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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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भारतीय लोकतंत्र में नक्सली हिंसा पर व्याख्यान

पटना। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी का कहना है कि माओवादी आतंकवाद से अब निर्णायक जंग लड़ने की जरूरत है क्योंकि यह देश के लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा संकट है। देश के सबसे गरीब 165 जिलों में काबिज माओवादी प्रतिवर्ष दो हजार करोड़ की लेवी वसूलकर हमारे गणतंत्र को नष्ट करने की साजिशों में लगे है। वे पटना (बिहार) स्थित बिहार उद्योग परिसंघ के सभागार में विश्व संवाद केंद्र द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला में “भारतीय लोकतंत्र में नक्सली हिंसा” विषय पर मुख्यवक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।

श्री द्विवेदी ने कहा कि आज हम विदेशी विचारों और विदेशी मदद से देश को तोड़ने के लिए चलाए जा रहे एक घोषित युद्ध के सामने हैं। जो लोग 2050 तक भारत की राजसत्ता पर कब्जे का स्वप्न देख रहे हैं हम किस तरह उनके प्रति सहानुभूति रख सकते हैं। उन्होंने कहा कि क्या हिंसा,आतंक और खूनखराबे का भी कोई वाद हो सकता है। हिंदुस्तान के अनाम, निरीह लोग जो अपनी जिंदगी की जद्दोजहद में लगे हैं उनके परिवारों को उजाड़ कर आप कौन सी क्रांति कर रहे हैं। जिस जंग से आम आदमी की जिंदगी तबाह हो रही हो उसे जनयुद्ध आप किस मुंह से कह रहे हैं। श्री द्विवेदी ने सवाल किया कि आखिर हमारी सरकारें और राजनीति नक्सलवाद के खिलाफ इतनी विनीत क्यों है। क्या वे वास्तव में नक्सलवाद का खात्मा चाहती हैं। देश के बहुत से लोगों को शक है कि नक्सलवाद को समाप्त करने की ईमानदार कोशिशें की जा रही हैं। देश के राजनेता, नौकरशाह, उद्योगपति, बुद्धिजीवियों और ठेकेदारों का एक ऐसा समन्वय दिखता है कि नक्सलवाद के खिलाफ हमारी हर लड़ाई भोथरी हो जाती है। अगर भारतीय राज्य चाह ले तो नक्सलियों से जंग जीतनी मुश्किल नहीं है।

उन्होंने भारतीय बुद्धिजीवियों की भूमिका पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि शब्द चातुर्य से आगे बढ़कर अब नक्सलवाद या माओवाद को पूरी तरह खारिज करने का समय है। किंतु हमारे चतुर सुजान विचारक नक्सलवाद के प्रति रहम रखते हैं और नक्सली हिंसा को खारिज करते हैं। यह कैसी चालाकी है। माओवाद का विचार ही संविधान और लोकतंत्र विरोधी है, उसके साथ खड़े लोग कैसे इस लोकतंत्र के शुभचिंतक हो सकते हैं। यह हमें समझना होगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार विधान परिषद् के सभापति ताराकांत झा ने की। इस अवसर पर श्री झा ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में नक्सली हिंसा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सुरसा की तरह मुंह फैलाए हुए है। देश का विकास इनके कारण अवरूद्ध हो गया है। श्री झा ने कहा कि साम्यवादी और माओवादी दोनों का गोत्र एक है। बिहार की सीमा नेपाल से सटे होने के कारण यहां हमेशा नक्सली घटना की आशंका बनी रहती है।

इस अवसर बिहार के वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘आज ’ के पूर्व संपादक पारसनाथ सिंह को देशरत्न राजेंद्र प्रसाद पत्रकारिता शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके अलावा सुश्री शालिनी सिंह (ईटीवी,पटना), अरूण अभि (दैनिक हिंदुस्तान) को भी सम्मानित किया गया। आयोजन में ‘बिहार में पत्रकारिता’ पर केंद्रित पुस्तिका का विमोचन भी हुआ। आयोजन में केंद्र के अध्यक्ष प्रकाश नारायण सिंह, डा. अर्जुन तिवारी, डा.शत्रुध्न प्रसाद, रामदेव प्रसाद, संजीव सिंह, विमल कुमार सहित अनेक गणमान्य नागरिक मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन प्रख्यात लोकगायिका श्रीमती शांति जैन ने किया।

