लेखक परिचय

देवेन्द्र कुमार

देवेन्द्र कुमार

स्वतंत्र पत्रकार

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adwaniदेवेन्द्र कुमार

 

कभी भाजपा की ओर से लौह पुरुष के रुप में प्रचारित किये जाते रहे लालकृष्ण आडवाणी अपने ही दल में इस कदर दरकिनार किये जाएगें, इसकी कल्पना आज से एक दशक पूर्व शायद ही किसी ने की होगी। यह वह दौर था, जब रामजन्म भूमि और बाबरी विवाद अपने चरम पर था । पुरे देश में घृणा – नफरत और साम्प्रदायिक उन्माद की लहर दौड़ रही थी । अशोक सिंधल, विनय कटिआर ,नरेन्द्र मोदी ,उमा भारती ,साधवी ऋतंभरा की एक पू इसके अगुआ थें लालकृष्ण आडवाणी । तब भाजपार्इ इनकी तुलना सरदार पटेल से करना पंसद करते थे।

और यह सच भी है कि दो सांसदों वाली भाजपा का दिल्ली तक का सफर आडवाणी की रथ यात्रा पर सवार होकर ही की गर्इ। रथयात्रा के प्रति तमाम विवादों और असहमतियों के बाबजूद यह तो स्वीकार किया ही जाना चाहिए कि तब आडवाणी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी। पर जिस साम्प्रदायिक उन्माद और नफरत की राजनीति से आडवाणी खुद अपना और भाजपा का विस्तार कर रहे थें , वह गठबंधन की राजनीति में काम नहीं आर्इ । और प्रधानमंत्री का सेहरा रथयात्रा और साम्प्रदायिक राजनीति से एक लम्बी रणनीति के तहत दूरी बना कर रखने वाले वाजपेयी के खाते चली गर्इ । आडवाणी को नम्बर दो की कुर्सी यानि गृहमंत्री बनना ही स्वीकार करना पड़ा । और उपप्रघानमंत्री जैसे प्रतिकात्मक पद के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ा। मान -मनौवल का एक दौर चला । अंतह पार्टी संगठन का दबाब एवं आडवाणी की लोकप्रियता का चरमोत्कर्ष के कारण बुझे मन से वाजपेयी को अपनी अनिच्छा के बाबजूद इसे स्वीकार करना पड़ा । वाजपेयी की कोशिश तो किसी भी समानान्तर सत्ता की उपसिथति पर विराम लगाने की ही थी । जबकी उपप्रधानमंत्री का पद कोर्इं संवैधानिक पद तो है नहीं ।

वाजपेयी द्वारा संध परिवार के प्रति गाहे – बेगाहे अपनी प्रतिबद्धता दिखलाते रहने के बावजूद भी यह कहा जा सकता है कि वे अपनी छवि के प्रति बेहद सचेत रहें। धार्मिक – साम्प्रदायिक कêता से अपनी दूरी बनाये रखा । संध परिवार को सार्वजनिक रुप से दिशा – निर्देष देने की सिथति में आने नहीं दिया। यही कारण है कि जब अयोघ्या में कारसेवकों की भीड़ लगी थी , साम्प्रदायिक उन्माद चरम पर था तब अयोघ्या से अपनी दूरी के सवाल पर वाजपेयी ने कहा था कि रामभक्त वहां हैं , जबकि देशभक्त यहां हैं। यह महज चुटकिला व्यान नहीं था ,जिसके लिए वे जाने जाते हैं, वरन अपनी छवि के प्रति वाजपेयी की सर्तकता थी। और यही सिथति ही बाद के दिनों में आडवाणी को खलनी शुरू हो गर्इ । पर तब तक आडवाणी अपनी साम्प्रदायिक छवि में बंध चुके थें ।

और इधर ही बड़े यत्न से लौहपुरुष की गढ़ी गर्इ आडवाणी की तस्वीर गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री की कुर्सी मिलने के साथ ही, एक -एक कर दरकती चली गर्इ । छवि तो बनार्इ गर्इ सरदार पटेल की पर भारतीय असिमता का प्रतीक संसद पर आंतकी हमला आडवाणी के गृह मंत्री रहते हुआ, कांधार तक आंतकियों को ससम्मान तक भारतीय हवार्इ जहाज से आडवाणी के गृहमंत्री रहते ही पहुंचाया गया, कारगिल की लड़ार्इ भले ही हमारे बहादूर जाबाजों ने जीत ली हो पर यह कैसी सरदारी- सतर्कता थी कि पाकिस्तानी हमलावर हमारी सरहदों में धुसपैठ कर गया ,तम्बु तान दिया ,बंकरों का जाल बिछा दिया और हमारे लौहपुरुष गृहमंत्री को महिनों तक इसकी भनक नहीं लगी । और तो और कारगिल युद्ध का अन्त भी हमें पाकिस्तानी हमलावरों को सेफ पैकेज के देने के साथ करना पड़ा । क्या कथित लौह पुरुष कभी यह बताने की कृपा करेगें कि उनका तरीका वास्तव में सरदार पटेल के समान ही था । क्या सरदार पटेल यह लड़ार्इ अपनी ही भूमि में ही लड़तें , क्या युद्ध का बेहतर तरीका दुश्मन को उसके ही सरहद में जाकर रौंदना नहीं है । सरदार पटेल ने तो यही किया था ।

