मैन्युअल स्केवेंजिंग : अमानवीय प्रथा खत्म हो पाएंगे?

भारत में “मैनुअल स्केवेंजर्स का रोज़गार और शुष्क शौचालय का निर्माण (निषेध) अधिनियम, 1993” के तहत हाथ से मैला ढोने की प्रथा को 2013 में एक कानून के जरिए प्रतिबंधित कर दिया गया है। बावजूद इसके देश में आज भी लाखों लोग सीवरों और सेप्टिक टैंकों में उतरकर सफाई लिए मजबूर हैं। यह प्रथा अमानवीय होने के साथ साथ जानलेवा भी है। नालों में फैली गंदगी से उनमें घातक गैसें बनते हैं,जिसकी हल्की सी खुराक बेहोश करने के लिए काफी है। यदि यह गैस नाक में ज्यादा चली गईं तो जान चली जाती हैं। आंकड़ों के अनुसार 2016 से 2019 के बीच देश
में लगभग 282 सफाईकर्मी सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करने के दौरान अकाल मौत के आगोश में सो गए।लेकिन सफाईकर्मियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों की माने तो जमीनी हक़ीक़त कहीं ज्यादा भयावह। केंद्र सरकार ने सफाईकर्मी के स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कानून में संशोधन करके सीवरों और सेप्टिक टैंकों की मशीन आधारित सफाई को अनिवार्य करने का निर्णय लिया है। अब शब्दावली में से ‘मैनहोल’ शब्द को हटा कर ‘मशीन-होल’ शब्द का उपयोग किया जाएगा।
19 नवंबर को केंद्र सरकार ने दो नई महत्वपूर्ण घोषणाएं की। सामाजिक कल्याण मंत्रालय सीवरों और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए मशीनों का उपयोग अनिवार्य करने के लिए एक कानून लेकर आएगा। दूसरी तरफ शहरी कार्य मंत्रालय ने इंसानों द्वारा सीवर की सफाई रोकने के लिए राज्यों के बीच एक प्रतियोगिता की शुरुआत की। 243 शहरों के बीच होने वाली इस प्रतियोगिता के लिए 52 करोड़ रुपए आबंटित किए गए हैं। राज्य सरकारों ने प्रण लिया है कि अप्रैल 2021 तक इस तरह की सफाई की प्रक्रिया को पूरी तरह से मशीन आधारित बना दिया जाएगा। सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले शहरों को इनाम दिया जाएगा।

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