लेखक परिचय

डा. अरविन्द कुमार सिंह

डा. अरविन्द कुमार सिंह

उदय प्रताप कालेज, वाराणसी में , 1991 से भूगोल प्रवक्ता के पद पर अद्यतन कार्यरत। 1995 में नेशनल कैडेट कोर में कमीशन। मेजर रैंक से 2012 में अवकाशप्राप्त। 2002 एवं 2003 में एनसीसी के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। 2006 में उत्तर प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ एनसीसी अधिकारी के रूप में पुरस्कृत। विभिन्न प्रत्रपत्रिकाओं में समसामयिक लेखन। आकाशवाणी वाराणसी में रेडियोवार्ताकार।

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-डॉ. अरविन्द कुमार सिंह-   humanity
नीत्शे से किसी ने एक बार पूछा- तुम हमेशा हंसते रहते हो, प्रसन्न रहते हो। नीत्शे ने कहा- ‘‘अगर तुमने पूछ ही लिया है तो मैं असलियत भी बता दूं। मैं इसलिये हंसता रहता हूं कि कहीं रोने न लगूं। आदमी बिल्कुल वैसा नहीं है, जैसा दिखाई पड़ता है। भीतर कुछ और है बाहर कुछ और है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को संचालित कर रहा है व्यक्ति का मन। यहां यह सूत्र समझ लेने जैसा है कि भय के होते हुये व्यक्ति, मन का साक्षात्कार नहीं कर सकता। इसलिये भय को छोड़कर साहसपूर्वक हमें स्वयं को देखने की तैयारी करनी होगी।
पत्नी रो रही थी, विलख रही थी और पति को जगाये जा रही थी, ‘‘उठो ! अपना पप्पू अब दुनिया में नही रहा’’। आखिरकार पति ने आंखें खोली, निर्विकार रूप से वह अपनी पत्नी का चेहरा निहारता रहा। पत्नी बोली, ‘‘पप्पू अब दुनिया में नहीं रहा, तुम रोते क्यों नहीं’’ ? पति के चेहरे पर अब भी आश्चर्य का भाव था। उसने कहा, ‘‘ किसके लिये रोऊं? सपना देख रहा था, मेरे बारह पुत्र थे, वो मर गये, उनके लिये रोऊं? – सोकर उठा। तुमने बताया अपना पप्पू मर गया, उसके लिये रोऊं? अगर ये सच है तो वो सपना क्या था? अगर सपना सच था तो ये क्या है? मैं सो गया तो सपना कौन देख रहा था ? मैं बड़ी ऊलझन में हूं।
वे कौन हैं ? विचार जिसकी खुराक है। अतीत में विचरण करना जिसका शगल है और भविष्य के सपने बुनना जिसकी आदत है। उससे मात्र मृत्यु के उपरान्त ही पीछा छुड़ाया जा सकता है, या पीछा छूट सकता है। हां, आध्यात्मिक व्यक्ति ध्यान के माध्यम से उसे नियंत्रित कर सकता है। शब्दों के माध्यम से यदि उसे कोई नाम दिया जाय तो उसे मन कहा जा सकता है।
व्यक्ति की पांच स्वर्णेद्रिय और पांच कर्मेंद्रिय होती हैं। इसे नियन्त्रित करने वाला आत्मवान कहलाता है। सच्चे अर्थों में वही अध्यात्मिक पुरुष है। विडम्बना तो ये है, जब इन इन्द्रियों की कमान आत्मा के हाथ में होती है तो व्यक्ति सद्मार्ग पर अग्रसर होता है और जब मन हुकूमत करता है तब व्यक्ति दुखी और गलत मार्ग पर अग्रसर होता है। यहां यह समझ लेने जैसा है कि मन हमेशा द्वैत में होता है जबकि आत्मा एकल और सत्य चिन्तन के साथ होता है।
