कोरोना नही वरन् भविष्य की चिंता मे प्रवासी भारतीय

मानव प्रवास कोई नयी घटना नही है शदियों से देश दुनिया के विभिन्न हिस्सों से लोग कई पीढ़ियों से पलायन करते रहे हैं। ब्रिटेन में रह रही 30 प्रतिशत आबादी रोमन काल के दौरान विदेशों से पलायन करके आई थी। प्रवास के कारण समय-समय पर अलग-अलग रहे है आज
प्रवासी मजदूरो का पलायन कोरोना महामारी और भूख के कारण हो रही है। संवेदनहीन और पराये शहरों में जीवन और जीविका की अनिश्चितता से उत्पन्न व्याकुलता के कारण प्रवासी कामगारों में अपने गांव जाने की प्रबल इच्छा देखने को मिल रही है। शहरों में फंसे प्रवासी कामगारों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। वे भुखमरी की स्थिति मे पहुंच गए हैं। इसका निदान करने में राहत योजनाएं विफल रही हैं। ऐसे में औद्योगिक इकाइयों को शुरू करना सरकार की निष्ठुरता को भी उजागर करता है। प्रवासी कामगारों की जांच कर उन्हें सुरक्षित घर भेजने की जगह मालिकों की जरूरतों के अनुसार इधर-से-उधर भेजा जाएगा। आशंका यह है कि जो प्रवासी मजदूर यह अनुदेश नहीं मानेंगे कहीं उन्हें राहत योजनाओं की आंशिक मदद से भी न हाथ धोना पड़ेगा।कई जगह मजदूरों को रोज काम पर ले जाने के मालिकों के बोझ को आसान करने के लिए उनके फैक्टरियों में ही सोने का इंतजाम करने का प्रावधान किया गया है। मगर औद्योगिक इकाइयों को शुरू करना केवल मजदूरों के लिए ही खतरनाक नहीं है। यह कोविड-19 के सामुदायिक संक्रमण के खतरे को विनाशकारी स्तर पर आगे बढ़ाने का काम कर सकता है। प्रवासी मजदूरों की बहुसंख्यक आबादी गंदी और भीड़-भरी झुग्गी-बस्तियों में रहती है झुग्गियों में रहने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए शारीरिक-दूरी बना पाना असंभव है। विडंबना है कि कार्यस्थलों पर केवल शारीरिक-दूरी बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है जो कामगारों की रिहाइशी स्थिति को एक सिरे से खारिज करता है। इसके अतिरिक्त शहरी गरीबों और विशेष रूप से शहरी झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले औसत प्रवासी मजदूर के लिए पानी की सुविधाएं बहुत सीमित हैं।
     पूरे देश में इस जानलेवा वारस का असर फैलने की वजह से लॉकडाउन होने के कारण जहां इन मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई है वहीं उनके जान के भी लाले पड़ गए है। मार्च के दूसरे सप्ताह से मजदूरों के पलायन का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अब तक थमा नहीं है कोरोना का संक्रमण तो जैसे-तैसे बीत जाएगा। अगर हम इसमें बच गए तो खाएंगे क्या? घर में रखे थोड़-बहुत पैसे तो तेजी से खत्म हो रहे हैं? उनके इस सवाल का जबाब शायद दुनिया भर में किसी के पास नही है। कोरोना वायरस की वजह से होने वाली उथल-पुथल की वजह से लाखों लोगों के सामने यही सवाल मुंह बाए खड़ा है। किस भरोसे पर गाँव वापस जाएं ? गाँव में येसा कोई रोजगार नहीं है कि जाते ही काम मिल जाएगा। वहां जाकर करेंगे भी क्या ? यहां ये तो उम्मीद है कि लॉकडाउन खुलने के बाद हो सकता है कुछ काम ही मिल जाए।
         लेकिन फिर भी लॉकडाउन के बाद गाँव वापसी के लिए लाखों मजदूर सड़क पर आ गये हैं। कोई गोद में बच्चे को लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चला जा रहा है, तो कोई साइकिल से एक हजार किलोमीटर की यात्रा करके पहुंच रहा है। तो कुछ सड़कों,रेल की पटरियों, ट्रकों, आदि साधनों से घर पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इनमें से कुछ भूख से रास्ते में ही दम तोड़ दे रहे हैं, कुछ सड़क हादसे में तो कुछ ट्रेन से कटकर बेमौत मर गये है , इसके बावजूद ये सब अपने गाँव लौटना चाहते हैं
