राजनीति

पश्चिमी बंगाल: भय से भरोसे की ओर


प्रो. महेश चंद गुप्ता

पश्चिमी बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी को भारी बहुमत मिलने के साथ ही राज्य की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ आया है। पिछले पन्द्रह वर्षों से भय, असुरक्षा और राजनीतिक हिंसा के साये में जी रहे पश्चिमी बंगाल में अब भरोसे की एक नई शुरुआत दिखाई दे रही है। यह जनादेश केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं है बल्कि उस तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ जनता की स्पष्ट नाराजगी का परिणाम है, जिसने राज्य को विकास की मुख्यधारा से दूर कर दिया।
बड़ा सवाल है कि क्या बंगाल इस स्थिति में एकाएक आया? इसके जवाब में यह समझना जरूरी है कि बंगाल की यह स्थिति अचानक नहीं बनी। कभी यह प्रदेश भारत के सांस्कृतिक, बौद्धिक और औद्योगिक विकास का अग्रदूत हुआ करता था। रवींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और अरविंदो घोष जैसे महान व्यक्तित्वों की कर्मभूमि रहा बंगाल देश की आत्मा का प्रतिनिधित्व करता था लेकिन स्वतंत्रता के बाद की राजनीति ने इस गौरवशाली विरासत को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया।
पहले कांग्रेस शासन के दौरान व्यवस्था धीरे-धीरे बिखरने लगी, फिर इसके बाद जब वामपंथी सरकारें आईं तो उन्होंने मजदूर हितों के नाम पर एक ऐसी आर्थिक सोच को बढ़ावा दिया जिस कारण औद्योगिक और तकनीकी विकास ही संदिग्ध हो गया। कम्प्यूटर क्रांति का विरोध इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा। उस दौर में जब दुनिया तकनीक को अपना कर आगे बढ़ रही थी, बंगाल पीछे हटता गया। इसका दुखद परिणाम यह हुआ कि उद्योगों का भरोसा डगमगा गया और निवेश धीरे-धीरे राज्य से बाहर जाने लगा।
यह प्रवृत्ति आगे और स्पष्ट हुई जब रतन टाटा सिंगुर में अपना महत्वाकांक्षी नैनो कार प्रोजेक्ट लेकर आए। यह बंगाल के लिए एक ऐतिहासिक अवसर था जो राज्य को औद्योगिक मानचित्र पर फिर से स्थापित कर सकता था लेकिन राजनीतिक विरोध, आंदोलन और भ्रम के वातावरण ने इस परियोजना को राज्य से बाहर जाने पर मजबूर कर दिया। यह केवल एक वृहद उद्योग की भू्रण हत्या ही नहीं थी बल्कि बंगाल की साख पर लगा एक ऐसा धब्बा था जिसने देश-विदेश के निवेशकों को यह संदेश दे दिया कि यहां स्थिरता और भरोसे की कमी है। वामपंथी शासन के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई तो जनता को उम्मीद थी कि अब राज्य विकास की राह पर लौटेगा लेकिन हालात में सुधार नहीं आया बल्कि कट मनी, सिंडिकेट संस्कृति और तुष्टीकरण की राजनीति के कारण स्थितियां और बिगड़ती चली गईं। प्रशासनिक व्यवस्था कमजोर होती गई और कानून-व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई। इसका असर सीधे तौर पर राज्य की अर्थ व्यवस्था पर पड़ा। उद्योगों का पलायन तेज हुआ, निवेश घट गया और रोजगार के अवसर घटते गए। सदियों से बंगाल की आर्थिक संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला मारवाड़ी समाज भी धीरे-धीरे राज्य से बाहर जाने पर मजबूर हो गया। दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्य उनकी पसंद बनने लगे। यह इस बात का प्रमाण है कि बंगाल का कारोबारी माहौल भरोसेमंद नहीं रह गया था। आज स्थिति यह है कि बंगाल में औद्योगिक विकास दर तीन प्रतिशत से भी नीचे सिमट चुकी है जबकि एक जमाने में यह सोलह-सत्रह प्रतिशत थी। टाटा, बिड़ला जैसे नामी घरानों ने अपने उद्योग यहां से ही पूरे देश में फैलाए लेकिन धीरे-धीरे सब यहां से बाहर चले गए। राज्य का आम नागरिक कर्ज के बोझ तले दब चुका है। गांवों में किसान और मजदूर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। रोजगार के अभाव में युवाओं का दूसरे राज्यों की ओर पलायन लगातार बढ़ रहा है। यह उस राज्य के लिए गंभीर स्थिति है  जिसने कभी देश को औद्योगिक दिशा दी थी।
