लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

Posted On by &filed under धर्म-अध्यात्म.


विजय कुमार

भारत देवी, देवताओं और अवतारों की भूमि है। यहां समय-समय पर अनेक महापुरुषों ने जन्म लेकर मानवता के कल्याण के लिए अपना जीवन अर्पण किया है। ऐसे ही एक श्रेष्ठ संत थे श्री सत्य साईं बाबा।

बाबा का जन्म 23 नवम्बर, 1926 को ग्राम पुट्टपर्थी (आंध्र प्रदेश) के एक निर्धन मजदूर पेंडवेकप्पा राजू और माता ईश्वरम्मा के घर में हुआ था। उनका बचपन का नाम सत्यनारायण राजू था। बचपन में उनकी रुचि अध्यात्म और कथा-कीर्तन में अधिक थी। कहते हैं कि 14 वर्ष की अवस्था में उन्हें एक बिच्छू ने काट लिया। इसके बाद उनके मुंह से स्वतः संस्कृत के श्लोक निकलने लगे, जबकि उन्होंने संस्कृत कभी पढ़ी भी नहीं थी। इसके कुछ समय बाद उन्होंने स्वयं को पूर्ववर्ती शिरडी वाले साईं बाबा का अवतार घोषित कर दिया और कहा कि वे भटकी हुई दुनिया को सही मार्ग दिखाने आये हैं।

शिरडी वाले साईं बाबा के बारे में कहते हैं कि उन्होंने 1918 में अपनी मृत्यु से पहले भक्तों से कहा था कि आठ साल बाद वे मद्रास क्षेत्र में फिर जन्म लेंगे। अतः लोग सत्यनारायण राजू को उनका अवतार मानने लगे। क्रमशः उनकी मान्यता बढ़ती गयी और पुट्टपर्थी एक पावन धाम बन गया। बाबा का लम्बा भगवा चोगा और बड़े-बड़े बाल उनकी पहचान बन गये। वे भक्तों को हाथ घुमाकर हवा में से ही भभूत, चेन, अंगूठी आदि निकालकर देते थे। यद्यपि इन चमत्कारों को कई लोगों ने चुनौती देकर उनकी आलोचना भी की।

बाबा ने पुट्टपर्थी में पहले एक मंदिर और फिर अपने मुख्यालय ‘प्रशांति निलयम्’ की स्थापना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने बंगलौर तथा तमिलनाडु के कोडैकनाल में भी आश्रम बनाये। बाबा भक्तों को सनातन हिन्दू धर्म पर डटे रहने का उपदेश देते थे। इससे धर्मान्तरण में सक्रिय मुल्ला-मौलवियों और ईसाई मिशनरियों के काम की गति अवरुद्ध हो गयी।

बाबा का रुझान सेवा की ओर भी था। वे शिक्षा को व्यक्ति की उन्नति का एक प्रमुख साधन मानते थे। अतः उन्होंने निःशुल्क सेवा देने वाले हजारों विद्यालय, चिकित्सा केन्द्र और दो बहुत बड़े चिकित्सालय स्थापित किये। इनमें देश-विदेश के सैकड़ों विशेषज्ञ चिकित्सक एक-दो महीने की छुट्टी लेकर निःशुल्क अपनी सेवा देते हैं। उन्होंने पुट्टपर्थी में एक स्टेडियम, विश्वविद्यालय तथा हवाई अड्डा भी बनवाया। विदेशों में भी उन्होंने सामान्य शिक्षा के साथ ही वैदिक हिन्दू संस्कार देने वाले अनेक विद्यालय स्थापित किये।

आंध्र प्रदेश में सूखे से पीड़ित अनंतपुर जिले के पानी में फ्लोराइड की अधिकता से लोग बीमार पड़ जाते थे। इससे फसल भी नष्ट हो जाती थी। बाबा ने 200 करोड़ रु0 के व्यय से वर्षा जल को संग्रहित कर पाइप लाइन द्वारा पूरे जिले में पहुंचाकर इस समस्या का स्थायी समाधान किया। इस उपलक्ष्य में डाक व तार विभाग ने एक डाक टिकट भी जारी किया।

पूरी दुनिया में बाबा के करोड़ों भक्त हैं। नेता हो या अभिनेता, खिलाड़ी हो या व्यापारी, निर्धन हो या धनवान,..सब वहां आकर सिर झुकाते थे। सैकड़ों प्राध्यापक, न्यायाधीश, उद्योगपति तथा शासन-प्रशासन के अधिकारी बाबा के आश्रम, चिकित्सालय तथा अन्य जनसेवी संस्थाओं की देखभाल करते हैं।

