-रमेश कुमार दुबे
दलहनों की पैदावार बढ़ाने के लिए लगभग दो दर्जन योजनाओं की असफलता के बाद केंद्र सरकार ने सीधे किसानों को ज्यादा कीमत देने की रणनीति अपनाई है। इसके तहत दलहनी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी बढ़ोत्तरी की गई है। जहां अरहर के समर्थन मूल्य में सात सौ रूपये की वृद्धि की गई है वहीं मूंग में 410 रूपये तथा उड़द में 380 रूपये की बढ़ोत्तरी हुई है। समर्थन मूल्य में यह बढ़ोत्तरी पिछले दो वर्षों के दौरान दालों की कीमतों में बहुत ज्यादा वृद्धि होने और घरेलू खपत के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भरता बढ़ने को देखते हुए की गई है। सरकार ने भले ही समर्थन मूल्य में वृद्धि दाल उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए की है लेकिन इसका उल्टा असर खुले बाजार में दालों की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी के रूप में आ सकता है। उदाहरण के लिए जिस अरहर का समर्थन मूल्य अभी तक 23 रूपये था उसकी दाल खुले बाजार में अस्सी रूपये किलो बिक रही है। 2760 रूपये क्विंटल समर्थन मूल्य वाली मूंग तो सभी रिकार्ड तोड़कर दस हजार रूपये क्विंटल से भी ऊपर निकल चुकी है। कुछ इसी तरह की कहानी उड़द के साथ भी है।
दरअसल जब तक दलहन की खेती से जुड़े जोखिमों को कम नहीं किया जाता तब तक आम भारतीयों की थाली से दालें कम होती जाएंगी। इसका परिणाम कुपोषण व उससे पैदा होने वाली बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है और भविष्य में और गंभीर रूप धारण कर सकता है। इसका कारण है कि भारत में दालें खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ पोषण सुरक्षा का भी अभिन्न अंग रही हैं।
सत्तर के दशक में भोजन के बारे में एक महत्वपूर्ण पुस्तक छपी थी- डायट फॉर ए स्माल प्लैनेट। इसकी लेखिका फ्रांसिस मोर लैपे ने जीव विज्ञान की कुछ बुनियादी जानकारियों का इस्तेमाल करके समझाया था कि पोषक तत्व हमारे शरीर के लिए तभी उपयोग हो पाते हैं जब उन्हें दे सकने वाली चीजें सही मेल के साथ खाई जाएं। लैपे ने यह भी बताया था कि भोजन की सांस्कृतिक परंपराओं में यह जानकारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी दर्ज हो रही है कि किस चीज को किसके साथ खाना है, किसके साथ नहीं। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में दाल-रोटी और दाल-चावल के जोड़े सिर्फ मुहावरे नहीं हैं। उनके पीछे संतुलित आहार की ज्ञान-परंपरा है जिसके निर्माता चोटी के वैज्ञानिक नहीं, आमजन हैं। पोषण के बारे में जिस ज्ञान को आजकल वैज्ञानिक माना जाता है, उसमें भी अनाजों और दालों का महत्व स्वीकारा गया है। दोनों को प्रोटीन का स्रोत बताया गया है। लेकिन जनसंख्या वृद्धि के अनुरूप दालों का उत्पादन न होने के कारण समाज के निर्धन वर्गों के साथ-साथ मध्यम वर्ग भी पेट भरने के लिए सिर्फ अनाज खा रहा है। इससे आबादी के एक बड़े हिस्से के सामने पोषण असुरक्षा का खतरा उत्पन्न हो गया है। उदाहरण के लिए देश का अन्न भण्डार कहे जाने वाला पंजाब राज्य कुपोषण के मामलें में अफ्रीका के सबसे कुपोषित देश (गैबोन) से भी निचली पायदान पर है।
भारत की बड़ी आबादी शाकाहारी है, इसलिए महत्वपूर्ण प्रोटीन हासिल करने के लिए दालें सबसे आसान स्रोत हैं। इसके बावजूद कृषि क्षेत्र के हमारे नीति-निर्माता लगातार इस तथ्य को नजरअंदाज कर रहे हैं। बढ़ती आबादी, मध्य वर्ग के विस्तार, क्रय क्षमता में वृद्धि जैसे कारणों से दालों की मांग बढ़ती जा रही है। हर साल सात से आठ लाख टन दालों की खपत बढ़ रही है लेकिन उसी के अनुरूप उत्पादन न होने के कारण कीमतें बढ़ती जा
रही हैं। दालों की उपलब्धता के लिए सरकार ने जो कदम उठाए हैं वे तात्कालिक अधिक, दीर्घकालिक कम हैं। दालों के निर्यात को प्रतिबंधित किया गया, भंडारण क्षमता की सीमा तय करने के साथ-साथ वायदा कारोबार पर रोक लगाई गई। दालों के ड्यूटी फ्री आयात को मंजूरी दी गई। आयात में सरकारी एजेंसियों की भूमिका बढ़ाई गई और सरकार उनके घाटे की भरपाई भी कर रही है। लेकिन सरकार के पास दालों की उत्पादकता बढ़ाने की कोई ठोस नीति नहीं है।
दरअसल भारत में दालों की कमी के लिए बहुआयामी कारकों का योगदान रहा है। इसकी शुरूआत हरित क्रांति से हुई। हरित क्रांति में गेहूं और धान की नई उन्नत प्रजातियों को लाया गया और रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों व सिंचाई के साथ उनका उत्पादन तेजी से बढ़ा। लेकिन यह क्रांति बहुत एकांगी थी और धान-गेहूं या कपास-गन्ने-सोयाबीन तक सीमित रह गई। दालें जैसी फसलें उपेक्षित रह गई। इसका कारण यह भी था कि हरित क्रांति की प्रेरणा, योजना, तकनीक एवं वित्तीय मदद मुख्यत: विदेशों से आई थी। वहां दालों की खेती होती ही नही, इसीलिए दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए भारत में भी शोध नहीं हुआ।