मन की पकड़ दसों इन्द्रियों  पर ढीली करने के लिये आवश्यक है कि हम इसकी कार्यप्रणाली को समझ लें। विचार मन की खुराक है। विचार की उत्पत्ति वाक्य विन्यास से है और वाक्य विन्यास भाषा की विषय वस्तु है। भाषा का ज्ञान हमारे विचार को संचालित कर देता है। विचार संचालित होते ही हमारा मन कार्यरत हो जाता है। वो अतीत और भविष्य में चला जाता है। मन की खसियत है वो या तो रहेगा अतीत में या फिर रहेगा भविष्य में। वर्तमान में उसकी उपस्थिति, उसकी मृत्यु है। साधना का सम्पूर्ण सूत्र वर्तमान में होने पर टिका है। यही कारण है, ध्यान की ज्यादातर विधियां स्वांस पर आधरित है, क्येांकि स्वांस के अतीत या भविष्य में होने की कोई व्यवस्था नहीं है। वो जब भी होगी वर्तमान में होगी।
बड़ी दिलचस्प बात है। हमें डॉक्टर प्रमाण देता है कि हम पूर्णतः स्वस्थ हैं, क्या यह प्रमाण पत्र सच के करीब है ? आईये देखते हैं – ईमानदारी से दस मिनट के लिये आपके मन में जो भी विचार आता है, उसे आप वैसा ही लिख लें। लिखने के बाद उसे किसी अन्य व्यक्ति को पढ़ने को दें। विश्वास मानें, उस व्यक्ति की प्रतिक्रिया आपके प्रति चौंकाने वाली होगी। उस व्यक्ति की तो बात आप छोड़ दें, आप खुद ही आश्चर्य से भर जायेंगे कि मेरे मन के भीतर यह क्या चल रहा है? मैं स्वस्थ हूं या विक्षिप्त हूं ? हम दस मिनट के लिये भी मन के भीतर झांक कर नहीं देखते कि वहां क्या चल रहा है। हो सकता है कि हम इसलिये न झांकते हों कि हमें बहुत गहरे में इस बात का पता है कि वहां क्या चल रहा है। ऊपर से हम एक दूसरे से अच्छी बातचीत करके अपना काम चला लेते हैं, भीतर विचारों की आग जलती है, ऊपर से हम शांत और स्वस्थ मालूम होते हैं। भीतर सब ठीक नहीं है। हम अस्वस्थ एवं विक्षिप्त हैं। मुस्कुराहटों के पीछे ढेर सारे आंसुओं का जखीरा है।
नीत्शे से किसी ने एक बार पूछा – तुम हमेशा हंसते रहते हो, प्रसन्न रहते हो। नीत्शे ने कहा- ‘‘अगर तुमने पूछ ही लिया है तो मै असलियत भी बता दूं। मैं इसलिये हंसता रहता हूं कि कहीं रोने न लगूं। आदमी बिल्कुल वैसा नहीं है जैसा दिखाई पड़ता है। भीतर कुछ और है बाहर कुछ और है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को संचालित कर रहा है व्यक्ति का मन। यहां यह सूत्र समझ लेने जैसा है कि भय के होते हुये व्यक्ति, मन का साक्षात्कार नहीं कर सकता। इसलिये भय को छोड़कर साहसपूर्वक हमें स्वयं को देखने की तैयारी करनी होगी।
क्या यह दिलचस्प बात नहीं कि हम आत्मा पाने के लिये उत्सुक होते हैं, परमात्मा के दर्शन के लिये भी उत्सुक होते हैं पर अपने सीधे और सच्चे दर्शन का साहस नहीं जुटा पाते हैं। याद रखें पहली सच्चाई हमारा मन है जो विचारों के सहारे अतीत और भविष्य में भटकता रहता है। उसे ही देखना और जानना होगा तथा पहचानना होगा। आखिर कैसे? आईये थोड़ा इस पर विचार करें –