हिन्दू धर्म के रक्षक श्री सत्य साईं बाबा 24 अपै्रल, 2011 को दिवंगत हुए। उन्हें पुट्टपर्थी के आश्रम में ही समाधि दी गयी। उनके भक्तों को विश्वास है कि वे शीघ्र ही पुनर्जन्म लेकर फिर मानवता की सेवा में लग जाएंगे।

12 Responses to “चमत्कारी संत : सत्यसाईं बाबा”

  1. ajit bhosle

    अत्री जी आप अवश्य ही बधाई के पात्र हैं, आप को बाबा नहीं मानना मत मानो पर अच्छे काम को करने वाले को अच्छा इंसान मानो जो आप स्वीकार कर रहे हैं, वैसे भी अनर्गल प्रालाप से इन महान समाज सेवकों आदर कम होने वाला नहीं हैं.

    Reply
  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    माननीय डॉ. राजेश कपूर जी, मुझे अचरज ही हुआ, जब आपने Dr. Brian Weiss की पुस्तकों की चर्चा की। क्यों कि अभी अभी जब मैं कोयम्बतूर चिकित्सालय में गया था, तब वहां के वाचनालय में मैं ने वही पुस्तक पढी थी। इस लेखक की (१) Many Lives,Many Masters, (2)Messages from the Masters (3) Meditations for People in Crisis (4) Meditations for People in Charge (5) Meditation, (Booklet -and) CD (6) Mirrors of Time, Booklet and CD —इतने प्रकाशन हैं। मैं ने ऊपर की पहली २ पुस्तकें वहीं पढी थी। अन्य पुस्तकें उनके पास नहीं थी।अब यहां आकर सारी खरिद ली हैं। अभी पूरी पढी नहीं है।
    सारांश:आपसे पूरी सहमति प्रकट करता हूं।
    (क) यह सारा साहित्य हमारे पुनर्जन्म की पुष्टि करता है।
    (ख)हम सब बार बार उन्हीं परिवारो में जन्म लेते हैं।
    (ग) हमारा पतंजली निर्देशित “ध्यान” अथवा, सम्मोहित Regression (पूर्व ज्न्म अनुभूति) –दोनो हमारे कर्मॊ का निस्तरण कर सकते हैं।कर्मोंका विलय कर सकते हैं।
    (घ) समय (काल) -इस माया में ही अस्तित्व रखता है। इससे बाहर, मृत्यु पश्चात, अत्मा का विचरण जब होता है, वह समयातीत अवस्था में, होता है। और उसमें कर्म कर के आगे बढनेकी सुविधा नहीं है। —इत्यादि इत्यादि।
    (च) अभी मैं इन पुस्तकों को पढ रहा हूं। एक और सत्य जिस सत्य का मुझे पढने से पता चला, वह है, श्री रमण महर्षि द्वारा निर्देशित पथ।(एक गुजराती पुस्तक बचपन में घर में थी, उस समय समझ नहीं थी, कुछ अखिल जैसा तो नहीं, पर विशेष आकर्षण नहीं था।) आज मानता हूं, कि, श्री रमण तो जन्मतः ही, अवतार थे।वे, और, सत्य सांई बाबा जैसे अन्य अवतारों के कारण ही भारत, भारत है। वास्तव में भारत = भाः + रत ऐसा अर्थ भी सुना हुआ है। भाः का अर्थ होता है, प्रकाश (यह आध्यात्मिक प्रकाश है), यही भा, प्रभा, आभा, विभा में भी प्रयोजित होता है। और रत का तो अर्थ होता है मग्न, व्यस्त, डूबा हुआ इत्यादि। तो भारत का अर्थ हुआ==> ’प्रकाश में डूबा हुआ’
    भारत का ज्ञान, Dr. Weiss की पुस्तकों से भी अधिक जानकारियों से सम्पन्न है।
    पर कुछ लोगों के लिए डॉ. Weiss अधिक महत्व रखते हैं।आपकी सारी बातों से तंतो तंत सहमति जताता हूं। विषय छेडने के लिए हृदय तल से शतशः धन्यवाद और आभार।

    Reply
  3. ajit bhosle

    कपूर साहब आपकी टिप्पणियां मैं अवश्य पढता हूँ,आपकी नवीनतम टिप्पणी भी बेहद सुलझी हुई है लेकिन हमारे पूर्वजों ने कहा है की आप ज्ञान उनको दीजिये जो उसके लायक हो अन्यथा आपकी शक्ति व्यर्थ जायेगी अतः अनर्गल प्रलाप करने वालों की तरफ देखिये तक नहीं अपनी स्वच्छ टिप्पणिया केवल समझदार लोगों को ध्यान में रखते हुए देते रहे.

