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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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–      डॉ. सुभाष सिंह

यह सर्वविदित है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिमी एशिया (जॉर्डन, फिलिस्‍तीन, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान) की यात्रा पर गए थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सबसे पहले शुक्रवार को जार्डन के शाह अब्दुल्ला द्वितीय से मुलाकात की। भारत की विदेश नीति में खाड़ी क्षेत्र और पश्चिम एशिया क्षेत्र को महत्वपूर्ण प्राथमिकता प्रदान करते हुए  प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी यात्रा से पहले कहा था कि-उनकी यात्रा का लक्ष्य इस क्षेत्र में संबंधों को मजबूत करना एवं  शांति स्थापित करने के लिए सार्थक प्रयास करना है। प्रधानमंत्री मोदी अपनी ऐतिहासिक फिलिस्‍तीनी यात्रा पर शनिवार  10 फरवरी 2018 को रामल्ला पहुंचे। फिलिस्तीनी राष्ट्रपति और फतह पार्टी के प्रमुख नेता महमूद अब्बास ने प्रधानमंत्री का गर्मजोशी के साथ फिलिस्तीनी क्षेत्र रामल्ला में स्वागत किया और मोदी को स्वर्ण लोकेट भेंट करते हुए फिलिस्तीन के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन’ से सम्मानित किया जोकि भारत के लिए बड़े ही गौरव की बात है। साथ ही भारत के प्रधानमंत्री को एक प्रशस्तिपत्र भी प्रदान किया गया, जिस पर लिखा था कि-“यह उनके कुशल नेतृत्व एवं उनके उत्कृष्ट राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय कद को देखते हुए एवं फिलिस्‍तीन राष्ट्र तथा भारतीय गणतंत्र के बीच ऐतिहासिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए उनके प्रयासों की सराहना तथा क्षेत्र में शांति बनाये रखने के लिए आजादी और हमारे लोगों की आजादी के हक को उनका समर्थन देने का सम्मान करते हैं।” ‘ग्रैंड कॉलर’ विदेशी गणमान्यों-शाह, राष्ट्राध्यक्षों/शासनाध्यक्षों एवं समान पद के व्यक्तियों को दिया जाने वाला फिलिस्‍तीन का सर्वोच्च सम्मान है। इससे पहले यह सम्मान सऊदी अरब के शाह सलमान, बहरीन के शाह हमाद, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग आदि को दिया जा चुका है। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत को बहुत ही  सम्मानित देश बताते हुए राष्ट्रपति अब्बास ने कहा था कि-“हम हाल में हुई चीजों पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ चर्चा करेंगे, हम शांति प्रक्रिया, द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय स्थिति के संबंध में बात करेंगे। क्षेत्र में शांति को बढ़ावा देने के लिए भारत क्या संभावित भूमिका निभा सकता है, इस पर भी चर्चा होगी। इसके अलावा दोनों देशों के मौजूदा संबंधों से इतर विभिन्न आर्थिक पहलुओं पर भी चर्चा होगी।”

