लेखक परिचय

लालकृष्‍ण आडवाणी

लालकृष्‍ण आडवाणी

भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के पूर्व राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष। भारत के उपप्रधानमंत्री एवं केन्‍द्रीय गृहमंत्री रहे। राजनैतिक शुचिता के प्रबल पक्षधर। प्रखर बौद्धिक क्षमता के धनी एवं बृहद जनाधार वाले करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व। वर्तमान में भाजपा संसदीय दल के अध्‍यक्ष एवं लोकसभा सांसद।

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लालकृष्ण आडवाणी

km-munshiअपने एक पूर्ववर्ती ब्लॉग में मैंने विस्तार से बताया था कि कैसे सरदार पटेल, उनके निकट सहयोगी वी.पी. मेनन तथा लार्ड माउंटबेंटन ने मिलकर ब्रिटिशों के जाने के बाद भारत को एक सूत्र में गूंथने के लिए प्रयास किए। उसके लिए मैंने वी.पी. मेनन जिन्हें सरदार पटेल ने विदेश विभाग में सचिव नियुक्त किया था, द्वारा लिखी गई दो उत्कृष्ट पुस्तकों के साथ ही एक और ताजा पुस्तक एलेक्स वॉन वूनेलमान द्वारा लिखित ”इण्डियन समर: दि सिक्रेट हिस्ट्री ऑफ दि एण्ड ऑफ एन अम्पायर” का सहयोग लिया था। यह महिला लेखक प्रमुखतया ऑक्सफोर्ड में शिक्षित शोधार्थी हैं और अब लंदन में रहती हैं। मेनन की जिन दो पुस्तकों को मैं सभी पुस्तक प्रेमियों से पढ़ने की सिफारिश करता हूं उनके शीर्षक हैं ‘इण्टीग्रेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स‘ और दि ‘ट्रांसफर ऑफ पॉवर‘

परन्तु उस ब्लॉग में टेलपीस 30 अक्टूबर 2012 यानी गत् वर्ष सरदार की जन्मतिथि से एक दिन पूर्व पॉयनियर दैनिक में प्रकाशित एक समाचार पर आधारित था। यह समाचार हैदराबाद में भारत सरकार के ऑपरेशन से कुछ सप्ताह पूर्व मंत्रिमण्डल की बैठक में नेहरु और पटेल में हुई गर्मागर्मी से सम्बंधित था। पण्डित नेहरु सैन्य कार्रवाई के विरोधी थे जबकि सरदार पटेल ने वहां से प्राप्त रिपोर्टों कि कैसे निजाम की निजी सेना-रजकारों द्वारा निर्दोष नागरिकों पर अत्याचार किए जा रहे हैं, को ध्यान में लेकर उक्त निर्णय किया था।

पण्डित नेहरु हैदराबाद के मुद्दे को भी कश्मीर की भांति संयुक्त राष्ट्र को सौंपना चाहते थे-वह भी सरदार पटेल की विरोधी सलाह के बावजूद।

उपरोक्त समाचार पॉयनियर के चेन्नई सवांददाता द्वारा 1947 के आईएएस अधिकारी एमकेके नायर द्वारा लिखित पुस्तक ‘विद नो इल फीलिंग टूवर्डस एनीबॉडी‘ पर आधारित था।

समाचार के मुताविक प्रधानमंत्री और उपप्रधानमंत्री के बीच हुई गर्मागर्मी के चलते सरदार पटेल बैठक से गुस्से में निकल गए। अंतत: 13 सितम्बर, 1948 को ऑपरेशन पोलो के नाम से सैन्य कार्रवाई हुई जोकि 18 सितम्बर को पूरी हुई।

