बाजार जी! संभावनाएं यहां मत टंटोलिए -जयप्रकाश सिंह

title‘घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही’ आजकल अधिकांश व्यक्तियों का सामना बाजार से हो जाता है। मेरा भी आमना-सामना उनके अगणित रूपों में से किसी न किसी के साथ प्रतिदिन होता रहता है। मिलने पर बकवासी बुद्धिजीवियों की तरह मैं भी उनसे बतियाने की कोशिश करता हूं। वे भी मुझे अन्य व्यवहारिक लोगों की तरह इस ग्रह के लिए ‘अनफिट’ मानकर दो चार बाते कर लेते हैं। हालांकि बाजार जी! के साम्राज्य में संवाद की संभावना बहुत कम होती है। निष्पक्ष विमर्श से तो उनका छत्तीस का आंकड़ा है। इसीलिए उन्होंने विमर्श के सभी संसाधनों पर कब्जा कर लिया है। सो आजकल बाजारु इच्छा की प्रतिध्वनि ही मीडिया में सुनाई देती है। मीडिया तो अब एक कदम आगे जाकर यह सूंघने की कोशिश करता है कि बाजार का अगला कदम क्या होने वाला है। इस तानाशाही प्रवृत्ति के बाद भी बाजार जी! मुझसे बतिया लेते हैं तो यह मेरे लिए गर्व का ही विषय है।

एकदिन बाजार जी! अपने सर्वाधिक नवीन ‘समलैंगिकता’ के चोले में मुझसे टकरा गए। कुछ व्यग्र दिखाई पड़ रहे थे। मैंने उनकी अपार ताकत से परिचित होते हुए भी एक धृष्टतापूर्ण सवाल दाग दिया। सवाल यह था कि आप अपनी महत्वाकांक्षा के लिए अब मानव-प्रकृति के साथ खिलवाड़ क्यों कर रहे हैं। लोगों की जीवनशैली को तो आप वैसे ही कबाड़ा बना चुके हैं, कम से कम मानव की मूल प्रकृति के साथ तो खिलवाड़ मत कीजिए। पता नहीं क्यों पहली बार उन्होंने मेरे सवाल को गम्भीरता से सुना। शायद, पहली बार इस मुद्दे पर भारत के धार्मिक महागुरुओं की एकजुटता से उनका सर्वशक्तिमान होने का भ्रम टूट गया था। वह जमीन पर थे। जमीन पर होने पर कभी-कभी ताकतवर लोग भी दबे-कुचलों की आवाज सुन लेते हैं।

उन्होंने उत्तर देना शुरू किया- आधुनिकता के विरोधी पोंगापंथी लोगों के एकमत विरोध के कारण मेरे सर्वाधिक आधुनिक हथियार ‘समलैंगिगता’ का भविष्य अधर में लटक गया है। तुम तो जानते ही हो कि वर्तमान परिस्थितियों में बाजार के विस्तार की संभावनाएं लगभग संतृप्त होती जा रही है। इसलिए मैंने संभावनाओं का नया द्वार खोलने के लिए पूरी दुनिया में समलैंगिकता का विमर्श चलाया हुआ है।

उनके वाक गम्भीर्य को देखकर मैं भी गम्भीर हो गया। उनकी भाषा में राजनीति, मनोविज्ञान, एवं युद्धशास्त्र की शब्दावलियों का प्रयोग एक साथ हो रहा था। बाजार जी! शांति रस में वह भावी अशांति का पाठ कर रहे थे।

उन्होंने आगे कहना शुरू किया- मैंने भारत को अपने हिसाब से आधुनिक बनाने के लिए 1991 के बाद से पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन भारतीय लोग हैं कि मानते नहीं चिपके रहते हैं अपने पिछड़ेपन से। जिस विकास की पटरी पर पूरी दुनिया सरपट दौड़ रही है, उस पर भारत वाले भागते ही नहीं। बाजार जी का प्रवचन जारी था- सत्यानाश हो इन धर्मगुरूओं का। मीडिया के माध्यम से इतनी गालियां निकलवाता रहता हूं, इनको आपस में लड़ाता भी रहता हूं फिर भी भारतीय किसी न किसी गुरुघंटाल के पीछे लगे रहते हैं।

