मेरा गाँव

रामकिशोर दयाराम पंवार रोंढावाला

किसी बैरी की नज़र लग गई मेरे गांव को
खंजरी की थाप पर झूमने वाले गांव में खंजर निकलने लगे

कहते है कि भारत गांवो में बसता है, अग्रेंजो ने भारत को गांव का देश कहा है। भारत के गांवो को करीब से जानने वाले
अग्रेंजी लेखक एवं जाने माने साहित्यकार जिमी थामस कहते है कि पूरे देश को खोजना है तो भारत के किसी गांव में चले
आए यहां पर पूरा देश आपको दिखाई देगा। विभिन्न संस्कृति एवं धर्मो रंग रूपो के बीच भारत के गांव सदियों से अपनी
पहचान को बनए रखे थे लेकिन लगता है इन गांवो को अब अपनी पहचान को बचाए रखने की जंग लडऩी पड़ेगी। पश्चिमी
संस्कृति ने गांव की आम धारणा में अमूल – चूल परिर्वतन ला दिया है। जहां आज से पचास साल पहले पूरे गांव में एक
रेडियों नहीं होता था आज उस गांव को मोबाइल के फोर जी ने अपने आगोश में जकड़ रखा है। अपने प्रेम और प्यार तथा
व्यापार में दखलदांजी न हो इसलिए कारोबारी मां और बाप ने बेटे के हाथो में मोबाइल थमा दिया है। नियति का खेल
देखिए जो ढंग से अपना कच्छा नहीं पहन सकता आज वही बच्चा आपके मोबाइल पर गेम खेल रहा है। खिचड़ी और बेमेल
परिवेश ने गांव को कहीं का नहीं छोड़ा है। गांव के लोग बदलने लगे है लेकिन मिटट्ी के मकानो का गांव आज भी अपने
उसी परिवेश पर कायम है।
संत तुकड़ो जी महाराज के जहां पड़े थे पांव
आज वहां खंजरी नहीं खंजर निकलने लगे
संतो की भूमि महाराष्ट्र एवं मध्यप्रदेश का सीमावर्ती जिला अमरावति के यावली गांव में जन्मे राष्ट्रीय संत तुकड़ो जी
महाराज (1९०९ से १९६८) सी पी एण्ड बरार स्टेट का हिस्सा रहे बैतूल जिले के एक छोटे से सम्पन्न किसान गांव रोंढ़ा में
आए थे। विठठ्ल रूक्मिणी के भजनो को मराठी मे गाते और मदमस्त होकर खंजरी बजाते तुकड़ो जी महाराज महाराष्ट्र के
एक और महान राष्ट्रीय संत विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन से जुड़े थे। यही घटनाक्रम कहीं न कहीं उनके ग्राम रोंढ़ा तक
पहुंच का कारण बना। संत विनोबा भावे अपने भूदान आन्दोलन के चलते करजगांव जाते समय रोंढा रूके थे। संत तुकड़ो जी
महाराज 19 50 से 60 के दशक में मेरी जन्मभूमि ग्राम रोंढ़ा आए थे। भाखर (रोटी) के एक टुकड़े की वजह से तुकड़ो
कहलाए इस संत ने पूरे गांव के लोगो की दिनचर्या में सुबह – शाम खंजरी की थाप पर उनके भजनो से जोड़ दिया, जो गांव
संत तुकड़ो जी महाराज के भजनो की भक्ति में डूब चुका था , आज वहीं गांव बैतूल बाजार थाना के मानचित्र में सबसे बड़े
झगडालू गांव के नाम से दर्ज है। चारो ओर लहलहाते खेतो के बीच मेहनत कश मजदूरो एवं किसानो का सीधे तौर पर
अपने मराठी भाषा के स्वरचित महाकाव्य में जिक्र नहीं है पर गांव की दशा एवं दिशा का जिक्र सुनने को मिलता है।
मारपीट हत्या जैसे संगीन अपराधो की जन्मभूमि
बदनाम हो चुके पूर्ण रूप से साक्षर गांव का अपना दर्द….!