मन के कुछ नियम है। जिस चीज को हम रोकना चाहेंगे, हटाना चाहेंगे, बचाना चाहेंगे, वही चीज हमारे चित्त का केन्द्र बन जायेगी। हमारा आकर्षण हो जायेगी। उस आकर्षण के इर्द-गिर्द ही मन चक्कर काटने लगेगा। हमारी बातों पर यकीन नहीं ? आप कोशिश करके देख लिजिये। हमें यह ख्याल में रखना होगा कि मन में क्या आये और क्या न आये, इसका कोई आग्रह लेने की जरूरत नहीं है। उसे सिर्फ देखना है, हमारी कोई शर्त नहीं, कोई बाध्यता नहीं। इसे इस रूप में समझें, जब आप कोई फिल्म देखने जाते हैं और उससे जुड़ते हैं तो आपके  सारे इमोशन्स कार्य करने लगते हैं। आप रोते हैं, आप हंसते हैं और आप फिल्म देखकर डरते भी हैं। पर ज्यों ही आप को ख्याल आता है कि आप फिल्म देख रहे हैं तो आप सारे इमोशन्स से बाहर आ जाते हैं। कुछ ऐसा ही ख्याल मन के साथ रखें।
ध्यान हमें शब्द से परे ले जाते हैं। हमें वर्तमान में लाकर खड़ा कर देते हैं। याद रखें, शब्द के आभाव में मन की कोई सत्ता नहीं और आपके वर्तमान में होते ही मन गायब हो जायेगा। क्योंकि उसकी उपस्थिति के लिये अतीत और भविष्य आवश्यक है। मन को अतीत और भविष्य में जाने के लिये विचारों की खुराक आवश्यक है। इसलिये इस सूत्र को हमेशा ध्यान में रखें, निषेध आकर्षण है,  इन्कार आमन्त्रण है। अतः मन में क्या आये और क्या न आये, इसका कोई आग्रह लेने की जरूरत नहीं है।
अपनी बात समाप्त करने के पूर्व कुछ बातों को संज्ञान मे लेने का आग्रह करूंगा। यदि हमें मन के खेल को समझना है और उसके दुष्चक्र से बाहर निकलना है तो हमें याद रखना होगा –
  • भय को छोड़कर स्वयं को हमारी देखने की तैयारी हो।
  • मन पर कोई प्रतिबन्ध न लगाये।
  • मन के भीतर जो भी विचार उठे उसके प्रति हम तटस्थ भाव रखे।
यदि हमने ऐसा नही किया तो हो सकता है, चीनी दार्शनिक लाओत्से की तरह हमारी भी एक सुबह कोई उलझान लेकर हमारे समक्ष उपस्थित हो- कहते हैं लाओत्से घर के बाहर उदास बैठा था। उसके पड़ोसी ने पूछा-‘‘ तुम इतने उदास क्यों हो?’’ मेरी उदासी का कारण कल रात देखा गया एक सपना है – लाओत्से ने जवाब दिया। ऐसा क्या था जो सपने ने तुम्हें इतना परेशान कर दिया, पड़ोसी ने पूछा? लाओत्से ने कहा – सुबह आंख खुलते ही मैं उलझन में पड़ गया हूं। सपने में देखा मैं एक तितली बन गया हूं और बागीचे में फूलो पर मंडरा रहा हूं। आंख खुलने पर सोच रहा हूं। कहीं दिन में अब वो तितली तो नहीं सो गयी है और मैं उसके सपने में आदमी तो नहीं बन गया हूं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं, मैं तितली हूं या आदमी? प्रश्नों का उत्तर प्रश्नों में ही छिपा है। जो समझ गया वो उलझन से पार और जो नहीं समझा वो दुख के सागर में गोते लगाता रहेगा। आपकी यात्रा विेवेक के  मार्ग पर अग्रसर हों, आप ध्यान को उपलब्ध हों, इसी शुभ के साथ, इस बार इतना ही।

One Response to “मन के खेल निराले मेरे भैय्या !”

  1. govind keshari

    अध्यात्म के सूत्र वाक्य आज कि युवा पीढ़ी को नहीं समझ आती क्यों कि वह आज कि भौतिक दुनिया में इतना व्यस्त है कि वह स्वयं पर ध्यान
    केंद्रित नहीं कर पाता

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