घर में बना आंवले का था,
अहा! मुरब्बा खट मिट्ठा।
बांध- बांध तारीफों के पुल,
सबने कहा बहुत अच्छा।
यह कमाल है दादीजी के,
सुगढ़ रसीले हाथों का।
प्यार भरी रस भरी जलेबी,
जैसी मीठी बातों का।
पापा ने छोटी बरनी का,
साफ कर दिया है फट्टा।
दादाजी भी “और मुरब्बा”,
“और मुरब्बा” चिल्लाते।
नज़र बचाकर एक -एक कर,
कई “पीस”हथिया लाते।
कहते हैं सौ साल जिये थे,
खाकर यह उनके अब्बा।
तीन बरनियों भरा मुरब्बा,
सात दिनों में खा डाला !
दादी बोली , पड़ा न जाने,
कैसे लोगों से पाला।
रोज -रोज इतना खट मिट्ठा,
खाना क्या होता अच्छा ?

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