मनोरंजन सिनेमा

रामदूत अतुलित बल धामा : हनुमान अंश

डॉ. नीरज भारद्वाज

सिनेमा मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन बनकर उभरा है। इससे पहले किस्सागोई, कहानीआदि मनोरंजन के साधन रहे। फिर नाटक समाज में आया, नाटक को अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। नाटक मनोरंजनपरक, ऐतिहासिक, सामाजिक, पौराणिक कथाओं आदि को लेकर बने। यह लोगों के बीच लोकप्रिय भी रहे। नाटक मंच पर खेला जाता है। पहले नाटक में नारी पात्र की भूमिका भी पुरुष ही निभाते थे। फिर धीरे-धीरे नारी पात्र के रूप में नारियों ही आने लगी। नाटक में गीतों का भी गया जाना महत्वपूर्ण रहा। धीरे-धीरे तकनीक का युग आया तो नाटक की जगह धारावाहिकों ने ले ली लेकिन रंगमंच पर नाटक आज भी खेले जा रहे हैं।

इसी के साथ ही सिनेमा अर्थात फिल्में तेजी से बनने लगी। फिल्में भी अलग-अलग विषयों को लेकर बनाई जाने लगी। वर्तमान में हिंदी सिनेमा अर्थात फिल्मों ने एक लंबी यात्रा पूरी कर ली है। तकनीक का प्रयोग भी बहुत तेजी से फिल्मों में बढ़ रहा है। फिल्मों पर होने वाला खर्च भी बढ़ रहा है। फिल्मों को देखने वाले दर्शक भी अलग-अलग तरह की फिल्में देखना पसंद करते हैं। उसी के आधार पर सिनेमा भी बन जाता है। हाल ही में फिल्म हनुमान अंश प्रसारित हुई। फिल्म ना बड़े बजट की है और ना ही फिल्म में फिल्मी दुनिया का कोई बड़ा सितारा काम कर रहा है। ना ही फिल्म में कोई बड़ा संगीतकार और गायक है। फिर भी फिल्म ने कमाई के मामले में बड़ी-बड़ी फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है। फिल्म की शुरूआत धीमी रही लेकिन देखते ही देखते फिल्म लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगी।

यह फिल्म भारतीय आस्था, भक्ति, साधना, अध्यात्म, ज्ञान, संस्कृति, संत ज्ञान परंपरा से सीधी जुड़ी हुई है। संत के दर्शन, संत की संगत, संत का भाव, संत का चरित्र, संत का समाज में महत्व आदि विशेष गुणों को बताती, समझती और दिखाती है। फिल्म में गाने नहीं बल्कि भजन को गया गया है। फिल्म में लोकप्रिय भजनमैंने तेरे ही भरोसे…प्रज्ञा चक्षु के कंठ से निकाला और फिल्म का हिस्सा बन गया। विचार करें तो संत सभी को साथ लेकर चलते हैं।

भारतीय सिनेमा समयानुसार पौराणिक आख्यानों और सांस्कृतिक धरोहरों को नए दृष्टिकोण से पर्दे पर प्रस्तुत करता रहा है। हनुमान अंश फिल्म संत जीवन पर बनी है। यह फिल्म हमारी संत और ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रयास करती है। फिल्म में संत द्वारा भगवान श्री हनुमान जी की भक्ति, साधना को दिखाया गया है। फिल्म में हनुमान जी की भक्ति को महज एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहींबल्कि जीवन जीने के एक आदर्श मार्ग के रूप में दिखाया गया है। यह दर्शकों को संदेश देती है कि मन में विश्वास और धर्म का मार्ग अपनाने से बड़ी से बड़ी बाधाओं पर विजय पाई जा सकती है।

बदलते दौर में लोगों को कई बार ऐसा भी लगता है कि तेजी से बदलते युग में हमारी युवा पीढ़ी अपने सांस्कृतिक जीवन से दूर होती जा रही है। ऐसे में सिनेमा के रुपहले पर्दे पर हनुमान अंश का फिल्म का आना और लोगों का इसे पसंद करना बहुत ही महत्वपूर्ण है।’हनुमान अंश’ फिल्म सुपरहीरो संस्कृति के दौर में हमारे संतोकी महत्ता, ज्ञान, शक्ति, महानता को सामने लेकर आई है।इससे युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति गर्व और सम्मान की भावना जागृत हुई है। इस फिल्म को लोग बढ़ चढ़कर अपने परिवार के साथ, मित्र मंडली के साथ देखने सिनेमाघरों में जा रहे हैं। बहुत से लोग तो फिल्म के शुरू होने और बाद में हनुमान चालीसा का पाठ भी कर रहे हैं। फिल्म भक्ति और आस्था को जागृत करती है। यह फिल्म हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक यात्रा को दिखाती है। सत्य यह भी है कि जब भी समाज पथ भ्रमित होता है, उसमें भ्रांतियाँ पैदा होती है तो संत ही समाज को सही मार्ग पर आगे लेकर चलते हैं। संत जीवन पर बनी इस फिल्म ने सभी को पीछे छोड़ दिया है और नकारात्मक सिनेमा को उत्तर दे दिया है कि भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय जीवन शैली आज भी अपनी पौराणिक मान्यताओं, आस्था आदि के साथ रहने वाली है।

डॉ. नीरज भारद्वाज