गांव के बारे में अब ऐसी आम धारणा बन चुकी है कि “बावई – दभेरी बैतूल बाजार का थाना, जिसको भी मार खाना रोंढ़ा
में आना “! एक सच यह भी है कि बैतूल जिले में सबसे अधिक पढ़े लिखे साक्षर गांव के रूप में पहचान बनाने वाले ग्राम
रोंढ़ा की आबादी दो हजार से अधिक बढ़ नहीं सकी है। गांव के साप्ताहिक बाजार मे गांव के कुछ लोगो द्वारा की गई
सामुहिक हत्या के बाद पूरे गांव को जैसे किसी की नज़र लग गई। गांव में धीरे – धीरे हत्या, चोरी, बलात्कार, जैसे संगीन
अपराधो ने घुसपैठ कर दी। हर तीन साल में एक नरबलि ने गांव की पहचान ही बिगाड़ दी। लोग इसी डर से गांव को आने
कतराने लगे। गांव से सरकारी नौकरी में गए 90 प्रतिशत लोग वापस गांव लौट कर नहीं आए। गांवो को अपराध और

अपराधी ने चारो ओर से अपने आगोश में जकड़ रखा है। मारपीट और घरेलू हिंसा के चलते बैतूल जिले के बैतूल बाजार
थाना का यह गांव थाना क्षेत्र का सर्वाधिक अपराध जनक गांवो में शुमार हो गया।
रूपलाल के गांव के गुड की राब से
कुंजीलाल के गांव का जीवन यापन
चारो ओर लहलहाते खेत और खलिहानो से घिरे गांव में अब चारो ओर पसरा सन्नाटा सुनाई पड़ता है। गांव के ८० से लेकर
९० फीट गहरे कुओं एवं नलकूपो के गिरते चल स्तर के चलते गांव का पीने तक का पानी अब रसातल में पहुंच गया है ,
आज यही कारण है कि जिस गांव के किसान को मध्यप्रदेश सरकार ने प्रदेश में सर्वाधिक उच्चकोटि का गेहूं उत्पादन करने पर
उत्पादक किसान डाँ केशोराव चौधरी को कृषि पंडित की उपाधी से अलकृंत किया था आज उसी कृषि पंडित के खेत उसके
ही बेटो का पेट नहीं भर पा रहे है और वे गांव से मजदूरी करने शहर आते है। बरसात की बेरूचाी के चलते बीते चार दशक
से गांव के खेत – खलिहानो की रबी और खरीफ की फसले एवं खेतो की छायादार अमराई तक दम तोड़ चुकी है। गांव के
बारे में तीन सौ साल पुराने एक ग्रंथ में इस बात का जिक्र है कि इस स्वर्गीय रूपलाल बढ़ई के इस गांव की गुड़ की राब से
पड़ौस के ज्योषिाचार्य एवं पीपली लाइव के चर्चित किरदार कुंजीलाल बढ़ई के गांव सेहरा की पूरी आबादी की जीवन
यापन हो जाता था। किसी समय में गन्ने के रस का गुड़ बनाते समय निकलने वाली राब की मात्रा इतनी अधिक होती थी
कि सेहरा गांव के लोग उसका धंधा करते थे। मेरी जन्मभूमि ग्राम रोंढ़ा का गन्ना और गुड़ पूरी दुनियां में अपनी मिठास रूपी
पहचान के लिए जाना जाता था। मुगलो के शासनकाल से लेकर अग्रेंजी हुकूमत की मालगुजारी की एक पहचान बने इस
गांव के सम्पन्न किसानो के नाम पर उनके खेतो की पहचान हुआं करती थी।
वायदा (लगान) में चली
गई चालिस बीघा जमीन
मालगुजारी मुगलो की देन थी लेकिन अग्रेंजो ने उतर भारत एवं राजस्थान के सम्पन्न परिवार के लोगो को गांवो की
मालगुजारी देकर उन्हे गांव के किसानो से वायदा (लगान) की वसूली समय पर चुका नहीं पाने के कारण गांव के किसानो
से उनकी जमीन छीन लेने का कुचक्र ने गांव के किसानो की कमर तोड़ दी। महामारी एवं अन्य प्राकृतिक प्रकोप के चलते
कई किसान समय पर लगान नहीं चुका सके जिसके चलते उनकी जमीने चार आना लगान न चुकाने से मालगुजारी में चली
गई। गांव रोंढ़ा के ही एक किसान स्वर्गीय भीख्या महाजन के नाम पर प्रसिद्ध ४० बीघा जमीन जो कि भीख्यावलि मात्र
चार आना वायदा (लगान) के समय पर न चुकाने के जुर्म में चली गई। उसी भीख्या के पोते मंहग्या आत्मज टुकड्या जी
भोभाट ने तीस साल तक कुआं खोद कर मात्र दो एकड़ जमीन का टुकड़ा लिया। संत टुकड़ो जी महाराज के मराठी महाकाव्य
में छुपे गांव के दर्द में इस जमीन का जिक्र सुनने को मिलता है। आज परिस्थिति यह है कि स्वर्गीय भीख्या जी महाजन की
चार पीढ़ी आज तक ४० बीघा जमीन को गवाने के बाद ४० एकड़ जमीन तक नहीं खरीद सकी है।
शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा योगदान
हर घर में सर्वाधिक सरकारी नौकरी !


