मेरे सपनों का अखंड भारत

सत्यमेव जयते,

bharat mataडॉ. वेदप्रताप वैदिक

मध्यप्रदेश में निमाड़ के एक कस्बे सनावद के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने आग्रह किया कि मैं उनके यहां आऊं और ‘मेरे सपनों का अखंड भारत’ विषय पर बोलूं। कल रात वहां भाषण हुआ। मध्य-रात्रि तक सवाल-जवाब चलते रहे। मुझे आश्चर्य हुआ कि जिस विषय में दिल्ली के नेताओं की न तो कोई समझ है और न रुचि है उसमें सनावद-जैसे कस्बों में गहरी दिलचस्पी है। यह भारत की बौद्धिक जागरुकता का प्रमाण है।
मैंने उन जागरुक श्रोताओं को बताया कि मेरा अखंड भारत सिर्फ भारत,पाकिस्तान और बांग्लादेश नहीं है। मेरे भारत का जन्म 1947 में नहीं हुआ था। वह हजारों वर्षों से चला आ रहा है। मेरा भारत वह छोटा-सा भारत नहीं है, जिस पर कभी राजा-महाराजाओं, कभी बादशाहों और सुलतानों और कभी राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों का राज रहता आया है। मेरा भारत राजनीतिक नहीं,सांस्कृतिक भारत है। राजनीतिक राष्ट्र डंडे के जोर से बनता है और सांस्कृतिक राष्ट्र प्रेम के धागे से जुड़ता है। इतिहास में जो भारत रहा है, वह तिब्बत (त्रिविष्टुप) से मालदीव तक और बर्मा (ब्रह्मदेश) से ईरान (आर्याना) तक फैला हुआ था। इस फैलाव में आज के लगभग 16-17 देश आ जाते हैं। 30 साल पहले जब ‘सार्क’ बना था तो उसे मैंने ‘दक्षेस’ नाम दिया था याने ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ’। अभी उसमें सिर्फ 8 राष्ट्र हैं। इसे हमें अभी और फैलाना है। अब से 100 साल पहले तक इन सभी क्षेत्रों में आने-जाने के लिए जैसे पासपोर्ट और वीज़ा की जरुरत नहीं होती थी, वही स्थिति अब भी बहाल करनी है। यह भारत तभी अखंड होगा जबकि इसके सारे खंडों को जोड़-जोड़कर हम यूरोपीय संघ से भी बेहतर महासंघ खड़ा कर दें। वह भारत नहीं, महाभारत होगा, बृहत्तर भारत होगा, अखंड भारत होगा। इस महाभारत संघ के निर्माण में हमारे विभिन्न पड़ौसी राष्ट्रों की संप्रभुता आड़े नहीं आएगी। उनका पूरा सम्मान होगा। जब भारत देश में विभिन्न धर्मों, विभिन्न जातियों, विभिन्न वेष-भूषाओं, विभिन्न भोजनों,विभिन्न रीति-रिवाजों वाले लोग प्रेम से मिलकर रह सकते हैं तो उस महासंघ में क्यों नहीं रह सकते? यदि अगले पांच वर्षों में हम वैसा महासंघ खड़ा कर सकें तो यह क्षेत्र दुनिया का सबसे मालदार और ताकतवर क्षेत्र की तरह जाना जाएगा,क्योंकि दुनिया के सबसे ज्यादा नौजवान यहीं हैं और संपन्नता के असीम स्त्रोत भी यहीं हैं। उनके दोहन के लिए बस दूरदृष्टि चाहिए।

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