जब से मैंने यह ब्लॉग लिखा तबसे मैं इस पुस्तक को व्याकुलता से तलाश रहा हूं क्योंकि मुझे लगता है कि इससे देश को पता चल सकेगा कि वास्तव में इन दोनों के बीच क्या संवाद हुआ था। मुझे मिली जानकारी के मुताबिक इस पुस्तक के लेखक अब हमारे बीच नहीं हैं। न ही यह पुस्तक मुझे किसी बुकस्टोर या पुस्तकालय में मिल पाई। अपने इस ब्लॉग के माध्यम मैं अपने पाठकों को अनुरोध करना चाहूंगा कि यदि वे मुझे यह पुस्तक उपलब्ध करा सकें तो मैं अत्यंत आभारी रहूंगा। पॉयनियर के सम्पादक चंदन मित्रा भी इसके लिए प्रयासरत हैं परन्तु उन्हें अभी तक सफलता नहीं मिली है।

मेरा पिछला ब्लॉग 25 सितम्बर को पण्डित दीनदयाल उपाध्याय की जन्मतिथि के बारे में था और इससे जुड़ी भाजपा सम्बन्धी दो घटनाओं को मैं कभी नहीं भूल सकता। पहली 1990 में सोमनाथ से अयोध्या तक मेरी यात्रा। दूसरी, भोपाल में 6 लाख से ज्यादा सक्रिय पार्टी कार्यकर्ताओं का सम्मेलन जो आगामी 25 नवम्बर को मध्य प्रदेश में होने वाले चुनावों में 53000 से ज्यादा पोलिंग बूथों का प्रबन्धन करेंगे।

इसी ब्लॉग में मैंने उल्लेख किया था कि पुनरुध्दार के बाद सोमनाथ मंदिर का लोकार्पण सरदार पटेल करने वाले थे परन्तु 15 दिसम्बर, 1950 को उनका निधन हो गया तथा मंदिर का लोकार्पण राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा किया गया। मैंने यह भी उल्लेख किया था कि राष्ट्रपतिजी ने प्रधानमंत्री द्वारा इस कदम का विरोध करने के बावजूद ऐसा किया। और इस प्रकार एक और रोचक प्रसंग यहां पर स्मरण हो आता है। यह घटना भी पण्डित नेहरु ओर सरदार पटेल के बीच सैन्य कार्रवाई को लेकर हुए मतभेद जैसी ही है।

sardar-patelजूनागढ़ के नवाब द्वारा पाकिस्तान में विलय की घोषणा के विरुध्द उमड़े जनाक्रोश के बाद सरदार पटेल सबसे पहले वहां पहुंचे। लोगों के गुस्से को देखते हुए नवाब पाकिस्तान भाग गया था। लोगों ने सरदार पटेल का गर्मजोशी से स्वागत किया। इस विशाल सभा में सरदार पटेल ने घोषणा की कि बारह ज्योर्तिलिंगों में से प्रमुख सोमनाथ को इसके मूल स्थान पर पुन: बनाया जाएगा और ज्योर्तिलिंग पुर्नस्थापित किया जाएगा।

दिल्ली लौटने के बाद उन्होंने इस हेतु गांधी जी का आशीर्वाद लिया और पण्डित नेहरु के मंत्रिमंडल नें इस निर्णय को स्वीकृति दी। मंत्रिमंडलीय फैसले में निहित था कि सरकार इसका व्यय वहन करेगी। लेकिन जब सायंकाल में सरदार पटेल, के.एम. मुंशी और एन.वी. गांडगिल गांधी जी से मिले और मंत्रिमंडल की फैसले की जानकारी दी तो उन्होंने

इसका स्वागत किया परन्तु साथ ही जोड़ा: सरकार के बजाय लोगों को इसका व्यय वहन करने दो।

पण्डित नेहरु के मंत्रिमण्डल ने 1947 में सोमनाथ के पुनरुध्दार का फैसला किया। लेकिन जनवरी 1948 में गांधीजी की हत्या हो गई।

दिसम्बर, 1950 में सरदार पटेल ने अंतिम सांस ली। इन दो दिग्गजों की मृत्यु के बाद पण्डित नेहरु के रुख में बदलाव आया। 1951 के शुरु में मंत्रिमण्डल की एक बैठक के बाद पण्डितजी ने तत्कालीन खाद्य एवं कृषि मंत्री, डा. मुंशी को बुलाकर कहा: ”मैं नहीं चाहता कि आप सोमनाथ मंदिर के पुनरुध्दार की कोशिश करें। यह हिंदू नवजागरणवाद है।”

