राजनीति

मोदी, मंदिर और मुसलमान

बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के दिन ब दिन बढ़ते कद से राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं… 2014 के लोकसभा चुनाव के बारे में कांग्रेस मे अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हों…लेकिन बीजेपी ने साफ कर दिया है कि वो मोदी के नेतृत्व में ही दिल्ली की सत्ता हासिल करने का सपना देखेगी… मोदी के महिमामंडन में बीजेपी काडर ने काफी जल्दबाजी दिखाई…हालांकि पार्टी के रणनीतिकारों की मानें तो देश में मौजूदा दौर में जिस तरह का निराशा का माहौल बना है…उसका फायदा चुनाव मे उठाने के लिए मोदी के प्रमोशन का यह बिल्कुल सही वक्त है… लेकिन आडवाणी की अड़ंगेबाजी के बीच उन्हें आरएसएस की सख्त हिदायत से साफ है कि पार्टी आज भी नागपुर स्थित संघ के दफ्तर के आदेशों पर ही संचालित हो रही है…

modi and muslimलिहाजा मोदी के लिए दिल्ली का सफर जितना चुनौतीभरा होने वाला है…उतना की कंफ्यूजन पार्टी को भी होने वाला है… हिंदुत्व की बात करने वाली पार्टी 2014 के चुनाव मे एक बार फिर राम के नाम पर वैतरणी पार करना चाहती है… इसके लिए बीजेपी ने अपने सहयोगी संगठनों वीएचपी के जरिए उत्तर प्रदेश में चौरासी कोस परिक्रमा और अन्य रैलियों की शुरुआत कर दी है… मोदी के लेफ्टिनेंट अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाकर बीजेपी ने पहले ही यह संकेत दे दिया था… देश की सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटें भी इसी राज्य में हैं…ऐसे में राम मंदिर के मुद्दे पर पार्टी यूपी में 1999 वाली कहानी दोहरा पाती है…तो मोदी के दिल्ली की गद्दी पर विराजने का रास्ता आसान हो जाएगा…

हालांकि सांप्रदायिक छवि और गुजरात दंगो के दाग साथ लेकर चलने वाले मोदी के लिए चुनावी गणित सबसे बड़ी चिंता का कारण बना हुआ है… अधिकतर क्षेत्रीय पार्टियां सांप्रदायिकता के नाम पर मोदी का साथ देने से कतराएंगी…. यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश में मुस्लिम वोटरों की अच्छी खासी तादात है… इन राज्यों में करीब 203 सीटें हैं जिन पर अच्छा प्रदर्शन किए बिना दिल्ली दूर ही नजर आएगी… मुस्लिम बहुल होने के कारण इन सीटों पर मोदी को रणनीति बदलनी होगी…उन्हें सांप्रदायिकता और कट्टर हिंदुत्व का चोला उतारकर उदारवाद की तरफ कदम बढ़ना होगा… यहां तक कि कभी कट्टर हिंदुत्व की दुहाई देने वाले वाजपेई और आडवाणी ने भी समय के फेर को समझा और सबको साथ लेकर चलने की रणनीति बनाई…मोदी भी राजनीतिक फायदा लेने के लिए अटल-आडवाणी का राह चल सकते हैं

वैसे गहराई से देखा जाए मुसलमानों के लिए मोदी इतने अछूत भी नहीं होने चाहिए… मोदी पर कभी न धुलने वाले गुजरात दंगों के दाग भले ही लगे हों…लेकिन अब तक अदालत में उनके खिलाफ कोई बात साबित नहीं हुई है…दूसरी बात कि गुजरात में 2002 के बाद से कोई दंगा नहीं हुआ…जिससे उनकी प्रशासनिक क्कुशलता झलकती है…और सबसे बड़ी बात ये है कि मोदी के गुजरात में मुसलमानों की स्थिति देश के कई बड़े राज्यों में सबसे अच्छी है… 2006 में तैयार की गई सच्चर कमेटी की रिपोर्टों के मुताबिक गुजरात के ग्रामीण इलाकों में मुसलमानों की औसत प्रति व्यक्ति आय 668 रुपए जबकि हिंदुओं की प्रतिव्यक्ति आय 644 रुपए है…जबकि देश के अन्य हिस्सों में मुस्लिमों का प्रतिव्यक्ति आय 553 रुपए है… शहरी क्षेत्रों में भी गुजरात के मुसलमानों की प्रतिव्यक्ति आय 875 रुपए है जबकि देश के अन्य हिस्सों में केवल 804 रुपए है…यही नहीं गुजरात में मुस्लिम इलाकों में 97.7 फीसदी लोगों तक पीने के पानी की सुविधा है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़ा 93.1 फीसदी है… साक्षतरता में भी गुजरात के मुसलमान आगे हैं…यहां मुस्लिम साक्षरता73.5 फीसदी है…जबकि राष्ट्रीय औसत 64.8 फीसदी है…मोदी सरकार ने तटीय इलाकों में मुस्लिमों के विकास के लिए 11 हजार करोड़ खर्च किए…जाहिर सी बात है कि मोदी के गुजरात में मुसलमानों की स्थिति यूपी और अन्य राज्यों के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर है… आंकड़ों पर गौर करें तो 2012 के चुनाव में भी करीब 30 फीसदी मुसलमानों में मोदी के पक्ष में मतदान किया था…जबकि मोदी ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था…

बावजूद इसके मोदी को मुसलमानों के धुर विरोधी के तौर पर पेश किया जाता है… हालांकि मोदी को भी खुद ये उम्मीद नहीं होगी कि उन्हें अल्पसंख्यक समुदाय का ज्यादा वोट मिलेगा…गोयाकि अगर मोदी उग्र हिंदुत्व की बजाए गुजरात के सामूहिक विकास के मॉडल को आगे रखकर चुनाव लड़ें…और सभी वर्गों मे पैंठ बढ़ाने की कोशिश करें तो 7 आरसीआर पहुंचने का गणित आसान हो सकता है…इसमें भी कोई शक नहीं कि कांग्रेस, एसपी और अन्य क्षेत्रीय पार्टियों से बार बार धोखा खा चुके अल्पसंख्यक समुदाय का बड़ा तबका मोदी का साथ दे दे… बहरहाल इसके लिए 2014 का इंतजार करना होगा कि मोदी किस रणनीति के तहत कठिन रास्तों को पार करते हैं

 

पंकज कुमार नैथानी