राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का विकल्प…. 

अनिल अनूप 
भाजपा सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी के ही सहारे है, बेशक वह करोड़ों के काडर की पार्टी है। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता के बूते 2019 का चुनाव जीतने का ही दावा नहीं किया गया है, बल्कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का दावा है कि भाजपा को आने वाले 50 साल तक कोई सत्ता से हटा नहीं सकता। यह अहंकार भी मोदीजनित ही है। भाजपा की उम्मीद इतनी पुख्ता है कि 2022 के संकल्प तय कर लिए गए हैं। जो ‘विजन 2022’ का प्रस्ताव पारित किया गया है, वह भी प्रधानमंत्री मोदी की ही कल्पना है। उप्र और गुजरात में चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री ने भाजपा मुख्यालय में संबोधित करते हुए 2022 के ‘न्यू इंडिया’ और उसके संकल्प की बात कही थी। अब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में राजनीतिक प्रस्ताव पारित करने के जरिए संकल्प लिए गए हैं कि 2022 तक देश गरीबी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद और जातिवाद, संप्रदायवाद आदि से मुक्त होगा। यह भारत के संदर्भ में कभी भी संभव नहीं है, क्योंकि जात-पात हमारी असलियत है, सोच है। उसे खंडित करना असंभव-सा है। ‘गरीबी हटाओ’ का नारा 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी दिया था। उसके सहारे दो-तिहाई बहुमत का जनादेश तो मिल गया, लेकिन गरीबी का कंटीला यथार्थ 2018 तक भी मौजूद है। अब प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा पर भी भरोसा करके देख लेते हैं। बहरहाल दुनिया में भारत की अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से बढ़ रही है और आज विश्व में छठे स्थान पर है। इसका श्रेय भी प्रधानमंत्री मोदी की सोच और उनकी नीतियों को दिया गया है। विश्व में प्रधानमंत्री मोदी ने ही भारत की साख बढ़ाई है, यह भी प्रचारित किया जा रहा है। विपक्ष का कथित महागठबंधन ढकोसला, भ्रांति, झूठ पर आधारित है। न तो नेता का कोई ठिकाना है, न नीति स्पष्ट है और नीयत भ्रष्ट है। विपक्ष के पास रणनीति तो है ही नहीं, लिहाजा प्रधानमंत्री मोदी ने भी दावा ठोंका है कि 2019 में कोई चुनौती नहीं है। विपक्ष का एकमात्र नकारात्मक एजेंडा है-मोदी हटाओ। पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को लक्ष्य दिए गए हैं कि वे उन 30 करोड़ लाभार्थियों तक पहुंचें, जिन्हें मोदी सरकार की योजनाओं का लाभ मिला है। मोदी सरकार की आंतरिक सुरक्षा नीति और रणनीति के कारण ही देश लगभग ‘आतंकवाद मुक्त’ हो चुका है। आज देश के बड़े हिस्सों में निरंतर बम विस्फोट नहीं होते। नक्सलवाद का विस्तार भी एक-तिहाई रह गया है। कश्मीर में भी आतंकवाद बेहद सीमित है और अपने आखिरी दौर में है। यूपीए सरकार में उत्तर से दक्षिण तक लगातार बम विस्फोटों की गूंज सुनाई पड़ती थी। लब्बोलुआब यह है कि यदि 2019 में 2014 की तुलना में बड़े जनादेश के साथ जीतना है, तो भाजपा में एक ही मंत्र है-मोदी नाम केवलम्। यह गलत भी नहीं है, लेकिन लोकतंत्र सवालिया हो जाता है। यह भी गलत नहीं है कि एक राजनीतिक दल एक शीर्ष नेता के नेतृत्व के बूते ही चुनाव जीतने का सपना देखे, लेकिन भाजपा में व्यक्तिवाद की राजनीति नगण्य रही है। यदि अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के दौर में भी चुनाव लड़े और जीते गए हैं, तो वे हिंदूवाद, राष्ट्रवाद, राम मंदिर, समान नागरिक संहिता और राष्ट्रीय सुरक्षा सरीखे संवेदनशील मुद्दों के आधार पर ही संभव होते रहे हैं। नरेंद्र मोदी की राजनीति अपने दौर के हिसाब से अलग रही है। उन्होंने ‘अच्छे दिनों’ के सपने दिखाए थे। कुछ हद तक कुछ समुदायों के लिए ऐसे दिन आए भी होंगे, लेकिन अब 2019 के चुनाव के मद्देनजर भी भाजपा एक बार फिर सपने दिखा रही है। प्रधानमंत्री मोदी के एकमात्र नेतृत्व वाली भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने सार्वजनिक तौर पर रोजगार, एससी / एसटी कानून और सवर्णों के गुस्से, आक्रोश से उपजी स्थितियों पर कोई टिप्पणी नहीं की है। सवर्ण निराश होकर यह तक कह रहा है-‘सवर्ण जहां भी दिखाई दे, वहीं उसे गोली मार दो।’ यदि मोदी सरकार यानी एक हिंदू हृदय-सम्राट की सरकार के बावजूद औसत सवर्ण की यह टिप्पणी है, तो माहौल एकदम ‘भाजपामय’ नहीं माना जा सकता। प्रधानमंत्री मोदी ने एक और नया नारा दिया है-‘अजेय भारत, अटल भाजपा।’ दरअसल अजेय तो भारत सदैव ही रहा है। मुगल, हूण, यमन से लेकर अंग्रेजों तक कोई भी उसे पराजित नहीं कर सका। भारत आज भी ‘अजेय’ है। मोदी और भाजपा उसे कौन-सा ‘अजेय’ प्रदान करेंगे, यह स्पष्ट नहीं है। ‘अटल’ के जरिए यदि दिवंगत प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की बात की गई है, तो तय है कि पार्टी आने वाले चुनावों तक उनका नाम और काम प्रासंगिक बनाए रखेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने अटलजी की तुलना ‘सूर्य’ से कर भावुक श्रद्धांजलि दी है, लेकिन ‘अटल’ के मायने दूसरे हैं, तो ‘अटल’ त्रिलोक विजेता रावण भी नहीं रहा। इससे पहले पार्टी ने एक और नारा दिया था। नारों के खेल से जनादेश कितना प्रभावित होता है, यह 2019 में स्पष्ट हो जाएगा।

