मेरे पिता

अपने पिताजी के बारे में लोगों के मुँह से सुनता रहा था , जानता रहा था कि उन्हें प्रतिष्ठा अर्जित करने का गौरव प्राप्त हुआ है। पर उनके मुँह से या उनके सहयोगियों, मित्रों के मुँह से कभी उन लोगों की गतिविधि के बारे में कुछ नहीं सुना था। हमारे सामने वे कुछ इन बिन्दुओं पर बोलते भी नहीं थे। अन्य लोगों से बस इतना सुना था कि जब कोई बीमार, जरूरतमंद उनको याद करता तो वे उसकी मदद करने पहुँच जाते। पैसे तो उनके पास होेते नहीं थे कि आर्थिक सहायता किसीकी करते, लेकिन यह तो हमने देखा था कि परिचित लोग रोगग्रस्त होते तो डॉक्टर के पास न जाकर इनके पास आते और ये डॉक्टर लेकर पहुँच जाते। हमें तो यह भी नहीं पता था कि उनका जन्म कब हुआ और उन्होंने किस साल ग्रेजुवेशन किया। शायद इसकी वजह हमलोगों में भी इन बिन्दुओं पर जानकारी पाने के कौतूहल की कमी रही होगी। उनके बारे में हमें लोगों के मुँह से समय समय पर कुछ टिप्पणियाँ सुनने को मिला करती थीं, इन टिप्पणियों ने उनकी छवि और व्यक्तित्व के बारे में तस्वीर की रूपरेखा उभरी है। अक्सर ऐसा हुआ करता कि लोग हमें पिताजी के बारे में अपने तजुर्बे सुनाते।
मेरे मित्र के बड़े भाई ने अपना तजुर्बा शेयर किया था। एक बार उन्हें लगातार दस्त आ रहे थे, तब मेरे पिताजी ने अपने हाथों से उनका बदन और कपड़े साफ किए थे। उन दिनों दस्त-कै की संक्रामक बीमारियाँ आम बात थी। पिताजी ऐसे अवसरों पर मरीजों की सेवा करने को मुस्तैद रहा करते थे।
इसी तरह मुझे मालूम हुआ कि उनकी पढ़ाई बांग्ला माध्यम के स्कूल में हुई थी. और उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा में कलकत्ता विश्वविद्यालय में बांग्ला में प्रथम स्थान अर्जित किया था। वे फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे।
हमारे पिता के जीवन में कठिनाइयों का अभाव कभी भी नहीं रहा ; कठिनाइयाँ तो औसत आदमी के जीवन में भी हुआ ही करती हैं । उनको तो औसत से काफी अधिक प्रतिकूलता से वास्ता पड़ता रहा । शैशवावस्था में ही मातृहारा हुए, पिता ने दूसरी शादी की और वे अपने घर और रिश्तेदारों के बीच पले-बढ़े । मुझे नहीं मालूम कि उनमें आधुनिक शिक्षा के लिए प्रवृत्ति कैसे उभड़ी। कैसे अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए संसाधन उपलब्ध किए. और कदाचित् अपने अनजानते ही आधुनिक शिक्षा ग्रहण करने और पैतृक पेशे से विमुख होने का निर्णय लेकर पारम्परिक समाज द्वारा प्रदत्त सुरक्षा कवच धारण करने से अपने को वञ्चित कर लिया —— । परम्परा से उपलब्ध लाभ से अपने को वञ्चित करने के बाद भी समाज की पारम्परिक धारा से जुड़े रहे । आजीविका के साथ अपने आदर्श का समन्वय करके स्कूल-शिक्षक बने ।, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से अछूते रहने के कारण अर्थोपार्जन की ओर से उदासीनता रही । Aspiration ambition
उनके मित्र तत्कालीन स्वदेशी आन्दोलन और नई रोशनी से प्रभावित थे। अपने समाज में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करने के उद्देश्य से उन्होंने हिन्दी माध्यम से पढ़ाई सुगम करने के लिए स्कूल की स्थापना की। उनके पास संसाधन नहीं थे, अपने अपने पास से पैे इकट्ठा करने के साथ वे पैट्रॉन की तलाश में रहते जो स्कूल संचालन का ज़िम्मा ले ले। उनका स्कूल लोअर प्राइमरी से अपर प्राइमरी और अन्त में मिड्ल इंग्लिश स्कूल में उन्नत हुआ। उस समय मेरे पिता कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीए पास कर चुके थे और प्रतिष्ठित सरकारी पदों पर नियुक्ति की संभावनाएँ थीं. परन्तु उन्होंने मिड्ल स्कूल के संचालन का दायित्व लेते हुए हेडमास्टर के पद का भार लिया था। उनके इस निर्णय के साथ ही उनकी सांसारिक सम्भावनाओं को विराम लग गया। ऊपर से पारम्परिक पैतृक पेशे को त्याग करने का फैसला कर लिया। अब उनका परिचय मास्टर साहब का ही रह गया। वे अपने मित्रों की तरह खादी पहनते रहे । लगता है कि स्टैटस के प्रति उनमें कोई आग्रह नहीं था।
कभी कभार दो तीन ही अवसर आए होंगे जब उनके मुँह से उनके बारे में कुछ जाना। एक बार उन्होंने कहा था, “ I was not ambitious. पढ़ाई में मेरा लक्ष्य 30 नम्बर पाने का रहता था, जो पास करने के लिए न्यूनतम उपलब्धि थी। परीक्षा के पास आने पर लगा कि 30 कहीं 29 हो जाए तो मुश्किल होगी। तब अतिरिक्त पढ़ाई करने की कोशिश की थी।” मैं अपने अवलोकन से इस बात में उनको समझ सकता हूँ. He was not ambitious, though he had aspirations. उनको आदर्शवादी व्यक्ति कहा जा सकता है, जो दुनियावी मिज़ाज से मुक्त हो. जो अपनों के लिए. परायों के लिए अपने आपको वंचित करे। उनका अपना संचय कुछ भी नहीं था। सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन का सहारा भी नहीं था।
career opportunities के प्रति उदासीन ।
बाधाएँ तथा दुर्घटनाएँ उनकी जीवन-यात्रा में नियमित अन्तराल पर आती रहीं ; सन्तानों की अकाल-मृत्यु से भी साबिका पड़ता रहा, आर्थिक तनाव उनके चिरसंगी रहे । फिर भी वे न तो अन्धविश्वासी हुए, न ही कभी विधाता के पास अभियोग किया । जब कि नियम से दैनिक पूजा-प्रार्थना करते रहे थे । सबसे अनोखी बात थी कि कभी किसीकी शिकायत नहीं की उन्होंने ; अपना औचित्य स्थापित करने के लिए भी नहीं । ईश्वर के साथ-साथ मनुष्य का भी सम्मान करते रहे थे वे ।
वे काफी रोबीले और प्रतिष्ठित व्यक्तित्व से सम्पन्न रहे थे, स्नेहशीलता तथा क्षमा कर पाने का अद्भुत ज़ज़्बा था उनमें। सहज विश्वास तथा मानवीय मूल्यों पर आस्था थी । इसीलिए पेन्शन का आश्वासन नहीं होने के बावजूद जीवन की शाम के लिए कोई संचय नहीं किया था उन्होंने ।
“आदमी ने समाज बनाया अपने को सुरक्षा और सुविधा प्रदान करने के लिए । इसलिए समाज के नियमों का सम्मान करना आदमी के लिए लाज़िमी है ; ऐसा करके हम व्यक्ति को सुयोग और अवसर देते हैं तथा समाज को यह शक्ति प्रदान करते हैं कि वह हमारी हिफ़ाज़त कर सके । पर साथ ही ऐसे नियमों का विरोध तो होना ही चाहिए जो अब अनुपयोगी और हानिकारक हो गए हैं और आदमी को घुटन तथा विकृति से ग्रस्त करते हों।”
ये बातें उन्होंने मुझसे तब कही थीं जब मुझे अपने प्रगतिशील कदम के कारण अपने भाइयों से अवरोध और अपमान झेलने की स्थिति का सामना था । महत्वपूर्ण बात यह थी कि वे मेरे इन्हीं भाइयों के साथ रहते थे, और वे उनके ऊपर दबाव बनाए रहते थे ताकि मेरे विरुद्ध उनके अभियान में दृढ़ता आए । मात्र भावुल स्नेह नहीं, आधुनिकता तथा, संगति से युक्त विचार तथा मूल्य-बोध उनका पथ निर्धारण करते थे । वे अपने विश्वासों और मान्यताओं के लिए कष्ट वरण करते रहे थे।

