लेखक परिचय

अरुण कान्त शुक्ला

अरुण कान्त शुक्ला

भारतीय जीवन बीमा निगम से सेवानिवृत्त। ट्रेड यूनियन में तीन दशक से अधिक कार्य करता रहा। अध्ययन व लेखन में रुचि। रायपुर से प्रकाशित स्थानीय दैनिक अख़बारों में नियमित लेखन। सामाजिक कार्यों में रुचि। सामाजिक एवं नागरिक संस्थाओं में कार्यरत। जागरण जंक्शन में दबंग आवाज़ के नाम से अपना स्वयं का ब्लॉग। कार्ल मार्क्स से प्रभावित। प्रिय कोट " नदी के बहाव के साथ तो शव भी दूर तक तेज़ी के साथ बह जाता है , इसका अर्थ यह तो नहीं होता कि शव एक अच्छा तैराक है।"

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oये महज एक इत्तेफाक नहीं है कि जब भाजपा का लौह पुरुष कोपभवन में था, गुजरात में मोदी का प्रेम देश के लौह पुरुष सरदार पटेल के लिए उमड़ पड़ रहा था। अपनी पिछली दो पारियों में पटेल को शायद ही कभी याद करने वाले मोदी का प्रेम जब उनकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाने वाले कांग्रेस के स्तंभ रहे सरदार पटेल के लिए उमड़े तो इसके पीछे किसी बड़े उद्देश्य या षड्यंत्र के होने से इंकार नहीं किया जा सकता है।

गांधीनगर में 11 जून को पशुधन और डेयरी विकास पर आयोजित सम्मलेन में बोलते हुए मोदी ने कहा की देश को राष्ट्र के रूप में एक करने वाले इस व्यक्तित्व की यादें क्षीण पड़ती जा रही हैं और लोगों की यादों में सरदार पटेल को पुनर्जीवित करने के लिये वे सरदार सरोवर बाँध पर सरदार पटेल की एक लोहे की प्रतिमा स्थापित करेंगे, जो लगभग 392 फुट ऊँची होगी।

स्टेच्यू ऑफ़ यूनीटी के नाम से स्थापित होने वाली सरदार पटेल की ये प्रतिमा न्यूयार्क की स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी से लगभग दूनी ऊँचाई की होगी. इस स्टेच्यू ऑफ़ यूनीटी को स्थापित करने में लगभग 2500 करोड़ रुपये “लोहे” के अतिरिक्त खर्च होंगे।

प्रतिमा निर्माण के लिए लोहा कहाँ से आयेगा?

प्रतिमा निर्माण के लिए लोहे के प्रबंध का वही संघी तरीका मोदी ने अपनाया है जो बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद संघ ने मंदिर निर्माण के नाम पर अपनाया था याने संघ ने मंदिर निर्माण के नाम पर एक घर से एक ईंट माँगी थी और मोदी मांग रहे हैं, देश के 5 लाख गांवों के किसानों से उनके लोहे के औजारों में से एक औजार. मोदी ने ड्रामाई अंदाज में सम्मलेन में सामने की कुर्सियों पर बैठे लोगों से पूछा कि आप लोग लोहा देंगे? क्षणिक खामोशी के बाद जबाब आया, देंगे।

मोदी के लिए ये बात कोई मायने नहीं रखती कि डेयरी और पशुधन विकास के लिए आयोजित उस सम्मलेन में कितने वास्तविक किसान थे, या जो थे भी, वो क्या देश के 5 लाख से ज्यादा गाँवों में रहने वाले किसानों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं या नहीं? मोदी के लिए आज जो बात मायने रखती है, वो यह है कि किस तरह आनन फानन देश के सुदूर ग्रामीण अंचल तक अपनी पहचान पहुंचाई जाये, जोकि भाजपा के राष्ट्रीय चुनाव प्रचारक बनने के बाद उनके लिए और भी जरुरी हो गया है।

संघ की चाल है मोदी का पटेल प्रेम

मोदी का पटेल प्रेम संघ की बिछाई बिसात पर वो दूसरी चाल है, जो संघ ने चली है।  संघ की पहली चाल थी, इस तरह जद(यू) से पीछा छुड़ाना कि सभी को लगे कि जद(यू) संघ के अंदरुनी मामलों में हस्तक्षेप करते हुए एनडीए से बाहर जा रहा है. संघ अपनी इस चाल में सफल हो गया है।

यह खेल तब शुरू हुआ, जब 2010 में कामनवेल्थ घोटाले के फूटने और 2जी घोटालों की खबरें लीक होने के बाद संघ को लगा कि कांग्रेस की बढ़ती हुई अलोकप्रियता को भाजपा अकेले के दम पर भुना सकती है।  वैसे भी एनडीए में भाजपा अकेली राष्ट्रव्यापी पार्टी है. जद(यू) का प्रभाव बिहार के बाहर कहीं नहीं है।  जद(यू) का धर्मनिरपेक्षता का बिल्ला लगाकर घूमना संघ के हिन्दुत्ववादी एजेंडे की राह का रोड़ा था. इसलिये, मोदी को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोजेक्ट करने के लिए उसने 2010 में बिहार को ही चुना ताकि नीतीश कुमार बिदक जायें।  और, ठीक वही हुआ भी।

