मुहर्रम पर क्यों  मनाते हैं इमाम हुसैन का गम…

मुहर्रम इस्लामी वर्ष यानी हिजरी सन्‌ का पहला महीना है। यह एक मुस्लिम त्यौहार भी है। हिजरी सन्‌ का आगाज इसी महीने से होता है। इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस मास को अल्लाह का महीना कहा है। साथ ही इस मास में रोजा रखने की खास अहमियत बयान की है।मुख्तलिफ हदीसों, यानी हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के कौल (कथन) व अमल (कर्म) से मुहर्रम की पवित्रता व इसकी अहमियत का पता चलता है। ऐसे ही हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बार मुहर्रम का जिक्र करते हुए इसे अल्लाह का महीना कहा। इसे जिन चार पवित्र महीनों में रखा गया है, उनमें से दो महीने मुहर्रम से पहले आते हैं। यह दो मास हैं जीकादा व जिलहिज्ज।एक हदीस के अनुसार अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा कि रमजान के अलावा सबसे उत्तम रोजे वे हैं, जो अल्लाह के महीने यानी मुहर्रम में रखे जाते हैं। यह कहते समय नबी-ए-करीम हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने एक बात और जोड़ी कि जिस तरह अनिवार्य नमाजों के बाद सबसे अहम नमाज तहज्जुद की है, उसी तरह रमजान के रोजों के बाद सबसे उत्तम रोजे मुहर्रम के हैं। इस्लामी यानी हिजरी सन्‌ का पहला महीना मुहर्रम है। इत्तिफाक की बात है कि आज मुहर्रम का यह पहलू आमजन की नजरों से ओझल है और इस माह में अल्लाह की इबादत करनी चाहीये जबकि पैगंबरे-इस्लाम (सल्ल.) ने इस माह में खूब रोजे रखे और अपने साथियों का ध्यान भी इस तरफ आकर्षित किया। इस बारे में कई प्रामाणिक हदीसें मौजूद हैं। मुहर्रम की 9 तारीख को जाने वाली इबादतों का भी बड़ा सवाब बताया गया है। हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के साथी इब्ने अब्बास के मुताबिक हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा कि जिसने मुहर्रम की 9 तारीख का रोजा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ हो जाते हैं तथा मुहर्रम के एक रोजे का सवाब (फल) 30 रोजों के बराबर मिलता है। गोया यह कि मुहर्रम के महीने में खूब रोजे रखे जाने चाहिए। यह रोजे अनिवार्य यानी जरूरी नहीं हैं, लेकिन मुहर्रम के रोजों का बहुत सवाब है।

जिसे उर्दू जबान में हिजरी कहा जाता है। इतना ही नहीं इस्लाम के चार पवित्र महीनों में इस महीने की अपनी अलग अहमियत होती है। दरअसल इराक में सन् 680 में यजीद नामक एक जालिम बादशाह हुआ करता था, जो इंसानियत का बड़ा दुश्मन था। जिसकी वजह से हजरत इमाम हुसैन ने जालिम बादशाह यजीद के विरुद्ध जंग का एलान कर दिया था। पैगंबर मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन एवं उनके साथियों की शहादत इस माह में हुई थी।

मुहर्रम सब्र का, इबादत का महीना है। इसी माह में आदरणीय पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब, मुस्तफा सल्लाहों अलैह व आलही वसल्लम ने पवित्र मक्का से पवित्र नगर मदीना में हिजरत की थी। यानी कि आप सल्ल. मक्का से मदीना मुनव्वरा तशरीफ लाए।

इसी जंग में मोहम्मद-ए-मस्तफा के नाती हजरत इमाम हुसैन को कर्बला नामक जगह पर उनके परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था। तभी से मुहर्रम के दिन हुसैन और उनके परिवार की शहादत को याद किया जाने लगा है। हालांकि उस दिन लड़ी गई मजहबी जंग में जीत हुसैन की ही हुई थीं, मगर यजीद ने उनके साथ और उनके 72 साथियों को मौत के घाट उतार दिया था।

