लेखक परिचय

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं. लेकिन वे सिर्फ पढ़ाई ही नहीं कर रहे बल्कि एक सक्रिय पत्रकार की तरह कई अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन भी कर रहे हैं. इतना ही नहीं पढ़ाई और लिखाई के साथ-साथ मीडिया में सार्थक हस्तक्षेप के लिए मीडिया स्कैन नामक मासिक का संपादन भी कर रहे हैं.

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pबीते दिनों गाजियाबाद निवासी रणवीर सिंह की हत्या देहरादून पुलिस ने कर दी। यह मामला अभी भी गरमाया हुआ है। रणवीर के पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक उसके शरीर पर चोट के 28 निशान थे। बताया जा रहा है कि पुलिस ने उसकी पिटाई बंदूक से बट से की थी। वहीं दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर से बीच-बीच में पुलिस द्वारा बलात्कार किए जाने की खबरें आती रहती हैं। पुलिसिया जुल्म की ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं। समय-समय पर पुलिस का यह दमनकारी और आपराधिक रवैया मीडिया की सुर्खियां बनता रहा है।

पर पुलिस के आचरण में कोई बदलाव नहीं दिखता है। गांवों से लेकर महानगरों तक में पुलिस के तानाशाही रवैए से लोग दो-चार हो रहे हैं। पुलिस सुधार की तमाम बातें अभी तक हवा-हवाई ही साबित हुई हैं। बहरहाल, एक अहम सवाल यह है कि लोगों की रक्षा का भार वहन करने वाली पुलिस भक्षक की भूमिका में आखिर क्यों नजर आती है? बुनियादी तौर पर देखा जाए तो इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अग्रेजों के जमाने में बना पुलिस अधिनियम है। 1861 में बने पुलिस अधिनियम के मुताबिक ही देश के अधिकांश राज्यों की पुलिस आज भी काम कर रही है। दरअसल, इसे समझा जाना जरूरी है कि 1861 में बने पुलिस अधिनियम की भूमिका पुलिस के चरित्र को आपराधिक बनाने में कितनी ज्यादा है। भारत में आजादी के पहली लड़ाई के तौर पर 1857 के विद्रोह को याद किया जाता है।

जब विद्रोह हो गया और किसी तरह से अंग्रेजों ने इस पर काबू पा लिया तो यह बात उठी की भविष्य में ऐसे विद्रोह नहीं हो पाएं, इसके लिए आवश्यक बंदोबस्त किए जाएं। इसी के परिणामस्वरूप 1861 का पुलिस अधिनियम बना। इसके जरिए अंग्रेजों की यह कोशिश थी कि सरकार के खिलाफ कहीं से भी कोई विरोध का स्वर नहीं उठ पाए और सरकार के हर सही-गलत फरमान पर अमल किया जा सके। पुलिस अग्रेजों की इच्छा के अनुरुप परिणाम भी देती रही। पर इन सबके बावजूद भारत 1947 में आजाद हो गया। कहने के लिए देश का अपना संविधान भी बन गया। लेकिन नियम-कानून अंग्रेजों के जमाने वाले ही रहे। देश आजादी के बासठवीं सालगिरह मनाने से कुछ दिनों की दूरी पर खड़ा है लेकिन आजाद भारत के इतने साल गुजरने के बावजूद भी व्यवस्था जस की तस बनी हुई है।

पुलिस का खौफनाक रवैया भी यथावत है। हालांकि, कुछ राज्यों ने नए अधिनियम के तहत पुलिस को संचालित करने की कोशिश की है। लेकिन सच यह है कि नए और पुराने अधिनियम में कोई खास फर्क नहीं है। महाराष्ट और गुजरात में 1951 का बंबई पुलिस अधिनियम लागू है। कर्नाटक में 1963 में और दिल्ली में 1978 में नया पुलिस अधिनियम बनाकर पुलिस को नियंत्रित करने की कोशिश की गई। पर नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही निकला है। इन राज्यों की पुलिस का चरित्र भी दूसरे राज्यों की पुलिस से बहुत अलग नहीं है। इन राज्यों की पुलिस भी मुठभेड़ के नाम पर हत्याएं करती है और नया अधिनियम इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। पुलिस के रवैए को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पुलिस सुधार की तमाम कोशिशें अब तक नाकाम ही साबित हुई हैं। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद पुलिस सुधार के खातिर राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन 1979 में किया गया था। इस आयोग ने रिपोर्ट देने की शुरुआत 1981 से की। इसने कुल आठ रपटें दीं।

इसके बाद 1998 में बनी रेबेरो कमेटी ने भी पुलिस सुधार से जुड़ी अपनी रपट सरकार को दे दी। लेकिन ये सब रिपोर्ट ठंढे बस्ते में पड़ी हैं और पुलिस सुधार के लिए कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठाया जा सका है। पुलिस के बुरे बर्ताव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आम लोग पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने में भी हिचकिचाते हैं।

आजकल हालत तो यह हो गई लोग पुलिस के पास अपनी शिकायत लेकर जाने की बजाए मीडिया के पास पहुंच रहे हैं। मीडिया ट्रायल के बढ़ते चलने के लिए कहीं न कहीं पुलिस भी जिम्मेवार है। पिछले कुछ सालों से ऐसा देखने में आया है कि पुलिस का प्रयोग समय-समय पर सरकारें अपने विरोध को कुचलने के लिए भी करती रही हैं।

