लेखक परिचय

दीपक कुमार

दीपक कुमार

अमर उजाला में कार्यरत

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2005 की बात है, बिहार में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे। जनता ने जदयू और भाजपा को सरकार चलाने का आदेश दिया था लेकिन मुझे उस वक्त लगा कि यह जनाधार भाजपा को नहीं बल्कि एक इंजीनियर दिमाग के संघर्षशील सितारे को मिली है जिसने लालू के जंगलराज को खत्म करने के सपने दिखाए और लोगों ने उन पर भरोसा भी जताया।  जी हां, यहां बात नीतिश कुमार की ही हो रही है। जो लोग बिहार की राजनीति को समझते हैं उन्हें बखूबी पता है कि यहां जाति की बुनियाद बेहद मजबूत है। लेकिन नीतिश कुमार के आने के बाद विकास की राजनीति  जाति की राजनीति पर हावी होने लगी थी। एक बार को लगा कि बिहार जाति की राजनीति के  मिथक को तोड़ेगा। लेकिन आज दस साल बाद बिहार एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ा है जहां से रास्ता जाति का खुला था। और अफसोस इस राजनीति को एक बार फिर हवा मिली है तो नीतिश कुमार के जरिए, हां यह अलग बात है कि इस बार उनकी मदद लालू यादव भी कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच एक और चेहरा बिहार की राजनीति में उभर कर आ गया है वह कोई और नहीं बल्कि निर्वासित मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी हैं।  जीतन राम मांझी की राजनीति ने कांशीराम के उस दौर की याद दिला दी है, जब वे सत्ता की मास्टर चाबी हासिल करने के लिए कभी हाथ मिलाते थे तो कभी झटक कर चल देते थे। 70 के दशक के आखिरी साल में कर्पूरी ठाकुर को किन लोगों ने अपमानित किया बिहार की राजनीति जानती है। कर्पूरी को कुर्सी से हटाकर एक दलित चेहरा खोजा गया, रामसुंदर दास का। जिन्हें सवर्ण नेताओं के समूह और जनसंघ ने समर्थन दिया था। दिक्कत यह है कि आप जीतन राम मांझी को सामाजिक न्याय के प्रतीक से अलग भी नहीं कर सकते, लेकिन उस सियासत से आंख भी बंद नहीं कर सकते जो दिल्ली से पटना तक में इस प्रतीक के नाम पर खेली जा रही है। नैतिकता और न्याय सियासत में कब पाखंड है और कब प्रतीक यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप नीतीश को पसंद करते हैं या नरेंद्र मोदी को या फिर मांझी को। दिलचस्प बात यह है‌ कि जिन तीन दलों ने मांझी को पद से हटाया है उन सभी में वे पहले रह चुके हैं। कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू। लेकिन मांझी के झटके से वे दल भी उबर नहीं पाएंगे, जिनमें मांझी नहीं हैं। जेडीयू से बर्खास्त मांझी इस्तीफा नहीं दे रहे हैं और दूसरी तरफ विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद भी नीतीश कुमार शपथ नहीं ले पा रहे हैं। राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी की किस्मत ही कुछ ऐसी है कि वे जहां भी जाते हैं, यूपी विधानसभा की स्थिति पैदा हो जाती है। मांझी की त्रासदी यह है कि कोई इन्हें अपनी नाव का खेवनहार नहीं बनाना चाहता, बल्कि सब मांझी को नाव बनाकर खेवनहार बनना चाहते हैं। मांझी हैं कि तूफान का मज़ा लेना चाहते हैं। यह मजा कब सजा में बदल जाएगी मांझी को अभी इसका एहसास शायद न हो लेकिन  इंतजार कीजिए 20 फरवरी का, मांझी बह‌ुमत पेश करें या न करें बिहार की राजनीति अभी उफान पर आनी बाकी है।
दीपक कुमार

One Response to “मौजों की रवानी में मांझी”

  1. sureshchandra.karmarkar

    श्री जीतनराम मांझी २० फ़रवरी को जीतें या हारें यह महत्वपूर्ण नही. महत्वपूर्ण यह है की तीनो धर्म निरपेक्ष दल,दलितों को ऊँचा उठाने की हामी भरने वाले दल बेनकाब हो गएँ हैं। जैसा की आपने कर्पूरी ठाकुर के बारे में बताया जनसंघ भी इस कारगुजारी से गुजर चूका है. आखिर ये दल कब जातिगत राजनीती करने से बाज आयेँगे.?एक बात है की जीतनराम ,कठपुतली तो सिद्ध नही हुए. वे टक्कर दे रहे हैं. और अपनी अस्मिता कायम रखे हैं.

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