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने भी गाजापट्टी की यात्रा की थी लेकिन उस समय यह मिस्र के नियंत्रण  में था। इसलिए यदि यह कहा जाये कि मोदी ही प्रथम भारतीय प्रधानमंत्री है, जिन्होंने फिलिस्तीन की अधिकारिक यात्रा की है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगा। अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने खुलकर स्वतंत्र संप्रभु फिलिस्तीनी राज्य का पुरजोर समर्थन किया। ये अरबों के लिए एक रणनीतिक विजय का अवसर था| जब भारत जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के प्रधानमंत्री मोदी ने फिलिस्तीनी  राष्ट्र एवं उसके नागरिकों के अधिकारों का खुलकर समर्थन किया। जब समकालीन विश्व के अधिकांश देश यहूदी राष्ट्र इस्रायल और अमरीकी गठबंधन की चाकरी में लगे हुए हैं। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के  नेताओं ने शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, तकनीकी आदि महत्वपूर्ण मुद्दों पर द्विपक्षीय हस्ताक्षर किये जोकि एक सराहनीय कदम था। फिलिस्तीन यात्रा के पश्चात् प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वैश्विक नेता के रूप में उभरकर सामने आए हैं| जैसा कि फिलिस्तीनी प्रधानमंत्री ने अपने स्वागत भाषण में स्वीकार किया। इस यात्रा के माध्यम से मोदी ने वैश्विक स्तर पर उठ रही अटकलों  को करार जबाब दिया जिन का मत था कि मोदी सिर्फ इस्रायल के साथ संबंध बनाना चाहते हैं और फिलिस्तीनी प्रश्न की अनदेखी कर रहे हैं, लेकिन यह सत्य नहीं है। मोदी एक दूरदर्शी  राजनीतिज्ञ हैं, जोकि प्रत्येक बिंदु पर बहुत सोच-समझकर निर्णय लेते हैं| जिसका उदाहरण फिलिस्तीन-इस्रायल  के संबंध में देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी का मत है कि यदि विश्व में शांति को बनाये रखना है, तो उन सभी मुद्दों को आपसी बातचीत के माध्यम से सुलझाने के लिए प्रयास करना चाहिए जोकि विश्वशांति के मार्ग में बाधा उत्पन्न्त करते हैं।  प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में स्पष्ट कहा है कि-भारत फिलिस्तीनी नागरिकों के अधिकारों की वकालत ही नहीं करता बल्कि एक संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र का  पुरजोर समर्थन करता है, जोकि भारत की परंपरागत नीति का परिणाम  है।

भारतीय प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत सिर्फ न्याय की अवधारणा में विश्वास करता है  और साथ-ही-साथ अन्याय का भी विरोध करता है। भारत भूमि तथागत गौतम बुद्ध, संत कबीर, स्वामी विवेकानंद, डॉ. अम्बेडकर और महात्मा गाँधी जैसे महापुरुषों की जननी रही है, जिन्होंने सम्पूर्ण दुनिया को भारत के ज्ञान और तर्क का लोहा मनवाया और विश्व शांति को बढ़ावा दिया। प्रधानमंत्री भी उसी विचारधारा के सन्देशवाहक बनाकर फिलिस्तीन पहुंचे। कुछ आलोचकों का मानना है कि मोदी सिर्फ मुस्लिम जनता के दबाव में फिलिस्तीन की यात्रा पर गए जोकि पूर्णत गलत है। भारत के लाखों मुस्लिम नागरिक जोकि खाड़ी के देशों में नौकरी करते हैं जिनके हित अरब देशों की इच्छा पर निर्भर हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने ओमान की राजधानी मस्कट में भारतीयों को संबोधित करते हुए उन्हें ‘राष्ट्रदूत’ कहा, जिन्होंने ओमान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत को उन पर गर्व है। वही दूसरी ओर पिछले वर्ष जब प्रधानमंत्री मोदी इस्रायल की यात्रा पर जा रहे थे ठीक उसी समय फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास भारत की यात्रा पर आए थे और उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री को फिलिस्तीन की यात्रा लिए आमंत्रित किया था।