खैर इस पृष्ठभूमि में जब मैंने उनके सम्बन्ध में उत्तरसूरियों के लिए जानकारी उपलब्ध कराने के खयाल से लिखना तय किया तो मेरे पास कोई सामग्री ही नहीं थी। कोई ग्लैमर उनके व्यक्तित्व में नहीं, कोई उपलब्धि नहीं । । मैं परेशान होता रहा। क्या लिखूं, मैं कैसा हूं कि जिनको इतने लोगों की अकुण्ठ श्रद्धा मिली, जिन्होंने इतनी विपरीत स्थितियों के सामने अपने को सम्मान से खड़ा रखा, उनका बेटा होने के बावजूद उनके बारे में एक पन्ना लिख नहीं पा रहा हूँ.. तब सामने रखे कागज़ पर अपनी परेशानी को एक लाइन में व्यक्त किया वह तो साधारण आदमी थे। उस समय मैं अँग्रेजी में लिख रहा था तो इस एक वाक्य के बाद सोचता गया कि उनमें क्या लक्षण थे
वे स्वयम् भी किसी से तुलना करना पसन्द नहीं करते ते और जहाँ तक उनकी मित्र मण्डली की बात है कभी किसीने किसीको छोटा बड़ा नहीं बताया, न कोई श्रेय लिया