जबाव में कन्हैयालाल मुंशी ने एक शब्द नहीं बोला। वह वापस आए और एक लम्बा जबाव तैयार किया जिसका मूल पाठ उनकी प्रसिध्द पुस्तक पिलग्रमिज टू फ्रीडम में उल्लिखित है। डा. मुंशी ने पण्डित नेहरु को लिखा:

कल आपने हिंदू नवजागरणवाद का उल्लेख किया था। मंत्रिमण्डल में आपने मेरे सोमनाथ से जुड़ाव पर उंगली उठाई। मुझे खुशी है कि आपने ऐसा किया, क्योंकि मैं अपने किसी भी विचार या कार्य को अप्रकट नहीं रखना चाहता हूं। मैं आपको विश्वास दिला सकता हूं कि भारत का समस्त जनमानस आज भारत सरकार द्वारा प्रायोजित सोमनाथ के पुनरुध्दार की योजना से बहुत प्रसन्न है। इतनी प्रसन्नता उसे अब तक हमारे द्वारा किए गए या किए जा रहे किसी भी कार्य से नहीं मिली है।‘

सोमनाथ के पुनरुध्दार से जुड़े सामाजिक सुधार के पहलू पर जोर देते हुए मुंशी ने आगे लिखा-

”मंदिर के द्वार हरिजनों के लिए खोलने के निर्णय की हिंदू समुदाय के कट्टरपंथी वर्ग की ओर से कुछ आलोचना जरुर हो रही है, लेकिन ट्रस्ट के करारनामे में स्पष्ट कर दिया गया है कि मंदिर के द्वार न केवल हिंदू समुदाय के सभी वर्गों के लिए खुले हैं, बल्कि सोमनाथ मंदिर की प्राचीन परंपरा के अनुसार, वह गैर-हिंदू दर्शकों के लिए भी खुला है। कई रीति-रिवाजों को मैं अपने व्यक्तिगत जीवन में बचपन से ही तोड़ता रहा हूं। हिंदूधर्म के कुछ पहलुओं को जोड़ने के लिए मैंने अपने साहित्यिक और सामाजिक कार्य के माध्यम से अपनी ओर से विनम्र प्रयास किया है-इस विश्वास के साथ कि ऐसा करके ही आधुनिक परिस्थितियों में भारत को एक उन्नत और शक्तिशाली राष्ट्र बनाया जा सकता है।”

मुंशी ने एसे मार्मिक शब्दों के साथ पत्र का समापन किया जिन्हें हमें सदा के लिए सॅभालकर रखना चाहिए-

‘भविष्य को ध्यान में रखकर वर्तमान में कार्य करने की शक्ति मुझे अतीत के प्रति अपने विश्वास से ही मिली है। भारत की स्वतंत्रता अगर हमें ‘भगवद्गीता‘ से दूर करती है या हमारे करोड़ों लोगों के इस विश्वास या श्रध्दा को तोड़ती है, जो हमारे मंदिरों के प्रति उनके मन में है ओर हमारे समाज के ताने-बाने को तोड़ती है तो ऐसी स्वतंत्रता का मेरे लिए कोई मूल्य नहीं है। सोमनाथ मंदिर के पुनरुध्दार का जो सपना मैं हर रोज देखता आया हूं, उसे पूरा करने का मुझे गौरव प्राप्त हुआ है। इससे मेरे मन में यह एहसास और विश्वास उत्पन्न होता है कि इस पवित्र स्थल के पुनरुध्दार से हमारे देशवासियों की धार्मिक अवधारणा अपेक्षाकृत और शुध्द होगी तथा इससे अपनी शक्ति के प्रति उनकी सजगता और भी बढ़ेगी, जो स्वतंत्रता के इन कठिनाई भरे दिनों में बहुत आवश्यक है।”