असल में जिस दिन हुसैन को शहीद किया गया वह मुहर्रम का ही महीना था और उस दिन 10 तारीख थी। जिसके बाद इस्लाम धर्म मानने वाले लोगों ने इस्लामी कैलेंडर का नया साल मनाना छोड़ दिया। मगर फिर बाद में मुहर्रम का महीना गम के महीने के तौर पर मनाया जाने लगा। हालांकि खुदा के बंदे हजरत मोहम्मद ने इस महीने को अल्लाह का महीना करार दिया है। जिसमें पूरे दस दिन तक मुहर्रम के रीति-रिवाजों को पूरी शिद्दत से अदा किया जाता है।

इस दिन शिया समुदाय के लोग काले कपड़े पहनते हैं, वहीं अगर बात करें मुस्लिम समाज के सुन्नी समुदाय की तो वह इस दिन तक रोजे में रहते हैं। दरअसल रमजान महीने के अलावा, मुहर्रम को सबसे पाक समय रोजे के लिए बताया जाता है। हजरत मोहम्मद के साथी इब्ने अब्बास के मुताबिक जिसने मुहर्रम के 9 दिन तक रोजा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ हो जाते हैं और मुहर्रम के एक रोजे का सबाब 30 रोजों के बराबर मिलता है।

इस तरह से दिलचस्प बात है कि मुहर्रम कोई त्योहार नहीं है, बल्कि यह तो मातम मनाने का दिन है। जिस दिन शहीद हुए अल्लाह के बंदों की रुह के सुकून की दुआ मांगी जाती है। इसके साथ ही हमें यह सीख भी मिलती है कि मजहब की राह पर चलकर अगर आपको शहादत भी मिले तो धर्म की राह पर कुर्बान होने से घबराना नहीं चाहिए। गौरतलब है कि जिस जगह हुसैन को शहीद किया गया था, वह इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर, उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा कस्बा है।