इधर वाजपेयी की अस्वस्थ्ता बढ़ने के साथ ही आडवाणी को यह विश्वास हो गया कि बगैर अपने साम्प्रदायिक अतित से मुकित पाये सर्वग्राही व्यक्तित्व पाना मुश्किल है और बगैर इसके वाजपेयी का विकल्प बनना नामूमकिन । और इसी कोशिश में आडवाणी ने मोहम्मद अली जिन्ना के मजार पर जाकर पाकिस्तानी संसद में मोहम्मद अली जिन्ना के दिये गए एक व्यान की आड़ में जिन्ना को धर्मनिरपेक्षता का चैमिपयन घोषित कर दिया । और यहीं से शुरू होती है कथित लौहपुरुष के वानप्रस्थ यात्रा की शुरूआत । पाकिस्तान से लौटतें ही आडवाणी को विपक्ष के नेता पद की हैसियत गंवानी पड़ी । संध का कोपभाजन बनना पड़ा। और संध में तब से ही शुरू हो गर्इ थी आडवाणी के विकल्प की खोज । आडवाणी ने गंठबधन के इस दौर में अपने चेहरे को वाजपेयी सदृष्य उदार बनाने की उत्कंठा पाल ली और इधर संध ने कट्टरवादी हिन्दुत्व का दूसरा दमकता – चमकता चेहरा आडवाणी के ही परम शिष्य मोदी में ही खोज निकाला ।

फिर आडवाणी और मोदी में समानताओं की कमी नहीं है । जिस राम जन्मभूमि बाबरी विवाद में हजारों की बली चढ़ गर्इ ,संैकडों का सुहाग उजड़ गया ,हजारों बच्चे अनाथ हो गए , सैकडों कारसेवकों की जान चली गर्इ । अपनी रथयात्रा के लिए आडवाणी ने कभी दुख प्रकट नहीं किया ठीक उसी तरह गुजरात दंगों के लिए मोदी के मन में कोर्इ पीड़ा नहीं हैं । और जब जलते गुजरात में वाजपेयी ने मोदी को राजधर्म का उपदेश दिया था। तब मोदी के सबसे बड़ा पैरोकार आज वानप्रस्थ जीवन जीने को अभिषप्त होते आडवाणी ही थें । अब यह जुदा बात है कि क्या वाकर्इ मोदी की पहुंच प्रधानमंत्री की कुर्सी तक होगी ही । संभव है कि आडवाणी के समान ही मोदी के लिए भी किसी वाजपेयी की खोज कर ली गर्इ हो और चुनाव के बाद गठबंधन की मजबुरियों के नाम पर सत्ता उसे सौंप दी जाए । क्योंकि संध की नजर में लोकप्रियता ही प्रधानमंत्री पद का पैमाना नहीं है और यदि एैसा होता तो रामरथ यात्रा के सारथी आडवाणी प्रधानमंत्री बन गए होतें । और तब वाजपेयी को वानप्रस्थ होना पड़ता । संध के छाये पले -बढे़ आडवाणी संध की सामाजिक नीतियों को समझने में ही गचचा खा गए । वह भूल गए कि संध परिवार चर्तुर्वर्णिय व्यवस्था का पैरोकार है। मनु स्मृति उसका संविधान है। और चतर्ुवर्णिय व्यवस्था किसी वैश्य या शूद्र को राज – काज संभालने की र्इजाजत नहीं देती । संभव है कि कल जो आडवाणी के साथ हुआ वही भविष्य में मोदी के साथ दुहराया जा सकता है । फिर गठबंघन की दुहार्इ दी जा सकती है । सवाल इसे ठीक करने का है । इसलिए यदि आडवाणी अपने वानप्रस्थ को स्थगित कर मोदी को ही मजबूत करने में अपनी उर्जा लगाते तब संध परिवार के सामने संकट पैदा हो जाता । उसकी परेशान बढ़ जाती । और तब मोदी को दरकिनार इतना आसान नहीं होता । पर आडवाणी मोदी विरोध में काफी आगे निकल चुके हैं। अब यह संभव नहीं है ,राजनीतिक वनवास ही उनकी नियति है और वानप्रस्थ एक सच्चार्इ

2 Responses to “वानप्रस्थ की ओर बढ़ते कदम”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    अगर मैं कहूं कि लेखक ने विवाक विवेचन द्वारा संघऔर बीजेपी को आइना दिखाने का प्रयत्न किया ,तो लोग कुछ भी कह सकते हैं,पर सत्य यही है कि संघ की विचार धारा मूल रूप से मनु स्मृति से निर्देशित होती है,. पर इस बार सचमुच संघ की अग्नि परीक्षा तब होगी ,जब बीजेपी को करीब करीब या पूर्ण बहुमत मिल जाये, जिसकी उम्मीद बहुत कम है. ऐसे इस अंश को छोड़ भी दिया जाये तो लेखक ने तत्कालीन राजनैतिक विश्लेषण के साथ अडवाणी जी पर जो टिपण्णी की है,उसमे कोई अतिश्योक्ति नहीं है.

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  2. Bipin Kishore Sinha

    लेख में कोई गहराई नहीं है। बड़ी सतही विवेचना है। लेखक को पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए।

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