गेहूं व धान उगाने के फेर में दाल का रकबा भी घटा और प्रोत्साहन भी। दाल उत्पादन सीमांत किसानों और सूखे इलाकों तक सीमित हो गया है। खतरा यह है कि आने वाले सालों में रोटी भले ही मिल जाए पर दाल आसानी से मयस्सर नहीं होगी। पिछले चार दशक में दलहन की खेती का क्षेत्र सिर्फ 4.5 फीसदी बढ़ा है अर्थात वर्ष 1970 की हरित क्रांति में दलहन खेती 2.25 करोड़ हेक्टेयर में होती थी, जो अब मामूली रूप से बढ़कर 2.38 करोड़ हेक्टेयर में हो रही है। यह कुल खेती वाली जमीन का सिर्फ 12 फीसदी ही है। इसमें भी 90 फीसदी खेती असिंचित क्षेत्रों में होती है। किसानों का ध्यान अब दलहन की जगह चावल व गेहूं के साथ नकदी फसलों (गन्ना, कपास और सोयाबीन) की ओर है।
दलहन की कुल पैदावार भी उत्साहजनक नहीं है। 1970 में दलहन का कुल उत्पादन 1.2 करोड टन था, जो चार दशक बाद मामूली बढ़त के साथ 1.5 करोड़ टन पर पहुंचा है। दालों की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में भी कोई विशेष सुधार नहीं हो पाया है। पिछले चार दशक में उत्पादकता केवल 20 फीसदी तक ही बढ़ी है। 1970 में दलहन की उत्पादकता 524 किलो प्रति हेक्टेयर थी जो अब 638 किलो पर स्थिर हो गई है। इसके विपरीत पड़ोसी देश चीन में दलहनी फसलों की उत्पादकता 3500 किलो तक पहुंच गई है और तो और बांग्लादेश व म्यांमार की उत्पाकता के मुकाबले भी हम पीछे हैं। हरित क्रांति का नतीजा यह हुआ कि दलहन की खेती में शीर्ष पर रहने वाले उत्तर भारतीय राज्यों के आम लोग अब महंगाई के चलते कटोरी भर दाल के लिए तरह रहे हैं। अरहर और चना जैसी प्रमुख दालों के लिए यहां के लोगों को दक्षिण भारत के राज्यों अथवा आयात का मुंह ताकना पड़ता है।
उद्योग मंडल ऐसोचैम की एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि 1960 के दशक में दाल की प्रति व्यक्ति खपत 27 किलोग्राम सालाना थी। यह जनवरी-जून 2009 की अवधि में घटकर 11 किलो से भी कम रह गई है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच दशक में दालों की पैदावार में एक प्रतिशत से भी कम वृद्धि हुई है। सच्चाई यह है कि देश में 1998-99 में पहली बार करीब डेढ़ करोड़ टन की रिकॉर्ड पैदावार हुई और उसके बाद 2007-08 में यह एक करोड़ 51 लाख टन तक पहुंच पाई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दौरान जनसंख्या वृद्धि और मांग बढ़ने से दालों के आयात में भारी वृद्धि होती रही। 1998-99 में जहां देश में साढ़े चार लाख टन दालों का आयात किया गया वहीं वह 2009-10 में यह बढ़कर 34 लाख टन तक पहुंच गया जिसके चालू वित्त वर्ष में बढ़कर 40 लाख टन होने की संभावना है।
दाल के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका अंतरराष्ट्रीय ढांचा बहुत पेचीदा है। दुनिया के कुछ ही देशों में दाल की खेती होती है क्योंकि ठंडे देशों में प्रोटीन के और दूसरे स्रोत भी हैं। आस्ट्रेलिया व कनाडा केवल भारत के बाजार के लिए दाल उगाते हैं।
कृषि मंत्रालय के अधिकारी मानते हैं कि दुनिया में दाल का कुल उत्पादन भी भारत की मांग के लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि दाल यहां का मुख्य भोजन है। अर्थात दुनिया भारत को दाल नहीं खिला सकती। ऐसे में दाल यहां के खेतों में उगानी होगी या फिर दाल भोजन से बाहर हो जाएगी।
दलहनी फसलों में अनेक तरह के नए रोग लगने लगे, उन्हें रोकने के लिए न तो नए कीटनाशक बनाए गए और न ही उन रोगों के प्रतिरोधी क्षमता के दालों के बीज विकसित किए गए। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अनेक बार दलहनों की बर्बाद होती खेती देखकर किसानों ने इनकी खेती ही बंद कर दी।
नीलगायों द्वारा दलहनी फसलों को नष्ट कर देना एक बड़ी समस्या बन गई है। स्पष्ट है किसान दलहनों की खेती तभी करेंगे जब सरकार लाभकारी समर्थन मूल्य घोषित करने के साथ-साथ दलहन की खेती से जुड़े जोखिम कम करे। यह समय की मांग है कि दलहन पर जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान हो ताकि इनकी अधिक उत्पादकता व रोगरोधी बीजों का विकास हो सके। सबसे बढ़कर प्रयोगशाला से भूमि तक की कड़ी मजबूत किया जाए जिससे किसान नई किस्मों को बड़े पैमाने पर अपना सकें।
दुबे साहब जी ने आकड़ो के साथ बहुत अच्छी जानकारी दी.
शानदार पोस्ट