पंवार समाज बाहुल्य बैतूल जिले के प्राचिन गांवो में से एक रोंढ़ा में चालिस साल पहले हर घर से दो से लेकर चार चौथी
पास से लेकर दसवी पास युवक सीधे सरकारी नौकरी पाने में अव्वल रहते थे। गांव में ऐसा कोई घर नहीं था जिस घर में
सरकारी विभागो में नौकरी में कार्यरत थे। जिस गांव ने बैतूल सहित आसपास के जिलो को सबसे अधिक गुरू जी , शिक्षक ,
मास्टर, पटवारी, पुलिस, नाकेदार, जमादार, थानेदार , ग्राम सेवक, दिए है आज वह गांव छुटभैया रंगदारो के नाम से
जाना पहचाना जाता है। गांव के वर्तमान हाल यह है कि रोजगार एवं सरकारी नौकरी के अभाव में गांव की जमीन बिकने
लगी है और गांव के जमीन के टुकड़ो को भाई बटवारे की मार ने तार – तार कर दिया है। बेहद चौकान्ने वाली बात तो यह
है कि गांव के पढ़े – लिखे युवको ने गांव से कोसो दूर जाकर अपनी पहचान बनाने में कसर नही छोड़ी। उतर प्रदेश के प्रेम के

प्रतीक शहर आगरा के हिन्दी विश्व विद्यालय में हिन्दी विषय के डीन के पद से सेवानिवृत हुए स्वर्गीय डाँ नाथुराम कालभोर
अपने बड़े भाई स्वर्गीय डाँ बकाराम कालभोर की सीख पर आगरा से अपने गांव तो लौट कर आ गए लेकिन बड़े भाई डाँ
बकराम कालभोर कों खो चुके थे। स्वर्गीय डाँ नाथुराम कालभोर जाने – माने हिन्दी के ज्ञाता होने के साथ – साथ वे
नामचीन भविष्य वक्ता भी थे।
रविन्द्र जैन के रूम पार्टनर को रास नहीं आया मुम्बईया
संगीत महाविद्यालय का प्राचार्य बना गांव का सरपंच
ग्राम रोंढा के एक युवक ने गांव से कोसो दूर खण्डवा में अपनी पहचान बनाई लेकिन स्वर्गीय गोपीनाथ कालभोर गांव से
जाने के बाद वापस गांव की ओर नहीं लौट सके। गांव के एक युवक रमेश पंवार की संगीत के प्रति रूचि एवं उसके द्वारा
वर्तमान में बंद पड़े संगीत विश्व विद्यालय के प्राचार्य बनने के पूर्व वे जाने – माने फिल्म संगीतकार स्व. रविन्द्र जैन के रूम
पार्टनर हुआ करते थे। स्व. रविन्द्र जैन उसे अपने संग मुम्बई ले जाना चाहते थे लेकिन रमेश पंवार उनके संग रह कर वे
संगीत के क्षेत्र में आगे की ओर बढऩे की बजाय पीछे की ओर लौट कर वापस अपने गांव रोंढा आ गए। सात सुरो पर अपनी
बेहतरीन पकड़ रखने वाले रमेश पंवार को अपने ही गांव की सरपंची रास नहीं आई और फिल्मी दुनियां का बेहतरीन
संगीतकार बनने वाला रमेश पंवार अपने ही गांव में अपनी पहचान को खो चुका है। रोंढा के बारे में कहा जाता है कि जिले
के इस प्राचिन गांव ने हर क्षेत्र में गांव के युवको को पहचान दिलाई। गांव के एक युवक बालराम डोंगरदीये ने एनीमेशन
फिल्मो का निमार्ण किया लेकिन कुछ कोस और लम्बा सफर तय करते उनका एक संगी साथी बिछड़ जाने के बाद पूरी
एनीमेशन फिल्म की टीम बिखर गई।