    Reply
  4. ajay atri

    सिख धरम को म्माने वाला कभी ऐसे बाबाओ को एक काबिल इन्सान से अधिक कुछ नहीं समझेगा.

    Reply
  5. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    प्रिय अखिल , बुरा न माना, एक शुभचिंतक के नाते सलाह है की आप जिस बात को सही मानते हो मानो, पर ऐसा कभी न सोचना की तुम्हारा सत्य अंतिम है और निश्चित रूप से तुम सही ही हो. हो सकता है कि दूसरा सही हो और तुम गलती पर हो. ये भी हो सकता है कि सत्य का एक पक्ष एक को पता है और दूसरा पक्ष दूसरे को पता है. ऐसे में परस्पर विरोधी लगने वाले दोनों ही सही हैं पर दोनों के पास अधूरा सत्य है. सत्य की चाह हो तो विरोधी के तर्क को ख़ास ध्यान से समझना होगा. शायद वह हमें सचमुच सही रास्ते पर लाने वाला सिद्ध हो. हमसे मतभेद रखने वाला हमारा शत्रु भी हो, ऐसा होना ज़रूरी नहीं. मतभेद रखने वाला हमारा उपकार कर्ता और हमें सही रास्ते पर लाने वाला सिद्ध हो सकता है. कम सब अल्पग्य हैं, सर्वग्य तो हैं नहीं. अतः हम संवाद से निरंतर सीखते हैं, सीखने की यह प्रक्रिया जिसदिन बंद हो गयी , उसी दिन हम समाप्त होना शुरू हो जाते हैं.
    – अगर बुरा न लगा हो तो प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी अन्यथा पटाक्षेप.शुभाकांक्षी.

    Reply
  6. ramnarayan suthar

    मनीषजी अपने जो भारतवर्ष शब्द प्रयोग में लिया है वो शब्द ही चमत्कारी है तो इस भारतवर्ष में तो चमत्कारों का खेल कभी समाप्त नहीं होगा अगर आप यहाँ भारतवर्ष की जगह इंडिया शब्द प्रयोग करते तो सायद आपके सपनो का इंडिया……………………….

    Reply
  7. ramnarayan suthar

    अखिलजी अपने जिस तरह के ठहाके लगाये है उससे लगता है की आप नास्तिक है या नहीं पर आस्तिक तो नहीं है मान लिया की बाबा अवतारी नहीं थे पर एक संत तो थे और मान लो की बाबा संत नहीं थे पर जनसेवक तो थे क्या आगे भी मानोगे की बाबा एक जनसेवक नहीं थे तो ऐसा मत करना क्योंकि इसके सबूत है तो एक जनसेवक के लिए इस तरह बदतमीजी से ठहाके लगाना आपको शोभा नहीं देता है

    Reply
  8. ajit bhosle

    सत्य साईं बाबा अवतार थे या नहीं थे मैं इस बहस नहीं पड़ते हुए सिर्फ इतना कहूंगा की आम इंसान की धार्मिक भावनाएं अन्य भावनाओं से प्रबल होती हैं और इसी का सहारा लेकर सत्य साईं बाबा ने एक बड़ा धार्मिक संगठन खडा कर लिया था और समाज को इसका बहुत लाभ पहुँचा, जो सामान्य समाजसेवी बनकर समाज को नहीं पहुँचाया जा सकता था, हम लोग देख ही रहे हैं सच्चे समाज सेवी अन्ना हजारे की हालत राजनीतिक दलों ने उनको बेवकूफ बनाया और उन्हें पता तक नहीं पडा, आज हालात यह हैं की अन्ना हजारे चाह कर भी कोई समाज सेवा नहीं कर सकते, जबकि सत्य साईं बाबा ने कभी भी राजनीतिग्य बनने का प्रयास नहीं किया, वे भगवान् थे या नहीं पर वे एक उच्च कोटि के समाजसेवी अवश्य थे और उनको संत भी माना जा सकता है, कोई जीवन भर एक चोंगा पहन कर ही दिखा दे, जैसा उन्होंने जीवन भर पहने रखा वे सिर्फ एकबार विदेश गए, कम से कम एक इंसान के रूप में कई खूबियाँ उनमे थी ही.