इसके बाद संघ को सिर्फ गुजरात के चुनावों का इंतज़ार था, जिसमें मोदी का सफल होकर निकलना पूरी तरह निश्चित था।  मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में तीसरी बार शपथ लेते ही संघ के सामने केवल दो काम रह गए थे. पहला, पहली रथ यात्रा के बाद हुए दंगों और बाबरी मस्जिद के टूटने के कलंक को धोने के प्रयास में उग्र हिन्दुत्ववादी एजेंडे से भटके, प्रधानमंत्री बनने की आस लगाए बैठे आडवाणी को हाशिये पर फेंकना और मोदी को विकास पुरुष के नाम से स्थापित करना।

भाजपा की गोवा कार्यकारिणी बैठक में दोनों काम कर दिए गये।  आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह जैसे दिग्गजों की नाराजगी को दरकिनार करते हुए मोदी को न केवल आसन्न चुनावों के लिये भाजपा की राष्ट्रीय चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया गया बल्कि भाजपा और संघ का पूरा प्रचार तंत्र, जो पहले से ही मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर रहा था, और तेजी से मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित करने में लग गया. संघ के इशारे पर राम मंदिर का मुद्दा फिर उठाया जाने लगा।

अब दूसरी चाल, पटेल-प्रेम के तहत भाजपा के कार्यकर्ता संघ के स्वयंसेवकों के साथ देश के कोने कोने में स्थित 5 लाख से अधिक गाँवों में सरदार पटेल की तस्वीर लेकर किसानों और लोहारों से लोहा इकठ्ठा करने जायेंगे और बदले में मोदी की फोटो और छाप गाँवों में छोड़कर आयेंगे।  याने, संघ की दूसरी चाल के तहत संघ के स्वयंसेवक और भाजपा के कार्यकर्ता मोदी को, जिनके बारे में अन्य पार्टियों और राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि वे भाजपा के पोस्टर ब्वाय और मीडिया के टीआरपी ब्वाय हैं, पूरे देश में स्थापित करेंगे।

क्योंकि मृत लोग बोलते नहीं

सरदार पटेल के लिए मोदी (संघ) का यह प्रेमभाव इसलिए है कि आज संघ को लगता है कि अपने उग्र हिन्दुत्ववादी एजेंडे को लागू करने के लिए, उसे देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले योद्धाओं के साथ खुद को खड़ा दिखाना चाहिये।

मोदी ने गांधीनगर के सम्मलेन में कहा कि सरदार पटेल ने किसानों को संगठित करने और उनके हकों की लड़ाई को आगे बढाने में महत्वपूर्ण काम किया है. पर, मोदी ने यह नहीं बताया कि सरदार पटेल जब 1928 में बारदोली में ब्रिटिशों के द्वारा लगान बढाने और वहां के किसानों की जमीनों को मुंबई के रसूखदारों को जबरदस्ती बेचने के लिए किसानों को मजबूर करने के प्रयासों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे, आज की भाजपा की पितृ संस्था हिन्दु महासभा या संघ कोई भी उसमें शामिल नहीं था।

सरदार पटेल लगभग 1917 से लेकर मृत्यु (1950) तक कांग्रेस में रहे और कांग्रेस में रहते हुए ही उन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और अनेक वर्ष अंग्रेजों की जेल में गुजारे।  जबकि, उस समय की हिन्दुमहासभा या संघ के किसी भी नेता के आजादी के किसी भी प्रमुख आन्दोलन में हिस्सा लेने का कोई इतिहास नहीं है।

संघ को लेकर सरदार पटेल के क्या विचार थे, इसे पटेल से बेहतर कौन बता सकता है।  सरदार पटेल का 11सितंबर 1948 को आरएसएस प्रमुख गोलवलकर को लिखे पत्र के अंश पर गौर फरमायें -”हिन्दुओं को संगठित करना और उनकी मदद करना एक बात है किन्तु उनकी तकलीफों के लिये निर्दोष और असहाय स्त्री-पुरूषों और बच्चों से बदला लेना एक दूसरी बात है।  इसके अलावा, कांग्रेस के प्रति उनके मन में भयंकर विष भरा हुआ है और वे व्यक्तित्व की गरिमा का विचार किये बगैर, शालीनता और शिष्टाचार की कोई परवाह नहीं करते हैं, जिससे लोगों में एक प्रकार की घबराहट पैदा हो गई है. उनके सारे भाषण साम्प्रदायिकता के जहर से भरे हुये है।  हिन्दुओं को उत्साहित करने लिये और आत्मरक्षा के लिये उन्हें संगठित करने हेतु जहर फैलाना जरूरी नही था।  इस जहर का आखिरी परिणाम यह हुआ कि देश को गाँधी जी के अनमोल जीवन के बलिदान की पीड़ा को भुगतना पड़ा।  जब आरएसएस क़े लोगों ने गाँधी जी की मृत्यु के बाद खुशियाँ मनाई और मिठाइयाँ बाँटी इसके बाद सरकार या जनता के मन में अब आरएसएस क़े प्रति रत्ती भर भी सहानुभूति नही बची।  इसके बाद विपक्ष सचमुच मजबूत तथा कठोर हो गया।