श्यामा भैया / विद्या भैया के
जगत प्रसिद्ध मिठठू “मामा “
जय जवान से लेकर जय किसान तक देने वाले इस गांव के सम्पन्न किसान स्वर्गीय मिठठू महाजन “मामा ” मध्यप्रदेश के पूर्व
मुख्यमंत्री पंडित श्यामाचरण शुक्ल से लेकर पूर्व केन्द्रीय मंत्री कांग्रेस नेता स्वर्गीय विद्याचरण शुक्ल के परिवार की कीचन
केबिनेट के सबसे विश्वसनीय सदस्य रहे। वे अकसर अविभाजित मध्यप्रदेश के छत्तिसगढ़ की राजधानी रायपुर में ग्राम रोंढ़ा
से गुड , गन्ना और लडडू लेकर शुक्ल परिवार के घर जाते थे। शुक्ल परिवार के घर की कीचन तक पैठ रखने वाले मिठठू
“मामा “को आज भी शुक्ल परिवार की तीसरी पीढ़ी याद करती है।
जिस पेड़ के नीचे से हाथी निकल जाता था
आज उसकी डालियाँ सर से टकरा जाती है
रोंढ़ा के बदलते स्वरूप ने गांव के विकास को ग्रहण लगाने का काम किया है। 1970 के दशक में गांव के खेतो तक पहुंचने
वाले जगदर डेम की नहरो की बाट देखते – देखते गांव के लोगो की आंखे पथरा जाता है। जगदर डेम जिस स्वरूप में बनना
था वह नहीं बन सका क्योकि कुछ सम्पन्न परिवारो की जमीने डूब में आ रही थी लेेकिन वर्तमान का जगदर बांध उसी गांव
के लिए पानी की पूर्ति नहीं कर पा रहा है। कुछ साल पहले तक गांव को पारसडोह से पानी देने की बाते कहीं गई लेेकिन
जब पारसडोह बन कर तैयार हुआ तो सूचि में रोंढ़ा गांव का नाम दूर – दूर तक नहीं था। अब ताप्ती जल के बावई गांव के
पास बनने वाले डेम से पानी देने की बाते कही जाने लगी है लेकिन ताप्ती जब तक गांव रोंढा पहुचेगी तब तक गांव की
जमीने बंजर हो जाएगी। गांव के तीन सौ साल पुराने चम्पा के पेड के नीचे से हाथी गुजर जाया करते थे, आज वहीं चम्पा
का पेड़ पैदल चलने वाले के सिर से टकरा जाता है।
पंचामृत से बंधा गांव को बेकारी
की महामारी से बुरी तरह से जकड़ा

जब महामारी का प्रकोप फैला था। हैजा , फ्लेग और चेचक की मार से पूरे के पूरे गांव के गांव काल के गाल में समा जाते
थेउस दौर में पूरे गांव की चतुर्थ सीमा को पंचामृत की लगातार बहती धार से बांध रखा था। गांव की जागृत एवं
चमत्कारिक खेड़ापति माता मैया ने पूरे गांव को चेचक फ्लेग जैसी महामारी के प्रकोप से बचाने का काम किया आज वह
माता मैया अपने गांव के भक्तो के पान – प्रसाद लेकर आने का इंतजार कर रही है। मेरा गांव कब और कैसे आस्तिक से
नास्तिक की ओर चल पड़ा पता ही नहीं चल सका। बीते चार दशक पहले गांव की रामलीला को देखने के लिए बारह गांव
के लोग आया करते थे और भोर होने के पहले रामलीला देखने के बाद वापस गांव की ओर लौट पड़ते थे। उस दौर में मेरे
गांव की पंगडड़ी आज की सड़को से बेहतर थी।
गांव के सप्तरंगी दयाराम
सातो एक साथ पढ़े लेकिन ….