मेरे पिता दैनिक अखबार पढ़ा करते थे। अंगरेजी की Amtita Bazar Patrika और हिन्दी का आर्यावर्त। अन्तिम दिनो में मोतियाबिन्द के कारण अब पढ़ने में दिक्कत आ गई थी। चारपाई पर लेटे रहा करते थे वे। बब्बू नौ साल की उम्र का था। मैंने पिताजी से पूछा, क्या बब्बू आर्यावर्त पढ़कर सुनाएगा उन्हें? वे उत्सुक हुए। वे चारपाई पर लेटे रहते और बब्बू उनके सिरहाने बैठकर आर्यावर्त का समाचार पढ़कर उन्हें सुनाया करता। वे बहुत ही खुश हुए। मुझसे बोले कि कितना सुन्दर पढ़ता है। Amtita Bazar Patrika भी पढ़ पाता तो कितना अच्छा होता। इसका खयाल रखना। देखते हो न इसकी आँखें। बांग्ला में कहते हैं न भासा भासा चोख.। एंजेल लगता है।

मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए बब्बू का चयन होने के बाद मैंने महसूस किया था कि हमारे प्रति अपनों के सरोकार में काफी फर्क आया था। मैंने महसूस किया था कि इस फर्क का कारण उनकी यह समझ थी कि डॉक्टर लोगों की आमदनी बहुत ज्यादा होती है। मुझे अटपटा सा लगा था। उससे मैंने अपनी यह भावना शेयर करते हुए अपने मालिक का हवाला दिया था । वे काफी सम्पन्न व्यवसायी होते हुए भी मेरा काफी सम्मान करते थे। मैंने कहा था कि तुम कितना भी कमा लोगे, लालबाबू से अधिक नहीं कमा सकोगे। इसलिए तुम ऐसा करो कि मेडिकल साइन्स को कुछ दे पाओ। आज यह बात प्रासंगिक लगती है। संयोग से उसके दो मामा-बच्चू और मुन्नू- ( डाक्टर शंकरनाथ झा और डाक्टर शशिनाथ झा) उसी कॉलेज में उससे सिनियर थे। उनका स्नेहपूर्ण मार्ग निर्देश उसे सहज रूप से उपलब्ध रहा। उसके विकास में दोनो मामा का सार्थक योगदान रहा है।
देवघर के वृहत्तर समाज से जुड़ाव प्रेरणा देता रहा है। सन्दर्भ और प्रासंगिकता से व्यक्तित्व रुप लेता है। इसका कोई विकल्प नहीं हो सकता। डॉ शिवनारायण सिंह उसके रोल मॉडल थे। उनका स्नेह और आशीर्वाद उसे हमेशा मिलता रहा था।

पहला वाक्य था। He was a humble man, इसके बाद दूसरा वाक्य आया। What was special about him? फिर एक एक कर वाक्य उभड़ते गए और तस्वीर बनती गई।
फिर इसे हिन्दी में बदलने का खयाल आया। पहले मुश्किल लगता रहा। फिर एक परिचित को दिया तो उन्होंने सुझाया कि He की जगह तुम कर दूँ। तो फिर हिन्दी में तस्वीर बनी। सीवान के हमारे एक वरिष्ठ मित्र ने इसे कविता बतलाया तो मैं उत्साहित हो गया और गर्भनाल के आत्मारामजी को जब भेजा तो श्रेय उनका है कि सुन्दर ढंग से कम्पोज कर प्रस्तुत कर दिया।
मेरा टास्क परिभाषित था। दाम्पत्य जीवन के माध्यम से विधवा विवाह के औचित्य को स्थापित करना,। दवघर के समाज से विच्छिन्न रहकर यह नहीं हो सकता था। नुनुवा ने इस टास्क को सम्पादित करने में मह्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाई थी। जब कि कायदे से उनका सहयोग मिलने की सम्भावना नहीं होनी चाहिए था, बल्कि उनसे प्रतिरोध मिलना चाहिए था। हमारे कदम से उनपर प्रतिकूल असर पड़ा था । पर फिर भी उन्होने हमें समर्थन और सहायता दी। विरोधियों के सामने सैद्धान्तिक मोर्चा सँभाला उन्होंने। मेरे भाइयों पर पूरी तरह निर्भर होने के बावजूद उनका असहयोग भी झेला। उनका विवेक उनका बल था। उनको आधुनिक कहना सही होगा, क्योंकि वे परम्परा में पगे होने के साथ साथ परिवेश से आनेवाले संकेतों के प्रति संवेदनशील थे। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था, मनुष्य ने अपने को सुरक्षित और सशक्त करने के लिए समाज बनाया। समाज को रुप देने के लिए सामाजिक नियम बनाए। इसलिए समाज के अनुशासन को माना जाना चाहिए । ताकि समाज को सम्मान रहे और वह अपनी भूमिका का निर्वहन कर सके। और व्यक्ति की हिफ़ाज़त कर सके। लेकिन जब समाज के नियम मनुष्य की रक्षा करने की जगह उसको नुकसान पहुँचाने लगें तो इन नियमों के शासन को अस्वीकार करना ही चाहिए।

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