जैसा कि भारत ने जेरूसलम के मुद्दे पर इस्रायल और अमेरिका का विरोध करके अपनी भूमिका को स्पष्ट कर दिया था कि वे किसी भी कीमत पर अपने वादे से नहीं फिरेगा जोकि उसने फिलिस्तीनी नागरिकों से किया था। मोदी की फिलिस्तीनी यात्रा से कई बाते स्पष्ट हो जाती हैं। प्रथम भारत अपनी विदेश नीति में व्यापक परिवर्तन करके सिर्फ यथार्थवादी नीति का अनुसरण करेगा जोकि विश्व शांति को मजबूत करेगी। वही दूसरी ओर भारत यह भी महसूस करता हैं कि दीर्घकाल से चले आ रहे फिलिस्तीनी-इस्रायल संघर्ष का अब समापन होना चाहिए जोकि लाखों निर्दोष नागरिकों की हत्या का जिम्मेदार है। इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलिस्तीन और यहूदी राष्ट्र इस्रायल दोनों ही भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं न ही कोई ज्यादा और न ही कोई कम। दोनों देशों की भलाई इसी में है कि दोनों आपसी संघर्ष को त्यागकर शांति के मार्ग का अनुशरण करे जिसमें भारत एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस यात्रा से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि भारत शीघ्र ही दोनों राष्ट्रों को शांति के लिए दिल्ली में आमंत्रित करेगा। भारत एक ईमानदार मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए इस विवाद का शांतिपूर्ण तरीके से हल निकालने के लिए उचित प्रयास करेगा जोकि एक एतिहासिक कदम होगा। इस यात्रा से सबक लेते हुए  इस्लामिक संगठन हमास और उग्र यहूदी संगठनों को भी हिंसा का मार्ग छोड़कर शांति प्रक्रिया में भाग लेकर विवाद के  समाधान के लिए प्रयास करना चाहिए। यदि हमास और यहूदी संगठन अंतर्राष्ट्रीय मांगों को दरकिनार करेंगे तो भारत दोनों को अपना समर्थन बंद कर देगा जिससे शांति प्रक्रिया बाधित हो जाएगी जोकि दोनों राष्ट्रों के हित में नहीं होगा। वही दूसरी ओर भारत को यहूदी देश को समझाना चाहिए कि वह संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव 242 को स्वीकार करते हुए फिलिस्तीनी क्षेत्र को मुक्त कर दे और फिल्सितीन को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता प्रदान करे। इस पहल से इस्रायल को भी रणनीतिक लाभ होगा क्योंकि उसकी सुरक्षा पर खर्च हो रहे लाखों डालर का अतिरिक्त भार कम होगा और यह पैसा वह अपने नागरिकों के विकास में लगा सकता है क्योंकि शांति का मार्ग उन्नति और विकास का मार्ग होता है वही दूसरी ओर हिंसा का मार्ग विनाश को आमंत्रित करता है। युद्ध को तभी आमंत्रित करना चाहिए जब शांति के समस्त मार्ग बंद हो जाये। फिलिस्तीनी-इस्रायली संघर्ष का समाधान इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि अरब राष्ट्रों ने इसका धार्मिक लाभ उठाया और अमेरिका एवं अन्य पश्चिमी देशों ने रणनीतिक जोकि इनकी धूर्तता का परिणाम है। लेकिन भारत सिर्फ शांति और न्याय का पक्षधर रहा है क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में हमारा देश ही सिर्फ एकलौता ऐसा देश है जिसने कभी भी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया और न ही किसी भी देश की भूमि पर जबरन अधिकार किया।  हमारा देश पाकिस्तान एवं चीन जैसे पड़ोसी शत्रुओं के साथ भी शांतिपूर्ण व्यवहार करता है, जबकि भारत इतना सक्षम है कि जब चाहे यह दोनों देशों को सबक सिखा सकता है।

अतः अंत में कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी की फिलिस्तीनी यात्रा से जहाँ एक और विश्व राजनीति में हलचल पैदा हुई है, वही दूसरी ओर अरब राष्ट्रों के मध्य भी उम्मीद की किरण दिखाई दी है। अब तक कुछ अरब राष्ट्र फिलिस्तीनी मुद्दे के कारण परदे के पीछे से यहूदी राष्ट्र इस्रायल से संबंध बनाने की कोशिश कर रहे थे। अब वे सभी भारत के माध्यम से खुलकर सामने आना चाहते हैं, जोकि एक शुभ पहल होगी और फिलिस्तीनी संघर्ष के समापन में अहम् भूमिका निभाएगी। यदि हम सभी पक्षों का विश्लेषण करे तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय प्रधानमंत्री की यह यात्रा पूर्णत: सफल सिद्ध हुई।

 

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