इन परिस्थितियों में आरएसएस क़े विरूद्ध कार्यवाही करना सरकार के लिये अपरिहार्य हो गया था तब से 6 माह से अधिक बीत गये है।  हमें उम्मीद थी कि इतना समय बीत जाने के बाद आरएसएस के लोग पूरी तरह से सोच समझकर सही रास्ते पर आ जायेंगे।  किन्तु जो सूचनाएँ मुझे मिली हैं, उनके अनुसार यह साफ है कि अपनी पुरानी गतिविधियों को नया रूप देने का उनका प्रयास जारी है। ” (आईबिड पेज 26-28)

 

इसके अलावा सरदार पटेल द्वारा हिन्दू महासभा के प्रमुख और जानेमाने नेता श्यामाप्राद मुखर्जी को 18 जुलाई 1948 को लिखे पत्र के अंश को भी देखना दिलचस्प है- ”…जहाँ तक आरएसएस और हिन्दू महासभा की बात है, गाँधीजी की हत्या से संबंधित मामला न्यायालय में विचाराधीन है और मैं इन दोनों संगठनों की इसमें भूमिका के बारे में कुछ भी नही कहना चाहूंगा,किन्तु हमारी सूचनायें यह पुष्टि करती है कि इन दोनों संगठनों की ही गतिविधियों के फलस्वरूप, विशेषकर आरएसएस ने देश में ऐसा वातावरण निर्मित किया जिसके कारण यह घृणित हादसा संभव हो सका।  मेरे मन में इस बात के प्रति कोई संदेह नही है कि हिन्दू महासभा का कट्टरवादी वर्ग इस षड़यंत्र में शामिल था।

आरएसएस क़ी गतिविधियों ने सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिये स्पष्ट खतरा पैदा कर दिया था. हमारी सूचनायें दर्शाती है कि प्रतिबंध के बावजूद भी आरएसएस क़ी गतिविधियों में कमी नही आई है।  वास्तव में समय बीतने के साथ आरएसएस क़ा दायरा और अधिक विस्तृत हो रहा है और उसकी विनाशकारी गतिविधियों में लिप्तता तेजी से बढ़ती जा रही है। ” (सरदार पटेल के चुनिंदा पत्राचार में पत्र क्रमांक 64, 1945-1950, भाग-2, नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद, 1977, पेज 276-277)

 

क्योंकि मृत व्यक्ति कभी बोलते नहीं हैं, सरदार पटेल कभी भी ज़िंदा होकर मोदी के प्रेम का भंडाफोड़ करने नहीं आ सकते।  लेकिन, वे दस्तावेज अभी भी जिन्दा हैं, जो बताते हैं कि मोदी का सरदार पटेल के लिए प्रेम देशवासियों को छलने की एक चाल के सिवा कुछ नहीं है।  सरदार पटेल की संघ और हिन्दु महासभा के बारे में ये समझ तब भी थी, जब उन्होंने संघ के ऊपर पहला प्रतिबन्ध लगाया था. यह बात सरदार पटेल के 11 सितम्बर और 18 जुलाई 1948 को लिखे पत्रों से भी जाहिर होती है, जो उन्होंने संघ के तत्कालीन प्रमुख गोलवरकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखे थे।

प्यार या प्रपंच

इसके बावजूद मोदी सरदार पटेल को प्यार करने का दावा करते हैं. इसका सीधा अर्थ है कि मोदी या उनकी मातृसंस्था संघ को अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के प्रयास में किसी भी प्रपंच से कोई परहेज नहीं है।

सरदार पटेल इसके लिए गुजरात में बने बनाए हीरो के समान मोदी को उपलब्ध हैं।  संघ या मोदी किसी को भी किसी नए प्रतीक को गढ़ने की जहमत नहीं उठानी है। कांग्रेस ने, जिसने अपनी आजादी की लड़ाई के इतिहास से खुद किनारा कर लिया है और देशी पूंजी के विकास के लिए अमरीकियों की उंगली थाम कर चल रही है, मोदी के इस काम को और आसान बना दिया है।  अब, संघ और मोदी कंपनी को देश के एक अरब लोगों से यही छुपाना है कि सरदार पटेल उनकी संस्थाओं और उनके हिंदुत्ववादी एजेंडे के खिलाफ थे।  आज की राजनीति में ये कोई कठिन काम नहीं है।

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