5 Responses to “माओवादी आतंकवाद सबसे बड़ा संकट : संजय द्विवेदी”

  1. BHOOPENDER

    bharat me loktantra kaha hai sahab?
    mere khayal ise khojna hi sabse badi samsya hai….pahle pata lagana chahiye loktantra kis jagah hai phir usko khatm karne wali samsyao se niptenge.
    loktantra ka matlab sirf voting hai to pahle janna chahiye bina sarab kambal aur paisa ke koun sa dal vote karwati hai.
    aur hum jo janprtinidhi chunet wo hamare kitne hai matlab janta ka….
    chunav hua phir wo raja aur janta unke darbaar me line laga k khadi rahti hai……….ye loktantra hai to ise koi nahi bacha payega.
    aur lekhak jaise patrkaro ko to special treet milti hai to wo to aise loktarntriko ko bachane ke ji jaan de denge……..

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  2. shriram tiwari

    सिर्फ नकसलवाद ही एक मात्र चुनौती है क्या ?जिसने भारतीय गणतंत्र की नाक में दम कर रखा है और वेह इनसे पार पाने में असफल हो रहा हो : आज़ादी के बाद के ६२ वर्षों में हम कश्मीर की समस्या हलनहीं कर पाए ;उत्तर पूर्व के अलगाव वादियों को हम नियंत्रित नहीं कर पाए ;हिंदी को उसका वांछित दर्ज़ा नहीं दे पाए .सभी धर्मों के कट्टरपंथियों को लगाम नहीं लगा पाए ;बढती हुई आबादी पर अंकुश लगाने में असफल रहे .रिश्वतखोरी जमाखोरी कालाबाजारी .बेरोज़गारी मिलावट .ह्त्या बलात्कार अशिक्षा नारी उत्पीडन तथा विदेशी ताकतों द्वारा नकली मुद्रा का अनाप शंनाप भारत के घरेलु बाज़ार में चलन एवं देशी पूंजीपतियों, राजनीतिज्ञों ., महा भ्रस्त अधिकारीयों द्वारा स्विस बैंक में कितना भारतीय धन जमा है -इसका पता हम आज तक नहीं लगा पाए .इत्यादि इत्यादि ;इन बिकराल समस्याओं के सामने नक्सल या माओवादी समस्या कुछ भी नहीं .देश के गरीबों आदिवाशियों बेरोजगारों को जीवन यापन के संसाधन उपलब्ध हो जायेंगे तथा वनोपज का शहरी पूंजीपतियों द्वारा लूटना बंद करा दोगे ,आदिवाशी महिलाओं का शीलहरण बंद कर दोगे .तो नक्सल बाद और माओ बाद अपने आप ख़त्म हो जायेगा या अप्रासंगिक हो जाएगा .जो देशी विदेशी दलाल बंदूकों की तिजारत कर इन नाक्स्ल्बदियों को पाल पोश रहे हैं पहले उन पर तो कुछ कार्यवाही कीजिये .और अंत में एक बात और ये जो सेमिनारों में अटकलबाज़ी करने बाले .शेखी बघारने बाले लफ्फाज है -जो कहते फिरते है कीअब दुनिया में पुन्जीबाद का कोई विकल्प नहीं उन्हें नक्सल समस्या पर बोलने का नैतिक अधिकार नहीं.

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    • आर. सिंह

      R.Singh

      Tiwariji,in sab samsyayon ka mool karan hai bharstaachaar yani Corruption aur kuchh bhi nahi.