मुहर्रम के रोज़ इस्लाम धर्म के लोग मकबरे के आकार के ताज़िये के सामने मातम करते दिखाई देते हैं। ताजिया हजरत इमाम हुसैन की याद में बनाया जाता है। बांस की कमाचिय़ों पर रंग-बिरंगे कागज, पन्नी आदि चिपका कर मकबरे के आकार का मंडप बनाया जाता है जिसे मुहर्रम के दिनों में मुसलमान लोग हजरत इमाम हुसैन की कब्र के प्रतीक रूप में बनाते हैं। ग्यारहवें दिन जलूस के साथ ले जाकर इसे दफन किया जाता है।
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अलबत्ता यह जरूर कहा जाता है कि इस दिन अल्लाह के नबी हजरत नूह (अ.) की किश्ती को किनारा मिला था। इसके साथ ही आशूरे के दिन यानी 10 मुहर्रम को एक ऐसी घटना हुई थी, जिसका विश्व इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। इराक स्थित कर्बला में हुई यह घटना दरअसल सत्य के लिए जान न्योछावर कर देने की जिंदा मिसाल है। इस घटना में हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के नवासे (नाती) हजरत हुसैन को शहीद कर दिया गया था। कर्बला की घटना अपने आप में बड़ी विभत्स और निंदनीय है। बुजुर्ग कहते हैं कि इसे याद करते हुए भी हमें हजरत मुहम्मद (सल्ल.) का तरीका अपनाना चाहिए। जबकि आज आमजन को दीन की जानकारी न के बराबर है। अल्लाह के रसूल वाले तरीकोंसे लोग वाकिफ नहीं हैं। ऐसे में जरूरत है हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की बताई बातों पर गौर करने और उन पर सही ढंग से अमल करने की जरुरत है !
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इमाम हुसैन ने यजीद को खलीफा मानने से किया इनकार : तत्कालीन अरब के शासक यजीद ने पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के आदर्शों, शिक्षा को ताक पर रखकर जब अरब का शासन चलाना चाहा तो उसमें इमाम हुसैन औऱ उनका परिवार एक रुकावट की तरह नजर आया। यजीद ने अरब में जुआखानों, शराबखानों और अन्य अनैतिक कामों पर नैतिकता की मुहर लगा दी। इमाम हुसैन का संबंध चूंकि पैगंबर साहब के परिवार से था तो यजीद को सनक सवार हुई कि इमाम हुसैन से उससे बैयत (अधीनता) कर लें और उसे अपना खलीफा मान लें। इमाम हुसैन ने इससे इनकार किया।
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मदीना से भारत आने का फैसला : इमाम हुसैन ने पैगंबर के आदर्शों का हवाला देकर इसे नामुमकिन बताया और मदीना छोड़कर भारत आने का फैसला किया। भारत की ख्याति उस दौर में भी ऐसे उदारवादी देश की थी, जहां कोई भी आकर रह सकता था। भारत में उस समय चंद्रगुप्त का शासन था जिनके बेटे समुद्रगुप्त की एक रानी ईरान से थी। हालांकि इमाम हुसैन भारत नहीं पहुंच सके।
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यूं शहीद हुए इमाम हुसैन : इमाम हुसैन के काफिले को इराक के कर्बला नामक जगह पर रोक दिया गया। उनकी सारी रसद खत्म हो गई। नदी से पीने का पानी लाने पर भी रोक लगा दी गई। लाखों की फौज ने काफिले को घेर लिया। इमाम हुसैन के साथ उनके 6 महीने के बेटे असगर को भी शहीद कर दिया गया। इमाम हुसैन ने यजीदी सेना को पैगंबर का वास्ता दिया लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। जैसे ही अजान हुई, इमाम हुसैन नमाज के लिए उठे, उसी वक्त उन्हें यजीदी सेना के कमांडर ने शहीद कर दिया।
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इस्लाम के लिए इमाम हुसैन की शहादत : इमाम हुसैन की शहादत से बहुत पहले उनके नाना यानी पैगंबर साहब ने कहा था कि इस्लाम को बचाने के लिए तुम्हारी शहादत पूरे परिवार के साथ होगी लेकिन तुम्हारा नाम जब तक दुनिया है, तब तक कायम रहेगा। जिनका विश्वास मानवता, सहिष्णुता, अहिंसा में होगा, वे लोग तुम्हारी याद दुनिया का वजूद रहने तक मनाते रहेंगे। 680 ई. से शुरू हुआ सिलसिला आज भी जारी है। हालांकि कई देशों में इमाम हुसैन का गम मनाने की मनाही है लेकिन दुनिया में जहां-जहां सही मायने में लोकतंत्र है, वहां इमाम हुसैन का गम मनाया जाता है।
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मुहर्रम और आशुरा—

 

आशुरा के दिन हजरत रसूल के नवासे हजरत इमाम हुसैन को और उनके बेटे घरवाले और उनके सथियों (परिवार वालो) को करबला के मैदान में शहीद कर दिया गया था।

मुहर्रम इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्यौहार है। इस माह की बहुत विशेषता और महत्व है। सन् 680 में इसी माह में कर्बला नामक स्थान मे एक धर्म युद्ध हुआ था, जो पैगम्बर हजरत मुहम्म्द स० के नाती तथा यजीद (पुत्र माविया पुत्र अबुसुफियान पुत्र उमेय्या) के बीच हुआ। इस धर्म युद्ध में वास्तविक जीत हज़रत इमाम हुसैन अ० की हुई। प‍र जाहिरी तौर पर यजीद के कमांडर ने हज़रत इमाम हुसैन अ० और उनके सभी 72 साथियो (परिवार वालो) को शहीद कर दिया था। जिसमें उनके छः महीने की उम्र के पुत्र हज़रत अली असग़र भी शामिल थे। और तभी से तमाम दुनिया के ना सिर्फ़ मुसलमान बल्कि दूसरी क़ौमों के लोग भी इस महीने में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का ग़म मनाकर उनकी याद करते हैं। आशूरे के दिन यानी 10 मुहर्रम को एक ऐसी घटना हुई थी, जिसका विश्व इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। इराक स्थित कर्बला में हुई यह घटना दरअसल सत्य के लिए जान न्योछावर कर देने की जिंदा मिसाल है। इस घटना में हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के नवासे (नाती) हजरत हुसैन को शहीद कर दिया गया था।