मैंने प्रतिवाद किया। बाजार जी का प्रवाह टूट गया। मैंने कहा बाजार जी! ये कौन सा विकास है जिसके दायरे से 95 फीसदी लोग बाहर रह जाते हैं। 2 फीसदी लोगों के पास उपभोग के सारे संसाधनों का संक्रेन्द्रण हो गया है और 32 करोड़ लोग भूखे पेट सोने के लिए मजबूर हो गए हैं। पर्यावरणीय संकट इतना विकराल रूप धारण कर चुका है कि पूरी मानवता के सामने अस्तित्व का संकट मंडराने लगा है। बाजार जी ने मेरी धृष्टता पर आंखे तरेरी। मुझको तुरंत अपनी तुच्छता का एहसास हो गया।

पत्रकार हूं, इसलिए थोड़ी बहुत राजनीतिक तिकड़म का ज्ञान है। वैसे भी पत्रकारों को राजनीति का चस्का लग ही जाता है। सौ मैंने तुरंत एक अच्छे पत्रकार की तरह प्रश्नों की दिशा दूसरी तरफ मोड़ दी। मैंने कहा- बाजार जी भाई साहब। समलैंगिकता की बहस को बढ़ावा देकर, इसको सामाजिक स्वीकृति दिलवाकर आप अपने लिए नई संभावनाएं कैसे पैदा कर सकते है। मेरे इस प्रश्न पर बाजार जी की मुद्रा तनिक रणनीतिक हो गयी।

उनका उत्तर आया। बोले- ‘स्त्री-पुरुष के संबंधो को लेकर जितने उत्पाद हो सकते थे, वे सभी मैंने बाजार में उतार दिए हैं। फेयर एंड लवली से लेकर फेयर एंड हैण्डसम तक। इनकी बिक्री भी धड़ल्ले से हो रही है। तुम मेरे मित्र हो, मेरा आदर करते हो इसलिए बताता हूं और तुम खुद भी जानते हो कि केवल क्रीम लगाने से तो कोई गोरा नहीं होता। नहीं तो हाल में दिवंगत हुए मेरे चहेते माइकल जैक्सन को दसियों बार कॉस्मेटिक सर्जरी करवाने की जरुरत क्यों पड़ती। लेकिन असली बात यह है कि मैं न तो संतुष्ट होकर बैठता हूं और न ही दूसरों को बैठने देता है। मैं चाहता हूं कि हर व्यक्ति में विद्यमान अर्धनारीश्वर का रूप निखरकर सामने आए। एक लड़का सुबह फेयर एण्ड हैण्डसम लगाकर गर्लफ्रेंड से मिलने जाए। और फेयर एण्ड लवली लगाकर शाम को ब्वायफ्रेंड से मिलने जाए।

अब मुझसे रहा नहीं गया। मैंने फिर अपनी सीमाएं तोड़ी। कहा कि -आदमी की मूल प्रकृति के साथ खिलवाड़ मत कीजिए। बाजार जी। संभावनाएं यहां मत टटोलिए। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके आप अपना अस्तित्व ही नहीं बचा पाएंगे। यह तो घर फूंककर तमाशा देखने वाली बात हो गयी। यह कहते-कहते मुझको अपनी सीमा का ज्ञान हो गया। बाजार जी ने कहा कि मैं तो पत्रकारों अपना मित्र मानता था। इसलिए मैंने अपनी रणनीति का खुलासा तुम्हारे सामने कर दिया। मुझे क्या मालूम कि तुम मेरे प्रतिद्वंद्वी धार्मिक गुरुओं के एजेंट हो जो व्यवहारिकता को छोड़कर आदर्शवादियों की भाषा में बात करते रहते हैं। बाजार के मुंह से नैतिकता की दुहाई सुनकर मेरे पास चुप रहने के सिवाय कोई विकल्प नहीं था।

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