धरना-प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज हो जाना बेहद आम हो गया है। ऐसा करके एक तरह से लोगों के हाथ से शांतिपूर्ण विरोध करने का औजार छिना जा रहा है और परोक्ष तौर पर ही सही उन्हें हिंसात्मक विरोध करने के रास्ते पर आगे बढ़ाया जा रहा है। जब से देश में नई आर्थिक व्यवस्था लागू हुई है तब से सरकार के इशारे पर पुलिस पूंजिपतियों की हितों की रक्षा की खातिर लोगों पर कहर ढा रही है। 2005 में गुड़गांव में हीरो होंडा के कर्मचारियों पर बेरहमी से डंडे बरसाती पुलिस को सारी दुनिया ने टेलीविजन के जरिए देखा था।

ऐसे कई मामले गाहे-बगाहे सामने आते रहते हैं। फर्जी मुठभेड़ से जुड़े कई मामले अब तक उजागर हो चुके हैं। इनमें से कुछ में तो पुलिसवालों को सजा भी मिली है। ऐसा ही एक मामला है 1997 का। उस साल कनाट प्लेस में हुआ मुठभेड़ बेहद चर्चा में रहा था। दिल्ली पुलिस के आयुक्त निखिल कुमार को त्यागपत्र देना पड़ा था।

इस कांड के दस साल बाद यानी 2007 में इस मामले में पुलिसकर्मियों को अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया। गुजरात दंगों और 1984 के दंगों में भी पुलिस का रवैया रक्षक से ज्यादा भक्षक वाला ही रहा है। देश की पुलिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार की जड़ें भी बेहद गहरी हैं। हर छोटे-बड़े काम के लिए पुलिस द्वारा पैसा वसूला जाना आम बात है।

रेहड़ी पटरी वालों से लेकर रेलगाड़ियों में सामान बेचने वाले वेंडरों तक से वसूली करने में पुलिस बाज नहीं आती है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि जिस देश की पुलिस का चरित्र ऐसा हो तो वहां से भय और असुरक्षा का माहौल आखिर कैसे दूर हो सकता है? आखिर पुलिस को मानवीय चेहरा और चरित्र कैसे प्रदान किया जाए? पुलिस का गठन रक्षा करने के लिए हुआ है न कि अराजकता को हवा देने या आम लोगों के साथ तानाशाह जैसा बरताव करने के लिए।

पुलिस के व्यवहार में सुधार करने के लिए सबसे पहले तो अंग्रेजों के जमाने के पुलिस अधिनियम में बदलाव की दरकार है। क्योंकि गाइडलाइन को बदले बगैर व्यवस्था को बदलना असंभव सरीखा है। जिस जमाने में यह पुलिस अधिनियम बना था उस वक्त की चुनौतियां आज से काफी अलग थीं। इसलिए मौजूदा दौर की मुश्किलों से निपटने के लिए नए नियमों और कानूनों की जरूरत है। पुलिस की भूमिका और जिम्मेदारियों में भी काफी बदलाव आ गया है। पुलिस के राजनीतिक प्रयोग पर भी लगाम लगाया जाना बेहद जरूरी है। सत्ताधीश अपनी सियासी रोटी सेंकने के फेर में कई बार रक्षक को भक्षक की भूमिका में तब्दील कर देते हैं।

पुलिस के चरित्र में सुधार के लिए एक ऐसी व्यवस्था कायम होनी चाहिए जिसमें पुलिस के खिलाफ होने वाली शिकायतों का निपटारा जल्दी से जल्दी और निष्पक्ष तरीके से हो सके। कुछेक मामलों को छोड़ दें तो अभी हालत यह है कि पुलिस के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने में लोगों की हाड़ कांपती है। क्योंकि ऐसा कर देने पर पुलिस संबंधित पक्ष को प्रताड़ित करने के लिए नई-नई तरकीब तलाश लेती है। इन सबसे ज्यादा जरूरी है पुलिस की मानसिकता में बदलाव लाना।

इस व्यवस्था में काम करने वालों के मन में यह बात बैठानी होगी कि उनका काम लोगों को डराना-धमकाना नहीं बल्कि इसके खिलाफ आवाज उठाने में सक्षम बनाना है और आम जन को सुरक्षा एक अहसास कराना है। ऐसा किए बगैर लोगों का खाकी वर्दी वालों पर विश्वास कायम होना काफी मुश्किल है। यह निश्चित तौर पर पूरी व्यवस्था की सेहत के लिए काफी नुकसानदेह है।

One Response to “पुलिस सुधार है बेहद जरूरी- हिमांशु शेखर”

  1. sunil patel

    बहुत सही कहा। हमारे देश में न सिर्फ पुलिस व्यवस्था बल्कि पूरे सिस्टम को बदलने की जरूरत है। यह सही है कि हमारे देश में आज भी 50 60 साल पुराने समय के नियम चल रहे है जिन्हें आज की जरूरत के हिसाब से बदलने की जरूरत है।

    पुलिस व्यवस्था को राज्य सरकार की निजी संपत्ति न होकर एक सामाजिक, सेवा एवं सुरक्षात्मक संस्था के रूप में कार्य करना चाहिए।

    जब सभी सरकारी कर्मचारियों को लगने लगेगा की उनकी नौकरी उनकी बपौती नही है और वह नौकर (सरकारी नौकर) जिसकी तनख्वाह से उसका परिवार चलता है तो आधी से ज्यादा समस्याऐं अपने आप सुधर जाऐगीं।

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