    Reply
  9. डॉ. राजेश कपूर

    dr,ajesh kapoor

    भाई विजय जी एक सुन्दर, उपयोगी लेख हेतु साधुवाद! पुनर जन्म तो हम भारतीयों की हज़ारों साल पुरानी आस्था है जिसके असंख्य प्रमाण समय समय पर मिलते रहते है. एक पुस्तक है “मैनी लाईव्ज़ मेनी मास्टर्ज़” या फिर ” मेनी मास्टर्ज़ मैनी लाईव्ज़” . अमेरिका के सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी एम्.डी. चिकित्सक ‘प्रो. ब्रियान विज’ ने यह पुस्तक लिखी है. पुस्तक के अनुसार इन चिकित्सक के पास एक रोगिणी आई जिसका इलाज कोई नहीं कर सका था.
    डा. विज को जब कोई और समाधान न मिला तो उन्हों ने इस महिला को सम्मोहित किया. विचित्र बात हुई की वह महिला अपने पिछले जन्म में चली गयी और उसने अपनी पिछले जीवन की घटनाएं इतने क्रम बध ढंग से सुनायीं की किसी प्रकार का संदेह करने की गुंजाईश नहीं थी. किन्तु डा. विस एक वैज्ञानिक हैं, उनके संस्कार इसाईयत के हैं. अतः वे इस पर न तो अविश्वकास कर सके और न पूरा विश्वास.अतः उस महिला को फिर से बुलाया. अगले दिन सम्मोहित करने पर वह अपने दूसरे जन्म में पहुँच गयी. फिर तो यह एक दैनिक क्रम बन गया. हर बार वह अपने पिछले से और पिछले जन्म में क्रमशः जाती रही. शायद वह ८४ जन्मों तक पीछे गयी. (इस पुस्तक को पढ़े-देखे ४-५ वर्ष हो गए हैं, अतः कुछ बातें पूरी तरह स्मरण नहीं)
    = डा. विज( Wiss) सारे वर्णन को एक शोधकर्ता की तरह बड़े सुनियोजित ढंग से लिखते रहे और इस पर उपरोक्त पुस्तक लिखी, रोगी और चिकितक का सारा जीवन बदल गया. पुनर्जन्म और कर्म फल के सिद्धांत में उनकी अगाध आस्था बन गयी. सारा वर्णन इतना क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित है की संदेह की कोई गुंजाईश नहीं अहती. तभी तो डा विज इतने अभिभूत और प्रभावित हुए.
    = मुझे यह पुस्तक मेजर जनरल श्री एस.के शारदा से मिली थी. एक्साईज टेक्सेशन की तत्कालीन सहायक आयुक्त श्रीमती सिंह ने इसकी ५-६ प्रतियां मुझे बनवा कर डी थीं जो मित्रों को देते-देते अब एक भी प्रति नहीं बची है. पर नेट पर इ पुस्तक की जानकारी मिलजानी चाहिए.
    = इसके इलावा भी वर्षों पहले दो पुस्तकें पुनर जन्म और मर कर जे उठे लोगों के संस्मरणों की मुझे पढ़ने को मो\इली थीं. जहांतक स्मरण है, उनके लेखक भी यूरोपीय या अमेरिकी एम्.डी चिकित्सक ही थे. एक पुस्तक थी ” लाईफ आफ्टर लाईफ” दूसरी थी ” लाईफ आफ्टर डेथ”
    + अतः पुनर्जन्म और कर्मफल सिद्धांत अति वैज्ञानिक व प्रमाणिक विषय है. जब सामान्य मनुष्य पुनर जन्म ले सकते है तो अति मानवीय शक्तियों के स्वामी सिद्ध पुरुष क्यूँ पुनः जन्म नहीं ले सकते ? अंतर केवल इतना है की हम सामान्य लोग अपने पिचले और अगले जन्मों के बारे में नहीं जा पाते जब की महँ आत्म शक्ति वाले जान लेते हैं. यह सब असंभव उन्हें लगता है जो केवल दृश्य व इन्द्रियों से ज्ञात दुनुहा को ही जान पाते है. इन विषयों जानने -समझाने के लिए सूक्षम हेतना जागृत होनी चाहिए. स्टूल बूढी इसे नहीं समझ सकते.
    + भारत ही नहीं विश्व भर में सूक्ष्म शक्तियों के चमत्कारिक प्रभाव व कार्य प्राप्य हैं. भारत तो है ही चमत्कारों का देश. जिज्ञासु बन कर ढूंढे, अनगिनत मिल जायेंगे.
    + मित्रो हमारे १०० अरब से अधिक स्नायु कोष हैं जिन में से हम ५-७% का प्रयोग करते हैं. शेष सुप्त ही पड़े रहते हैं और हम उन्हें जगाये बिना, उपयोग किये बिना मर जाते हैं. १५% कोशों के जागरण से हम आइन्स्टी, न्यूटन से भी बड़े वैज्ञानिक बन सकते हैं. ३०% के जागरण से हम अनेकों अति मानवीय शक्तियों के स्वामी बन जायेगे. मित्रो १२,१४,१६ कला सम्पूर्ण अवतारों का अर्थ है की हमारे स्नायु कोशों का जागरण उतना अधिक हुआ है. अन्तेर केवल इतना है की कुछ महान आत्माओं के स्नायुकोश पिचले जन्मों की साधना के कारण जन्मके स्क्मय से ही असामान्य होते हैं और कुछ के साधना, प्रयासों से धीरे-धीरे जागते है.
    + इस प्रका हम सब में अति मानवीय शक्तियों का स्वामी बनाने, अवतार, भगवान् होने के बेज छुपे, दबे पड़े है. कोई भी इन्हें साधना, सयम से जगा सकता है. नियम है की जितनी साधना, समर्पण उतना फल. तो फिर साईँ बाबा जैसे साधकों व महान आत्माओं की क्षमताओं पर संदेह की नासमझी क्यों ? असंख्य सिद्ध पुरुष आज भी भारत में है. ये सब भारत में ही क्यूँ जन्म लेते है, इसका उत्तर उस के पास जाने पर पूछ लेना. अभी तो इस सुअवसर का लाभ उठाने की सोचो. एक बात यह भी कह दूँ की असली नोट हैं तो नकली करंसी चलती है. इसी प्रकार असली संत, सिद्ध पुरुष हैं तभी नकली, ढोंगियों की दुकानदारी भी चलती है. अपनी विवेक बूढी से सही की पहचान अक्रें. पिचले जन्म के पुन्य और गुरु कृपा इअमें सहायक हो सकती है.
    + घमंडी, निंदक, अनास्थावान लोग साधकों के मार्ग में बाधा हैं. अपनी साधना का फल चखते जाना, अपनी शक्तियों का जागरण करते जाना, मस्त रहना यही सही रास्ता है.