 

कर्बला की घटना अपने आप में बड़ी विभत्स और निंदनीय है। बुजुर्ग कहते हैं कि इसे याद करते हुए भी हमें हजरत मुहम्मद (सल्ल.) का तरीका अपनाना चाहिए। जबकि आज आमजन को दीन की जानकारी न के बराबर है। अल्लाह के रसूल वाले तरीकों से लोग वाकिफ नहीं हैं। ऐसे में जरूरत है हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की बताई बातों पर गौर करने और उन पर सही ढंग से अमल करने की जरुरत है।

 

इमाम और उनकी शहादत के बाद सिर्फ उनके एक पुत्र हजरत इमाम जै़नुलआबेदीन, जो कि बीमारी के कारण युद्ध मे भाग न ले सके थे बचे | दुनिया मे अपने बच्चों का नाम हज़रत हुसैन और उनके शहीद साथियों के नाम पर रखने वाले अरबो मुसलमान हैं। इमाम हुसेन की औलादे जो सादात कहलाती हैं दुनियाभर में फैली हुयी हैं। जो इमाम जेनुलाबेदीन अ० से चली।
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क्यों मनाते हैं मुहर्रम :-

 

मोहम्मद साहब के मरने के लगभग 50 वर्ष बाद मक्का से दूर कर्बला के गवर्नर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया। कर्बला जिसे अब सीरिया के नाम से जाना जाता है। वहां यजीद इस्लाम का शहंशाह बनाना चाहता था। इसके लिए उसने आवाम में खौफ फैलाना शुरू कर दिया। लोगों को गुलाम बनाने के लिए वह उन पर अत्याचार करने लगा। यजीद पूरे अरब पर कब्जा करना चाहता था। लेकिन उसके सामने हजरत मुहम्मद के वारिस और उनके कुछ साथियों ने यजीद के सामने अपने घुटने नहीं टेके और जमकर मुकाबला किया।

अपने बीवी बच्चों की सलामती के लिए इमाम हुसैन मदीना से इराक की तरफ जा रहे थे तभी रास्ते में यजीद ने उन पर हमला कर दिया। इमाम हुसैन और उनके साथियों ने मिलकर यजीद की फौज से डटकर सामना किया। हुसैन लगभग 72 लोग थे और यजीद के पास 8000 से अधिक सैनिक थे लेकिन फिर भी उन लोगों ने यजीद की फौज के दांत खट्टे कर दिये थे।

हालांकि वे इस युद्ध में जीत नहीं सके और सभी शहीद हो गए। किसी तरह हुसैन इस लड़ाई में बच गए। यह लड़ाई मुहर्रम 2 से 6 तक चली। आखिरी दिन हुसैन ने अपने साथियों को कब्र में दफन किया। मुहर्रम के दसवें दिन जब हुसैन नमाज अदा कर रहे थे, तब यजीद ने धोखे से उन्हें भी मरवा दिया। उस दिन से मुहर्रम को इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के त्योहार के रूप में मनाया जाता है।
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जानिए क्यों बनातें हैं ताजिया :-

ये शिया मुस्लिमों का अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का एक तरीका है। मुहर्रम के दस दिनों तक बांस, लकड़ी का इस्तेमाल कर तरह-तरह से लोग इसे सजाते हैं और ग्यारहवें दिन इन्हें बाहर निकाला जाता है। लोग इन्हें सड़कों पर लेकर पूरे नगर में भ्रमण करते हैं सभी इस्लामिक लोग इसमें इकट्ठे होते हैं। इसके बाद इन्हें इमाम हुसैन की कब्र बनाकर दफनाया जाता है। एक तरीके से 60 हिजरी में शहीद हुए लोगों को एक तरह से यह श्रद्धांजलि दी जाती है।
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मुहर्रम  

इमाम हुसैन (अ:स) अपने  नाना रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) से उम्मत द्वारा किये गए ज़ुल्म को ब्यान करते हुए कहते हैं :