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    • om prakash shukla

      तिवारी जी अपने बिलकुल सही जगह पैर उगली राखी है जो चिदुम्बेरुम कल तक इन्ही कार्पोराते घरानों की दलाली केर अपनी जीविका चला रहा था पूरी दुनिया में पर्यय्वारद वीनस के लिए कुख्या है उसके बोर्ड ऑफ़ दिरेक्टोर्स में था अज विकास के नाम पैर आदिवासियो की जगह जमीं से बेदखल केर भगा केर देशी,विदेशी आको को गुप्त सम्झुओतो के द्वारा बेच खाना चाहता है,और आजादी के ६३ साल बाद भी आदिवासियो को उनके मुओलिक अधिकारों पैर डाका डालने वालो की तरफदारी केर क्या साबित करना चाह्राहे है की इस अनदेखी के लिए वे लोग खुद जिम्मेदार है.यह तो हद दर्जे की बेशर्मी हुई.नाक्स्सल या कहे मओवादियो की समस्या अज की नहीं है यह उस समय की समस्या है जब चिदुम्ब्रुम जी या तो पढ़ते होगे या अपने पुजीपतियो की सेवा में फुल्तिमेर लगे रहे होगे अब पार्ट टाइम कार्य केर रहे है और एक विशुद्ध आर्थिक,राजनातिक समस्या को मामूली कानून व्यवस्था की समस्या मन केर चुटकियो में दावा करने की ख़म ख्याली में गरीब जवानों को उनकी बेबसी का लाभ उठाते हुए उनका कत्लें करा रहे है ताकि अपने पुराने मालिको को संतिष्ट केर सके.सबसे पहली बात तो यह है की एक गंभीर समस्या पैर ओची तरह से मीडिया में बह्ह्हह्ह्स मात्र हिंसा और अहिंसा पैर केन्द्रित केर रहा है.जिसमे आदिवासियो और हासिये के लोगो के वास्तविक समस्याओ को जगह नहीं दी जा रही है.हमें मओवादियो की समस्या पैर सोचने की सुरुआत यहाँ से करनी होगी की तमाम आर्थिक महाशक्ति के दावों के बीच इसका जबाब तलासना होगा की आखिर आजादी के ६३ साल बाद भी विस्वा भूख सुचांक के ११४ देशो के लिस्ट में हम ९४ स्थान पैर क्यों है?जब तक इस विषय को राष्ट्रिय शर्म किया वषय नहीं बनायेगे बात बनाने वाली नहीं हमारे राजनातिक डालो को बताना होगा की इस समस्या पैर उनका क्या कार्यक्रम है.दूसरी बात यह की क्या चिदुम्ब्रुम महोदय को जानकारी है की आदिवासियो,अनुसूचित जाट के लोगो और दिहाड़ी मजदूरो को अपना सम्वाधानिक न्यूनतम मजदोरी के लिए हथियार क्यों उठाना पड़ता है.आखिर किसने उद्योगपतियो को खुली मज्दोरो के मज्जूरी नहीं मिलती क्यों नहीं कोई व्यवस्था बनायीं जाती की बगर हथियार उठाये उन्हें उनकी वाजिब मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित हो.और तीसरी और सबसे महत्य्व्पुर्द बात की अखी हेर बार विकास की कीमत इन्ही आदिवासियो को उठानी पद्त्ति है.भारत सर्कार के ग्रामिद विअस विभाग के अनुसार आजादी के बाद ४०% आदिवासियो और हसी के लोगो का एक या एक से अधिक बार विस्थापन हुआ है और अभी एकभी विस्थापितों को सही तरीके से पुनर्वास नहीं किया गया है.क्या चिदुम्ब्रुम महोदय को शर्म आयेगी यह जन केर की सन १९४७ में मथन दम के उद्घाटन के समय तत्कालीन प्रधान मंत्री ने जिसे विकास का मंदिर बताया था उस विकास के मंदिर के जमीं के मुआवजे का मुकदमा अभी अदालतों में घिसत रहा है.एक भ्रान्ति यह भी फली जाती है की आदिवासी दहशत में मओवादियो का साथ दे रहे है और उनके साथ जनता का बहुमत नहीं है जो वस्स्सस्त्विकता से कोसो दूर है क्योकि माओवादी हजारो की तादाद में हमला केर रहे है और सुराचा बालो को मुखबिर के नाम पैर कुत्ता भी नहीं मिल रहा है.