बडा सवाल यह है कि क्या गांव में काम मिलेगा? गांव में पहले से ही मनरेगा योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ रही है योजना के पैसे का बन्दर बाट किसी से छिपा नहीं है साथ ही आधुनिक तकनीक ने कृषि कार्य मे भी मानव श्रम को काफी कम कर दिया है येसे मे गांव में रोजगार के अवसर क्षीण होते जा रहे है। फिर भी अगर काम मिलेगा भी तो मजदूरी कितनी मिलेगी? मजदूरों की अधिकता से काम कम मिलेगा एक काम के लिए 10 मजदूर खड़े होंगे, जाहिर सी बात है तब मजदूरी घट जायेगी। हकीक़त यह है कि लोग अभी कोरोना संक्रमण के दहशत में इन्हें काम पर बुला भी नहीं रहे हैं।हर गाँव में 200-300 मजदूर शहरों से वापस पहुंच गये। इस समय उनका पेट भरना ही बड़ी बात है। कुछ लोग घर नही जाना चाहते हैं वो लॉकडाउन खुलने का इंतजार कर रहे है जिससे उन्हें जल्दी से काम मिल सके। मजदूरो को  सरकार से पैसे नहीं वरन् काम चाहिए । एक हजार रुपए महीने में किसी मजदूर का भला होने वाला नहीं। सरकार कोई ऐसी रणनीति बनाये जिससे आने वाले दिनों में हर मजदूर को काम मिले। अगर ऐसा नहीं किया तो मजदूरों का परिवार भूखमरी का शिकार हो जायेगा। लॉकडाउन के कारण देश के बड़े व छोटे शहरों से हजारों की संख्या में पलायन शुरू हो गया है। केंद्र सरकार बार बार लोगों से अपील की है कि जहां है वही पर रहे। समस्या यह है कि वह मजदूर जो सूर्योदय के साथ काम पर निकलता था। और शाम तक अपने परिवार की रोटी का जुगाड़ करता था वह कहां जाए।
         लॉकडाउन के कारण सारा कामकाज ठप है। सारी व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई हैं। दिहाड़ी मजदूर जो छोटे-मोटे उद्योगों, दुकानों व ढाबों, बडे बडे माल आदि मे कार्य करते थे,उनके पास भी कुछ करने को नहीं है। उनके हाथ मे नाही काम है नाही भोजन। शहरों से मजदूरों के पलायन का एक कारण कोरोना तो दूसरा बड़ा कारण भूख है। काम न होने के कारण उनको पेट भर खाना मिलना भी मुश्किल हो रहा है। ऐसी स्थिति में उनके पास एक ही विकल्प है घर वापसी। घर पहुंचना कैसे है इस बात की परवाह किए बिना हजारों की संख्या में बच्चे, पुरूष, महिला, बजुर्ग समेत सड़कों पर निकल पड़े हैं। जिस संख्या में वह सड़कों पर है उससे कोरोना वायरस के बढने का खतरा अधिक हो गया है लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। हालात से मजबूर मजदूर जाएं तो जाएं कहां। शहरों में नाही रैन बसेरा है और न खाने को भोजन। ऐसे में वह खाली पेट भाग्य भरोसे घर वापसी के लिए निकल पड़े है।        
             प्रवासी मजदूरों मे अधिकतर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और मुसलमान होते हैं जो समाज के हाशिए पर खड़े समूहों से आते हैं।प्रवासियों का यह वर्ग देश का सर्वाधिक ग़रीब और आर्थिक रूप से असुरक्षित वर्ग है। जो योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते हैं। पहचानपत्र उन्हें उस जगह का निवासी होने का प्रमाण देता है जो उनके पास नहीं होता और इस वजह से प्रवासी मज़दूर खाद्य, जल, स्वच्छता, स्वास्थ्य सुविधा या आवास की सुविधा का लाभ नहीं उठा सकते। उल्टे  झुग्गी-झोपड़ियों, खुली जगहों जैसे सड़क के किनारे, रेल की पटरियों के किनारे या सार्वजनिक/निजी ज़मीनों पर अस्थायी झोपड़ी बनाकर और अनौपचारिक रूप से किराए पर उपलब्ध मकानों में रहने के लिए बाध्य है जिन घरों में वे रहते थे,किराया न देने के कारण मकान मालिकों वहाँ से निकाल दिया सार्वजनिक जगहों पर रूकने पर उन्हें बेवजह परेशान भी किया जाता है। न तो उनके पास राशन ख़रीदने के पैसे हैं, न रहने की कोई जगह , अपने गाँव लौटने के सारे रास्ते बंद हैं क्योंकि परिवहन के सारे साधन बंद कर दिए गए हैं, ऐसी स्थिति में हज़ारों की संख्या में मज़दूर शहरों में  भुखमरी का सामना कर रहे हैं।
      सरकार को चाहिए की गांव से शहर और शहर से गांव का ये पलायन रोकने के लिए ठोस कदम उठाये गांवों कस्बो मे भी औद्योगिक क्षेत्रों की स्थापना करें । रोजगार के नये-नये अवसर उत्पन्न करें जिससे आने वाली प्रवासी मजदूरों की समस्या का समाधान किया जा सके।

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