नाना आपके बाद आपकी उम्मत ने माँ फातिमा (स:अ) पर इतना ज़ुल्म ढाया की मेरा भाई उनके कोख में ही मर गया, मेरी माँ और आपकी बेटी पर जलता हुआ दरवाज़ा गिराया गया और उन्हें मार दिया गया! नाना आपकी उम्मत ने बाबा अली (अ:स) को मस्जिद में नमाज़ के सजदे में क़त्ल किया! मेरे भाई हसन (अ:स) को ज़हर देकर मार दिया गया नाना! उसके जनाज़े पर तीरों की बारिश की गयी, फिर भी मैं खामोश रहा! ऐ नाना, मैंने अल्लाह के दीन को आप से किये गए वादे के अनुसार कर्बला के मैदान में अपने तमाम बच्चों, साथियों और अंसारों की क़ुर्बानी देकर बचा लिया! नाना, मेरे 6 महीने के असग़र को तीन दिन की प्यास के बाद तीन फल का तीर मिला ! मेरा बेटा अकबर, जो आप का हमशक्ल था, उसके सीने में ऐसा नैज़ा मारा गया की उसका फल उसके कलेजे में ही टूट गया ! मेरी बच्ची सकीना को तमाचे मार-मार कर इस तरह से उसके कानो से बालियाँ खींची गयी के उसके कान के लौ कट गए ! ऐ नाना,बाबा की दुआओं की तमन्ना मेरा भैय्या अब्बास, जो हमारे कबीले के चमकते चाँद की तरह था, उसको इतने टुकड़ों में काटा गया की उसकी लाश को खैमा तक नहीं लाया जा सका ! ऐ नाना, भाई हसन का बेटा क़ासिम, इस तरह से घोड़ों की टापों से रोंदा गया की उसके जिस्म का एक एक टुकड़ा मक़तल में फैल गया! नाना, आप की उम्मत ने मुझे भी ना छोड़ा! मुझे प्यासा रख़ा नाना ! अंसार, अज़ीज़ और बेटों के शहादत के बाद मै तेरे दीन को बचाने की ख़ातिर कर्बला के उस तपते हुए रेगिस्तान में गया, जहाँ मैंने अकबर, असग़र, अब्बास वा कासिम को भेजा था !  नाना, तेरी उम्मत, दादा अबू तालिब को काफिर कहती थी, लेकिन कर्बला के मैदान में अल्लाह का दीन बचाने के लिए कटी औलादे अबुतालिब ही ना ! मैंने अल्लाह का, आप का और बाबा अली-मुर्तज़ा का नाम लेकर उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन वोह न माने! जब निदा के बाद मैंने अपनी तलवार म्यान में रखी तो पहले लोगों में मुझ पर पत्थर मारे, फिर नैज़े, फिर तलवारें, नाना मुझे जब यह ज़ालिम मार रहे थे तो मैंने आपको, माँ फातिमा, बाबा अली, और  भाई हसन को बहुत याद कर रहा था! नाना, सच तो यह है की अम्मा बहुत याद आयीं! नाना मुझे इतने तीर लगे थे की जब मै घोड़े से ज़मीन पर ग़िर रहा था, मै भी भाई अब्बास की तरह हाथ के बल ना आ सका. बल्कि तीर इतने थे नाना की मै ज़मीन पर ही नहीं आ सका ! जालिमों ने मेरी उंगली काट कर अंगूठी उतार ली नाना ! कोई आप का अमामा ले गया कोई पैराहन ले गया ! नाना, जब शिमर ज़िल जौशन मेरा सर काट रहा था, मेरी अम्मा ने बचाने की बहुत कोशिश की थी! प्यास की शिद्दत, कुंद छुरी, उलटी गर्दन, 1900 ज़ख़्म नाना!  नाना, मैने अपना सर नोके नैज़ा पर चढ़ा कर तेरे दीन की फ़तह का एलान  किया! नाना ख़ुदा हाफ़िज़, अब मेरी जैनब व उम्मे कुलसूम की चादर का ख्याल तेरे हवाले, मेरे बीमार सैयदे सज्जाद को जलना से बचाना, नाना! इन्ना लिल’लाहे व इन्ना इलैही राजे’उन !

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