प्रश्न यह भी महत्य्व्पुर्द है की उस विकत जंगल में जहा अज तक सरकारों द्वारा चिकित्सा की कोई व्यवस्था न केर पाने वाली नाकारा व्यवस्था के किये एक क़ुअलिफ़िएद गोल्द्मेदिलिस्ट डोकर सेन जो समर्पित भाव से गरीबो की सेवा लगा रहा वह एकाएक व्यवस्था के लिए खतरा क्यों बन जाता है की उसे इनप्रध बफ्गर किसी आरोप के २ साल जेल की सीखचों के पीछे दल दिया जाता है.हिमांसु कुमार जैसे प्रख्यात गाँधी वादी के आश्रम जहा बुधजिवी और पत्रकार ,शोध करने वाको को जंगल में ठिकाना मिलाता है वह भी एकाएक सुराचा के लिए इतना बड़ा खतरा बन जाता है की संविधान की दुहाई देने वाली और उसी की सपथ ले केर कम करने वाली सर्कार अस्म्वाधानिक तरीके से बगर किसी तरह की सूचना दिए बुल्दोजेर से तहस नहस केर दिया जाता है.यह भी लोगो ने खुली आखो से देखा है की जिस दिन टाटा और एस्सार से मौ दस्खत होते है ठीक उसके अगले दिन से सर्कार के समर्थन से सलवा जुडूम नमक घोर अपराधिक संघटन आदिवासियो को डराने,भागने,में लग जाता है जो बिरोध करते है उम्न्न्नाकी बहु बेतिओ के साथ सामूहिक बलात्कार सरकारों द्वारा प्रायोजित करस्य जाता है.क्या यह लोकतान्त्रिक सर्कार का कार्य है की एक अपराधी गिरोह को इस तरह का समर्थन खुलें दे.मुझे मुख्या अतिथि महोदय के विद्वता पैर कोई शंका नहीं लेकिन लगता है की उनकी भी तमाम पत्रकारों के तरह पद जाने का भही और बालबच्चो के पेट का सवाल अड़े आ जाता है,नहीं तो मओवादियो को विदेशियो के सम्पर्क के बारे में इतनी फिजूल बात नहीं कहते जब की अज दो महीने के भीतर १५ या २९ के लगभग सुरचाबलो के जवान्जिन्हे अर्मेर कहते है जिलो में कैद है उनके उपर नाक्सस्ल्वाडियो को हथियार और कारतूस,गोला बारूद बेचने का आरोप है.अज तक कही भी किसी बरामदगी में किसी विदेशी लिंक का प्रमाद सर्कार नहीं देसकी है.अब यह बात दिन के उजाले की तरह साफ हो गयी है की ये आदिवासी जहा काबिज है उसके नीचे अरबो खरबों का खनिज दबा हुआ है और साडी लड़ाई उसी के लिए हो रही है अब आदिवासियो को मओवादियो की शक्ल में उन्हें एक मजबूत और संघटित हथियार बंद दस्तो का समर्थन मिलगया है अब वे पहले की तरह अपनी जगह जम्जं छोड़ने को तैयार नहीं,वे अपने अस्तित्य्व की लड़ाई लड़ रहे है उन्हें मालूम है की इसबार हरने का अर्थ उनका समाप्त होना तथ उनकी बहु बेतिओ को ऐय्यासी की लिए इस्तेमाल होना है और इसके खिलाफ तानकर जिंदगी में खाए हुए है.जिस पत्रकारिता महाविद्यालय का नाम महँ मनिशामाखान्लाल्चातुर्वेदी का नाम जुदा हो उसके प्रमुख के ये उद्गार देश की भावी परकारिता की दिशा में इशारा करता ही की अब यहाँ सिर्फ प्रशासन की विज्ञप्तियो और अर्कारो की नीतिओ का ही समर्थन करना रहना है.यही से भावी पत्रस्कारो के मष्तिष्क की कांदितिनिंग की जा रही है यह देश के लिए और उसमे भी हासिये के लोगो की समस्याओ को सतही तरीके से भी जगह नहीं मिलाने वाली क्योकि संजी जी संभवत इसी इमित्ता भेजे गए है और वे अपने कार्य को अंजाम देने लगे है.

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