यह पत्र पढ़कर जाने-माने प्रशासनिक अधिकारी, वी.पी. मेनन-जिन्होंने देशी रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल की भरपूर मदद की थी-ने मुंशी को पत्र में लिखा-‘मैंने आपके इस अद्भूत पत्र को देखा है। जो बातें आपने पत्र में लिखी हैं, उनके लिए मैं तो जीने, और आवश्यकता पड़ने पर मरने के लिए भी तैयार हूं।‘

टेलपीस (पश्च्यलेख)

जब सोमनाथ मंदिर तैयार हो गया तो डा. के.एम. मुंशी ने प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद से सम्पर्क कर अनुरोध किया कि वे मंदिर का लोकार्पण करें तथा ज्योर्तिलिंगम स्थापित करने का विधि-विधान भी करें। उन्हें आशंका थी कि राजेन्द्र बाबू इसके लिए शायद तैयार न हों। आखिरकार, राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री से मुंशी के पत्र व्यवहार की जानकारी थी।

उनके लिए प्रसन्नता की बात यह हुई कि डा. राजेन्द्र प्रसाद तैयार हो गए। उन्होंने कहा ”यदि मुझे किसी मस्जिद या चर्च के लिए भी निमंत्रण मिलता तो मैं यही करता। क्योंकि यह भारतीय सेक्युलरिज्म का मूल है। हमारा देश न तो अधार्मिक है और नहीं धर्म-विरोधी।”

पण्डित नेहरु ने राष्ट्रपति के निर्णय का विरोध किया। लेकिन राजेन्द्र बाबू ने पण्डितजी के विरोध को दरकिनार रख अपना वायदा पूरा किया।

3 Responses to “डा. मुंशी का पण्डित नेहरु को ऐतिहासिक पत्र: वी.पी. मेनन ने कहा ‘एक अद्भुत’”

  1. Anil Gupta

    Sardar Vallabhbhai Patel Suppressed History of India
    Posted on December 15, 2012 by Venkata Ramanan

    2 Votes

    I&B have uploaded excellent Videos of Inspiring Speeches,Music and rare documentaries of the Independence Struggle in YouTube .

    Some:

    Sardar Vallabhbhai Patel’s Speech delivered on 12th February 1949

    Sardar Vallabahbhai Patel, the Iron Man of India is in fact the Architect of Modern India.

    Like Rajaji(C.Rajagopalachari0 was a Statesman, who did not bother popularity.

    He did what was Right was for the Country and obviously not popular as he did not play to the Gallery.

    He was a Man who called Nehru wrong when Nehru was wrong when none was prepared to point it out scared of the charisma of Nehru.

    My dear Jawaharlal,

    Ever since my return from Ahmedabad and after the cabinet meeting the same day which I had to attend at practically fifteen minutes’ notice and for which I regret I was not able to read all the papers, I have been anxiously thinking over the problem of Tibet and I thought I should share with you what is passing through my mind.