इसे विडंबना कहें या अवसरवादिता कहें, लेकिन भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भगवान राम के मंदिर पर कोई चर्चा नहीं की गई, जिसके सहारे भाजपा यहां तक पहुंची है। निष्कर्ष यही है कि भाजपा प्रधानमंत्री मोदी के ही इर्द-गिर्द घूमती है, नेतृत्व की अगली पीढ़ी नदारद है, बेशक राज्यों में मुख्यमंत्री हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का विकल्प फिलहाल गायब है।

1 thought on “राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का विकल्प…. 

  1. लेखक श्री,
    (क) राज नीति का प्रवाह, सहसा सीधी रेखा में नहीं बहता. उसे अनेक अवरोधों को पार करना होता है.
    (ख) अब अवरोधों की दिशा भी बदलती रहती है, इस लिए ==> जैसे आप भीड में आगे बढने के लिए कभी बाँए, कभी दाँएँ कभी आगे और कभी पीछे भी हट जाते हैं.उसी प्रकार मोदी भी दिशा बदलेंगे.

    (ग) पर (१) मोदी स्वार्थ से ऊपर (२) प्रायः सन्यासी (३) पारदर्शी चरित्र इत्यादि गुणों से युक्त प्रतीत हो रहा है.
    ==>(घ) *मोदी और शाह* दोनो चाणक्य भी हैं. जो आवश्यक है.
    ***==>”धर्म संस्थापनार्थाय” ==>”॥ शठं प्रति शाठ्यं ॥” भी चाहिए.
    ==प्रोफ़ेसर मधुसूदन

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