ममता शासन में कानून-व्यवस्था का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा है। महिलाओं की सुरक्षा निरंतर खतरे में रही है। एक महिला मुख्यमंत्री के रहते हुए भी जिस तरह महिलाओं के खिलाफ अपराधों की घटनाएं सामने आईं, उसने सरकार की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े किए। जब समाज का एक बड़ा वर्ग खुद को असुरक्षित महसूस करता है तो विकास की कोई भी योजना जमीन पर असरदार साबित नहीं हो सकती। इसी संदर्भ में पीएम नरेंद्र मोदी का कथन याद आता है। मोदी ने चुनाव अभियान के दौरान कहा था कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान स्थिति चिंता का विषय है। रोजगार की कमी के कारण युवाओं का पलायन और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भय, दोनों ही राज्य के लिए गंभीर संकेत हैं। मोदी के इन शब्दों में  पीड़ा साफ झलकती है कि जो राज्य कभी देश के औद्योगिक विकास का नेतृत्व करता था, वह आज इस स्थिति में पहुंच गया है।
पश्चिमी बंगाल के लिए यह जनादेश एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है जिसके जरिए प्रदेश अपने खोए हुए गौरव को वापस पा सकता है। भाजपा को अपने वादों को पूरा कर यह साबित करना होगा कि राज्य में हुआ बदलाव केवल नारों तक सीमित नहीं है बल्कि उसे वास्तविकता में भी बदला सकता है। राज्य में ‘भय से भरोसे’ की यात्रा नौ मई को नई सरकार के शपथ लेने के बाद शुरू होनी है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कितनी दृढ़ इच्छाशक्ति, स्पष्ट नीतियों और पारदर्शी प्रशासन के साथ आगे बढ़ती है। उसे एक ऐसे राज्य की बागडोर संभालनी है, जहां पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान प्रशासनिक ढांचा कमजोर पड़ा है और आर्थिक गतिविधियां प्राय: ठप हो गई हैं। ऐसे में भाजपा को न केवल इस बिगड़े हुए ढांचे को दुरुस्त करने के लिए ठोस और लगातार प्रयास करने होंगे बल्कि जनता से किए गए वादों पर भी खरा उतरना होगा।
अब भाजपा को स्पष्ट और मजबूत जनादेश मिलना एक नई शुरुआत का प्रतीक है लेकिन इस जीत के साथ जिम्मेदारियों का बोझ भी कम नहीं है। भाजपा को विरासत में एक बीमारू राज्य मिला है। उसे एक ऐसे राज्य की बागडोर संभालनी है जहां आर्थिक ढांचा कमजोर हो चुका है, और आम जन का विश्वास डगमगा चुका है। आम जन का भरोसा बहाल करना, नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।      
प्रदेश के लोग लंबे समय से विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे हैं। बेरोजगारी, कमजोर कानून व्यवस्था, आर्थिक ठहराव और पलायन जैसे मुद्दे आम जन जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। इन समस्याओं का समाधान करना नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। साथ ही, विकास का एक स्पष्ट और टिकाऊ मार्ग तैयार करना भी उतना ही आवश्यक होगा ताकि जिस पर चलकर राज्य फिर से प्रगति की राह पर मजबूती से लौट सके। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद नरेंद्र मोदी ने राज्य में भाजपा की ऐतिहासिक जीत को एक नए दौर की शुरुआत बताते हुए कहा है कि बंगाल का ‘उज्ज्वल भविष्य’ अब शुरू हो चुका है और राज्य को खुशहाल व विकसित बनाया जाएगा। मोदी की घोषणा यह केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं है बल्कि एक ऐसा लक्ष्य है जिसकी प्राप्ति के लिए ठोस नीतियों और प्रभावी क्रियान्वयन की दरकार होगी। आम जनता की भाजपा सरकार से अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह समाज के सभी वर्गों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करे। नई सरकार को राज्य की दयनीय स्थिति को सुधारने के लिए उद्योगों को बढ़ावा देना, निवेश आकर्षित करना और रोजगार के नए अवसर पैदा करना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल ही होगा। खास तौर पर, युवाओं के पलायन को रोकना और महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना ऐसे मुद्दे हैं जिन पर तत्काल और प्रभावी कार्रवाई जरूरी होगी। बंगाल का यह ऐतिहासिक जनादेश भाजपा के लिए एक ‘नया सवेरा’ माना जा रहा है  लेकिन यह सवेरा केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। यह पश्चिम बंगाल की आम जनता के लिए भी एक नई शुरुआत का संकेत है। एक ऐसी शुरुआत, जिसमें उम्मीदें हैं, अपेक्षाएं हैं और एक बेहतर भविष्य की आकांक्षा है। देखना यह होगा कि भाजपा की सरकार इन उम्मीदों और अपेक्षाओं पर कितना खरा उतर कर दिखाएगी? ( युवराज फीचर्स )   


प्रो. महेश चंद गुप्ता