    I have carefully gone through the correspondence between the External Affairs Ministry and our Ambassador in Peking and through him the Chinese Government. I have tried to peruse this correspondence as favourably to our Ambassador and the Chinese Government as possible, but I regret to say that neither of them comes out well as a result of this study. The Chinese Government has tried to delude us by professions of peaceful intention. My own feeling is that at a crucial period they managed to instill into our Ambassador a false sense of confidence in their so-called desire to settle the Tibetan problem by peaceful means. There can be no doubt that during the period covered by this correspondence the Chinese must have been concentrating for an onslaught on Tibet. The final action of the Chinese, in my judgement, is little short of perfidy. The tragedy of it is that the Tibetans put faith in us; they chose to be guided by us; and we have been unable to get them out of the meshes of Chinese diplomacy or Chinese malevolence. From the latest position, it appears that we shall not be able to rescue the Dalai Lama. Our Ambassador has been at great pains to find an explanation or justification for Chinese policy and actions. As the External Affairs Ministry remarked in one of their telegrams, there was a lack of firmness and unnecessary apology in one or two representations that he made to the Chinese Government on our behalf. It is impossible to imagine any sensible person believing in the so-called threat to China from Anglo-American machinations in Tibet. Therefore, if the Chinese put faith in this, they must have distrusted us so completely as to have taken us as tools or stooges of Anglo-American diplomacy or strategy. This feeling, if genuinely entertained by the Chinese in spite of your direct approaches to them, indicates that even though we regard ourselves as the friends of China, the Chinese do not regard us as their friends. With the Communist mentality of “whoever is not with them being against them”, this is a significant pointer, of which we have to take due note. During the last several months, outside the Russian camp, we have practically been alone in championing the cause of Chinese entry into UN and in securing from the Americans assurances on the question of Formosa. We have done everything we could to assuage Chinese feelings, to allay its apprehensions and to defend its legitimate claims in our discussions and correspondence with America and Britain and in the UN. Inspite of this, China is not convinced about our disinterestedness; it continues to regard us with suspicion and the whole psychology is one, at least outwardly, of scepticism perhaps mixed with a little hostility. I doubt if we can go any further than we have done already to convince China of our good intentions, friendliness and goodwill. In Peking we have an Ambassador who is eminently suitable for putting across the friendly point of view. Even he seems to have failed to convert the Chinese. Their last telegram to us is an act of gross discourtesy not only in the summary way it disposes of our protest against the entry of Chinese forces into Tibet but also in the wild insinuation that our attitude is determined by foreign influences. It looks as though it is not a friend speaking in that language but a potential enemy.”

    Nehru paid for his folly when China invaded India in 1962 and Nehru died a disillusioned Man.

    Liberation Of Hyderabad from The Nizam.(Daily pioneer)-How Vindictive was Nehru?
    Sardar Vallabhbhai Patel, the then Deputy Prime Minister and Home Minister of India, whose 137th birth anniversary is on October 31, was insulted, humiliated and disgraced by the then Prime Minister, Pandit Jawaharlal Nehru, during a Cabinet meeting. “You are a complete communalist and I’ll never be a party to your suggestions and proposals,” Nehru shouted at Patel during a crucial Cabinet meeting to discuss the liberation of Hyderabad by the Army from the tyranny of the Razakkars, the then Nizam’s private army.
    Sardar Patel

    Sardar Vallabhbhai Patel
    “A shocked Sardar Patel collected his papers from the table and slowly walked out of the Cabinet room. That was the last time Patel attended a Cabinet meeting. He also stopped speaking to Nehru since then,” writes MKK Nair, a 1947 batch IAS officer, in his memoirs “With No Ill Feeling to Anybody”. Nair had close ties with both Sardar and VP Menon, his Man Friday.
    Though Nair has not written the exact date of the above mentioned Cabinet meeting, it could have happened during the weeks prior to the liberation of Hyderabad by the Indian Army. Operation Polo, the mission to liberate Hyderabad from the Nizam, began on September 13, 1948 and culminated on September 18. While Sardar Patel wanted direct military action to liberate Hyderabad from the rape and mayhem perpetrated by the 2,00,000 Razakars, Nehru preferred the United Nations route.
    Nair writes that Nehru’s personal hatred for Sardar Patel came out in the open on December 15, 1950, the day the Sardar breathed his last in Bombay (now Mumbai). “Immediately after he got the news about Sardar Patel’s death, Nehru sent two notes to the Ministry of States. The notes reached VP Menon, the then Secretary to the Ministry. In one of the notes, Nehru had asked Menon to send the official Cadillac car used by Sardar Patel to the former’s office. The second note was shocking. Nehru wanted government secretaries desirous of attending Sardar Patel’s last rites to do so at their own personal expenses.

    Views On Partition of India.

    Foresight in accepting Partition

    But the greatest of his foresights was shown by the way he dealt with the crisis created by Muslim League after it entered the Interim Government on 25th October 1946. He was the first to realize that the League had created a vertical divide in the entire governmental machinery on a communal basis, up from a Member (Minister) down to the lowest peon. There was a virtual inter-Departmental (the term Ministry was used only after Independence) war on the Raisina Hill. The League was making a determined attempt to demonstrate that Hindus and Muslims could not work together, to strengthen the notion that partition of the country was unavoidable. In fact, the League had already, in a way, created several Pakistans on Indian soil, if one looked at the working of the Departments of Finance, Industry, Health, Posts & Air, which were under League Members; Liaqat Ali, the Finance Member, presented the Finance Bill (Central Budget) of 1947 to the Central Assembly without showing it in advance to Nehru, who was the leader of the Interim Government.