    Reply
  10. Manish Pathak

    पता नहीं….चमत्कारों का खेल कब खत्म होगा? लगता है…कम से कम भारतवर्ष में तो संभव नहीं है…

    Reply
  11. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    मन भी गौतम बुद्ध जी का अवतार हूँ……..

    विस्वास करेंगे ऐसे हास्यास्पद अवतारी दावों पर

    हा हा हा हा

    Reply
  12. Vinod morya

    साईं बाबा ने कहा था सबका Malik एक है और उसने ऐसा नहीं कहा के सबका मालिक Mai हूँ
    इस लिए उस मालिक की ही पूजा करना चाहिए जिसने संसार को बनाया है जिसने हमें बनाया है जिसने हमारे रहने के लिए पृथ्वी साँस लेने के हवा खाने के लिए बहुत सी चीज बनाया है
    साईं बाबा ने ऐसा भी नही कहा की हमारे Marne के बाद हमारे शरीर की मूर्ति बनाना औया हमारी
    पूजा करना !!!! साईं बाबा संदेशक थे न की भागवान

    रही बात अवतार की न तो वेड न पुराण कही नहीं लिखा की इस सदी में किसी का अवतार होगा
    अगर आप ज्ञानी है तो बताओ सब धर्म की शिक्छा अलग अलग क्यों है सब महापुरुस की भी शिक्छा अलग क्यों है सब गुरु की शिक्छा अलग क्यों है
    पूरी लाइफ सोचो तो भी नहीं मालूम होगा
    India के सब स्टेट में एक ही कानून है क्यों उसका चलाने वाला मनमोहन Singh है Jo की इन्सान है

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *