लेखक परिचय

सुधीर तालियान

सुधीर तालियान

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meatसुधीर तालियान
मीट निर्यात भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कुत्ते की हड्डी बन चुका है। खून कुत्ते के मसूड़ों से आता है लेकिन वो समझता है कि ये हड्डी का कमाल है। स्वार्थ और राजनीति के चलते भारत की अर्थव्यवस्था भी इस बीमारी से ग्रस्त हो चुकी है। हमारे नीति नियंताओं का कहना है कि इससे देश बहुत सरे डॉलर प्राप्त करता है और लोगो को रोजगार मिलता है। लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है।
एपिडा के अनुसार देश में 42 बूचड़खाने और मांस प्रसंस्करण संयंत्र पंजीकृत है। जिनमे 74000 लोग काम करते है तथा अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 150000 लोगो को रोजगार प्राप्त है। इन लोगों का वेतन और विदेशी मुद्रा की प्राप्ति तथा विभिन्न प्रकार के करो से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। देश प्रतिवर्ष लगभग 450 करोड़ डॉलर निर्यात करता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह बहुत अच्छी राशि है। लेकिन यह सच नहीं है। अब इसका दूसरा पहलु देखते है जो अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष रूप से हानि तो पहुंचा ही रहा है साथ ही देश के विकास को भी अवरुद्ध कर रहा है।
केंद्र सरकार एक बूचड़खाने की स्थापना के लिए 15 करोड़ तक के निवेश के लिए सामान्य क्षेत्र में 50% और पहाड़ी क्षेत्र के लिए 75% सब्सिडी मुहैया कराती है। साथ ही रियायती दर पर बैंक ऋण, रियायती पानी एवं सब्सिडीयुक्त बिजली देती है। बूचड़खाने के कसाई और मांस को हड्डी से अलग करने वाले कर्मचारी को केंद्र न्यूनतम वेतन देता है। केंद्र मीट निर्यातकों को 70 रुपये प्रति किग्रा० की परिवहन सब्सिडी भी देता है। अब तक लगभग 300 करोड़ रुपये की सब्सिडी मीट कारोबार को दी जा चुकी है। और इसके पीछे जो सरकारी अमला लगा है उसका खर्च अलग है।
भारत में मीट एक्सपोर्टर एसोसिएशन के कुल 22 सदस्य है। सभी एन० आर ० आई ० है। विशेष बात ये है कि इन लोगों ने भारत के साथ ही एक -एक मीट कंपनी विदेशो में भी खोल रखी है। भारत की कंपनी उसी मालिक की विदेशी कंपनी को मीट निर्यात करती है जो समय -समय पर भारतीय मीट को अपने यहाँ पहुँचने के बाद रिजेक्ट कर देती है। इस रिजेक्शन लेटर का सहारा लेकर भारत की कंपनी बड़ा घाटा दिखा देती है। जबकि वास्तव में कंपनी के मालिक को कोई घाटा नहीं होता बल्कि बहुत बड़ी बचत होती है। विदेशी फर्म के द्वारा मीट बेच कर तो लाभ कमाता ही है साथ ही भारत में आयकर, सम्पत्तिकर, कम्पनीकर, एवं बिजली पानी के खर्च से भी बच जाता है। आंकड़े गवाह है कि आजतक देश को मीट निर्यात से लाभ नहीं हुआ है।
मीट निर्यात से मिलने वाले रोजगार के मुकाबले किसानो और मजदूरो पर दस गुना अधिक दुष्प्रभाव पड रहा है। प्रतिवर्ष कुल मीट निर्यात का 95% भैंस या गाय का होता है। जिससे दूध देने वाले मवेशी की देश में बहुत कमी हो गयी है। मवेशी किसान और मजदूर की सम्पत्ति ही नहीं उसके जिन्दा रहने का आधार भी होता है। मीट के इस कारोबार कुछ विशेष लोगो के पास अकूत धन इकठ्ठा हो गया है और शेष जनसँख्या गरीब बनी हुई है। संसद की विशेषाधिकार प्राप्त समिति ने भी भैंस कटान बंद करने की संस्तुति की थी। और राष्ट्रिय मवेशी नीति 2013 तैयार की जो देश में अभी तक पूर्ण रूप से लागू ही नहीं हो पायी।
विश्व में क्वालिटी दूध और उसके उत्पादों की भारी किल्लत है। यदि सरकार दूध उत्पादन को प्रोत्साहित करे तो अर्थव्यवस्था को सीधे ही लाभ होगा और किसान मजदूर वर्ग भी बहुत तेजी के साथ समृद्ध होगा। एक भैंस एक वर्ष में एक लाख रुपये से अधिक का दूध देती है। अगर नस्ल सुधार और चिकित्सा व्यवस्था पर थोड़ा ध्यान दिया जाये तो दूध लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। दूध के आलावा उनसे प्राप्त गोबर से भी बायोगैस का उत्पादन किया जा सकता है। जिससे गैस पर दी जाने वाली सब्सिडी का बोझ कम होगा। एक सीलेंडर बायोगैस 70 से 80 रुपये में प्राप्त हो जाती है। देश में 7 करोड़ टन लकड़ी भोजन बनाने के लिए जलायी जाती है जिसके लिए लगभग 3 करोड़ पेड़ काट दिए जाते है। इस तरह ये पेड़ बच जायेंगे और प्रदूषण से भी निजात मिलेगी।
गैस के बाद जो खाद मिलता वह बहुत गुणवत्तापरक होता है जो रासायनिक खाद पर निर्भरता काम करेगा। इस तरह रासायनिक खाद के आयात का खर्च कम होगा। खेत की उर्वरता बढ़ेगी जिससे फसल उत्पादन बढ़ेगा और फसल की शुद्धता से स्वास्थ भी बना रहेगा एवं चिकित्सा पर होने वाला खर्च कम होगा। गोबर की खाद प्रयोग करने पर खेत को भी पानी की कम आवश्यकता होती है।
अगर मात्र एक वर्ष के लिए भी भैंस व गाय के मीट निर्यात पर दी जाने वाली सब्सिडी और खर्च बंद करके दूध उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाये तो लगभग दस करोड़ लोगों को सीधे तौर पर आर्थिक रूप से समृद्ध किया जा सकता है। और ये दस करोड़ लोग भारतीय अर्थव्यवस्था को भी पंख लगा देंगे।

No Responses to “भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए घातक मीट निर्यात”

  1. sureshchandra karmarkar

    पका लेख वास्तविकता को दर्शाता है. मैं स्वयं देहात से जुड़ा हुआ आदमी हुँ. कई गरीब केवल एक गाय या एक भेंस पर अपना गुजर आरम्भ करते हैनऽउर धीरे धीरे पशुधन बढाकर अपनी आय का स्थाई जरिया बनालेते हैं. यदि मांस के अंधाधुंध निर्यात से पशुधन गया तो देश मैं दुग्ध उत्पादन प्रभावित ,दूसरे निर्यातकों को जरूरत से ज्यादा सब्सिडी दी गयी तो उसका असर कर भुगतान करने वाले पर पड़ेगा,

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