    “How can the country be governed in such a divided way, now and in future?” Patel is reported to have wondered. Nehru was angry with the League, but it was Patel whose prescience helped him and the country to realize the inevitability of the Partition. It was neither defeatism nor a hurry to capture power, as has been imputed to both of them in subsequent years. It was nothing short of foresight and wisdom which Poet Tulsi Das had advocated in the 16th century in this famous verse: “Budh ardh tajain, lukh sarvasa jata” (the wise give up half when they see the whole is going).(dadinani.com)(PC Modi)

    Patel was intensely loyal to Gandhi and both he and Nehru looked to him to arbitrate disputes. However, Nehru and Patel sparred over national issues. When Nehru asserted control over Kashmir policy, Patel objected to Nehru’s sidelining his home ministry’s officials.[63] Nehru was offended by Patel’s decision-making regarding the states’ integration, having neither consulted him nor the cabinet. Patel asked Gandhi to relieve him of his obligation to serve, knowing that he lacked Nehru’s youth and popularity. He believed that an open political battle would hurt India. After much personal deliberation and contrary to Patel’s prediction, Gandhi on 30 January 1948 told Patel not to leave the government. A free India, according to Gandhi, needed both Patel and Nehru. Patel was the last man to privately talk with Gandhi, who was assassinated just minutes after Patel’s departure.[64] At Gandhi’s wake, Nehru and Patel embraced each other and addressed the nation together. Patel gave solace to many associates and friends and immediately moved to forestall any possible violence.[65] Within two months of Gandhi’s death, Patel suffered a major heart attack; the timely action of his daughter, his secretary and nurse saved Patel’s life. Speaking later, Patel attributed the attack to the “grief bottled up” due to Gandhi’s death.[66]

    Criticism arose from the media and other politicians that Patel’s home ministry had failed to protect Gandhi. Emotionally exhausted, Patel tendered a letter of resignation, offering to leave the government. Patel’s secretary persuaded him to withhold the letter, seeing it as fodder for Patel’s political enemies and political conflict in India.[67] However, Nehru sent Patel a letter dismissing any question of personal differences and his desire for Patel’s ouster. He reminded Patel of their 30-year partnership in the freedom struggle and asserted that after Gandhi’s death, it was especially wrong for them to quarrel. Nehru, Rajagopalachari and other Congressmen publicly defended Patel. Moved, Patel publicly endorsed Nehru’s leadership and refuted any suggestion of discord. Patel publicly dispelled any notion that he sought to be prime minister.[67] Though the two committed themselves to joint leadership and non-interference in Congress party affairs, they would criticise each other in matters of policy, clashing on the issues of Hyderabad’s integration and UN mediation in Kashmir. Nehru declined Patel’s counsel on sending assistance to Tibet after its 1950 invasion by the People’s Republic of China and ejecting the Portuguese from Goa by military force.[68]

    When Nehru pressured Dr. Rajendra Prasad to decline a nomination to become the first President of India in 1950 in favour of Rajagopalachari, he thus angered the party, which felt Nehru was attempting to impose his will. Nehru sought Patel’s help in winning the party over, but Patel declined and Prasad was duly elected. Nehru opposed the 1950 Congress presidential candidatePurushottam Das Tandon, a conservative Hindu leader, endorsing Jivatram Kripalani instead and threatening to resign if Tandon was elected. Patel rejected Nehru’s views and endorsed Tandon in Gujarat, where Kripalani received not one vote despite hailing from that state himself.[69] Patel believed Nehru had to understand that his will was not law with the Congress, but he personally discouraged Nehru from resigning after the latter felt that the party had no confidence in him.[70](Wiki)

    http://www.friendsoftibet.org/main/sardar.html

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