैन ने उन्हें चुना है तो इसके लिए उनका स्पष्टवादी और कुछ हद तक विद्रोही अवचेतन भी निर्देशक के ध्यान में रहा होगा।
पर्दे पर अभिनय करते समय कलाकार खुद को आधा बदल सकता है पूरा नहीं।
मणिकर्णिका में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ तलवार उठाई वही अदाकारा न्याय कर सकती थी जो वीर रस के भाव को अपने अंर्तमन में समाहित किए हो। हिन्दी सिनेमा में शेखर सुमन से लेकर ऋतिक रोशन से हुए निजी विवाद में कंगना रनौत का विद्रोही स्वभाव मीडिया की सुर्खी बना था। ये फिल्मकार की कुशलता होगी अगर वो विद्रोही भाव अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मणिकर्णिका के फिल्मांकन में वे कंगना रनौत के अंदर से निकलवा सकें। मणिकर्णिका से पहले महारानी लक्ष्मीबाई पर पूर्व में भारत की पहली मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन भी फिल्म बनाना चाहती थीं। अगर ये फिल्म बनती तो दर्शक समय फिल्म में एसीपी के सख्त रोल में दिखीं सुष्मिता को अश्वारोही लक्ष्मीबाई के रुप में देख पाते।
सिनेमा के अलावा हिन्दुस्तान की माटी को अपनी वीरता और लहू से पावन बनाने वाली लक्ष्मीबाई का किरदार स्कूलों के सालाना कार्यक्रमों से लेकर अनगिनत मंचों पर तमाम बालिकाएं युवतियां और महिलाएं निभाते आ रही हैं।
लक्ष्मीबाई का चरित्र है ही ऐसा जो हमेशा से अनुकरणीय है।
 आजादी के 5 साल बाद ही 1953 में वीरता की प्रतिमूर्ति महारानी लक्ष्मीबाई पर बनी फिल्म मुंबई सिनेमा में दर्ज हो गई थी। फिल्म प्रख्यात फिल्मकार सोहराब मोदी ने बनाई जिसका नाम था झांसी की रानी। खास बात रही कि इस फिल्म में सोहराब मोदी की पत्नी मेहताब रानी लक्ष्मीबाई के किरदार में अंग्रेजों से स्वतंत्रता का युद्ध लड़ते नजर आयीं। बिना रंगीन सिनेमा के भी इस फिल्म में पर्दे पर महिला सशक्तिकरण और भारतीय नारी के अदम्य साहस और वीरता को पर्दे पर अमर कर दिया। इस फिल्म के पहले और बाद में तमाम प्रयास हुए होंगे मगर लेखक के ज्ञान की उड़ान उन सभी तक पहुंचने के लिए अभी प्रयासरत ही है।
लक्ष्मीबाई का किरदार सिनेमा के बड़े पर्दे के बाद टीवी के छोटे पर्दे पर बखूबी साकार हुआ है। कुछ साल पहले पुनर्विवाह सीरियल में भावपूर्ण अभिनय करने वाली टीवी कलाकार कृतिका सेंगर ने महारानी लक्ष्मीबाई के पात्र को खुलकर जिया था। इस सीरियल में मनु के बचपन की वीरता को तब बाल कलाकार उल्का गुप्ता ने जीवंत बना दिया था। महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता सिनेमा, साहित्यिक कार्यक्रमों के साथ सांस्कृतिक आयोजनों में भी निरंतर गूंजती रही है। ग्वालियर में मप्र के उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया के द्वारा आयोजित किया जा रहा राष्ट्रीय वीरांगना बलिदान मेला अब भारत का बहुत बड़ा शहीदी मेला बन गया है।  यह मेला महारानी की शहादत को नमन करने के लिए साल 2000 से प्रति वर्ष 17 व 18 जून को ग्वालियर में आयोजित होता आ रहा है। मेले में वीरांगना लक्ष्मीबाई की समाधि के सामने 300 कलाकारों द्वारा प्रस्तुत भव्य महानाट्य खूब लड़ी मर्दानी और अखिल भारतीय कवि सम्मेलन  देश दुनिया तक महारानी की वीरता को गुंजायमान करते हैं। इस मेले में कर्णम मल्लेश्वरी से लेकर पर्यावरणविद वंदना शिवा तक देश की प्रख्यात महिलाएं वीरांगना अलंकरण से सम्मानित हो चुकी हैं। ग्वालियर में महारानी की शहादत को आदरांजलि का बड़ा आयोजन आजादी से पहले भी हुआ था। तब 18 जून 1938 के दिन महाराज बाड़े पर महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान को नमन करने स्वातंत्र्य वीर सावरकर आए थे। देश की वीरांगना को नमन करने का यह आयोजन प्रख्यात राष्ट्रवादी और गांधीवादी चिंतक एवं मुंबई की अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त रुरल इंडिया अंग्रेजी पत्रिका के संपादक पंडित गोपाल कृष्ण पौराणिक की अगुवाई में प्रारंभ हुआ। तब महाराज बाड़े से महारानी लक्ष्मीबाई की समाधि तक नगरवासी और प्रबुद्धजन वीरांगना को श्रद्धासुमन अर्पित करने सड़कों पर निकले थे। इस ऐतिहासिक क्षण का अध्ययन ग्वालियर के इतिहासकार रामगोपाल गुप्त की पुस्तक सर्वतोभद्र क्रांति के पुरोधा पंडित गोपाल कृष्ण पौराणिक में शब्दश किया जा सकता है।
देश के लिए मर मिटने वाली बेटियों और वीरांगनाओं को याद करने का ये प्रवाह समाज में निरंतर चलता रहेगा।  बनारस के मणिकर्णिका घाट पर शूटिंग से प्रारंभ होने वाली कंगना रनौत की मणिकर्णिका एक ऐसा ही प्रयास है।
 ये फिल्म उस महान योद्धा के लिए है जिसकी वीरता के लिए अंग्रेजी अफसर ने लिखा था कि युद्ध में तलवार भांजने वाले भारतीयों में वो इकलौती मर्द दिखती हैं हालांकि महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता मर्द और स्त्री के विभाजन से बहुत ऊपर सर्वत्र पूज्यनीय है।  मणिकर्णिका फिल्म को देखकर हम 1857 के संग्राम के लिए होम होने वाली महारानी लक्ष्मीबाई को जितना ज्यादा गहराई से जान पाएंगे कंगना रनौत लक्ष्मीबाई के किरदार में उतनी ही सफल कहलाएंगी।
वे हिन्दुस्तान के माथे की मणि बनने और दिखने जा रही हैं।

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