बैतूल जिले के इस गांव की कहानी के पात्रो में सात एक हम नाम युवको के संघर्ष की कहानी है जो उन्हे गांव से दूर एक
मुकाम तक ले गई। एक ही गंाव के हम उम्र बाल सखा सहपाठी रहे गांव के सात दयाराम बैतूल जिले में एक छोटे से गांव
से निकल कर अपनी – अपनी योग्यता के अनुसार सरकारी नौकरी में चले गए। दयाराम चौधरी और एक दयाराम देवासे ने
सरकारी नौकरी लग जाने के बाद भी सरकारी नौकरी करने के बजाय अपने खेती – खलिहानो की सुध ली। इन्ही सात
दयाराम में से एक वन विभाग में नाकेदार की नौकरी के दौरान अपनी मधुर आवाज के चलते शम्मी कपूर एवं संगीताकार
नौशाद को काफी प्रभावित किया। १९६० से ७० के दशक में बैतूल जिले में स्थित सतपुड़ा के घने जंगलो में शिकार करने
आने वाले फिल्मी कलाकारो एवं संगीतकारो ने नाकेदार दयाराम स्व. मंहग्या पंवार को मुम्बई के सब्जबाग दिखाए लेकिन
माता – पिता एवं परिवार को छोड़ कर कहीं बाहर न जाने का उनका फैसला अटल रहा। बैतूल जिले के पोफल्या से लेकर
कनारी पाट और धाराखोह से लेकर अर्जून गोंदी के घने जंगलो में शेर की दहाड़े ही इन शौकिया शिकारियों को बैतूल तक
खींच लाती थी।
तीस साल तक हाथो से खोद डाले कुए
बैतूल जिले में सर्वाधिक कुए खोदने वाले
यूं तो बैतूल जिले में सबसे अधिक कुए खेतो और खलिहानो में खोदे जाते थे जिनकी गहराई 60 से 70 फीट तक होती थी।
स्व्र्गीय मंहग्या टुकड्या ने तीस सालो तक कुआं खोदने का काम किया। अपने रिश्तेदारो को साथ लेेकर कुआं खोदने वाले इन
8 – 9 लोगो के समूह ने सबसे अधिक कुओं को खोदने का उस समय में रिकार्ड बना रखा था लेकिन एक दिन अचानक ग्राम
रोंढ़ा में कुआं खोदते समय ऊपर की मचान टूट कर नीचे गिर जाने से 9 में से 7 लोगो की अकाल मौत हो गई। मात्र दो लोग
जो कुआं के बीच में बनी दिवार से चिपक जाने के चलते बच गए। मौत का ऐसा मंजर देखने के बाद पूरा गांव सवा महीने
तक हादसे से ऊबर नहीं सका। इस हादसे में जान गंवाने वालो में स्वंय कुआ खुदवाने वाला किसान का परिवार और खोदने
वाले मंहग्या टुकड्या के बहनोई एवं भांजे भी शामिल थे। उस हादसे ने स्व.मंहग्या टुकड्या पंवार की आत्मा को झकझोर
कर दिया। कुआं खोदनें के काम से तौबा करने के बाद दुसरो के खेतो – खलिहानो की जागली करने वाले इस व्यक्ति ने उस
मौत से बचने के बाद अपनी बाकी की चालिस साल की और जिदंगी जी।
आज भी दूर – दूर से आते लोग
चम्पा का पेड़ और नंदी को देखने
बैतूल जिले के इस गांव मे एक ही सफेद पत्थर से बने एक बैठे हुए नंदी पर कितना भी लम्बा व्यक्ति क्यों न हो वह नंदी पर
बैठने के बाद अपने दोनो पंावो को जमीन पर नहीं टिका सकता। गंाव के नंदी के बारे में कहा जाता है कि यह नंदी
जयपुर से बैलगाड़ी से तीन महीने में लाया गया। तीन सौ साल पुराने शिवालय गांव की एक ही पति की तीन बेवा
महिलाओं ने बनवाया था। भगवान भोलेनाथ का यह मंदिर सूरगांव के शिव मंदिर , बारहलिंग के शिव मंदिर, और मोरखा

के घनघौरी बाबा के मंदिर के समय कालीन है। हालाकि रोंढा का शिवालय को छोड़ कर उक्त तीन मंदिर सूरगांव के स्वर्गीय
माली समाज के मालगुजार सद्या पटेल ने बनवाया था। इसी कड़ी में गांव का तीन सौ साल पुरान चम्पा का पेड़ और वहां
पर विराजमान माँ खेडापति बीजासन माता मैया के दर्शन के लिए बारह महिने लोगो का आना – जाना बना रहता है।
आज वक्त की मार एवं बेरोजगारी के दंश ने गांव के युवाओं को भटका दिया है।
गांव में वह आदर सम्मान देखने को नहीं मिलता जिसकी आसपास के गांव के लोग मिसाल दिया करते थे। बैतूल जिले का
प्राचिन गांव दिन – प्रतिदिन गांव से लोगो की मोह माया को छोडऩे के दंश की स्वंय की पीड़ा को बयां नहीं कर सकता।
कहते है कि जिस गांव में नरा (जन्म के समय बच्चे की आहर नली) दाई कांट कर जिस जमीन में गाड़ देती थी वह जन्मभूमि
जननी से बड़ी हो जाती थी लेकिन जन्मभूमि का मोह मात्र सात दयाराम में से एक स्वर्गीय दयाराम डिगरसे को गांव ले
आया। गांव से ही उनकी अंतिम यात्रा निकली जिसके पीछे कहीं न कहीं गांव के प्रति उनका अथाह प्रेम कहा जा सकता है।
जिला मुख्यालय से मात्र 9 किमी दूर स्थित ग्राम रोंढा यूं तो ग्राम पंचायत है जिसमें सरकारी सुविधाओं की महज खानापूर्ति
की गई है। आज भी गांव विकास के अच्छे दिन की राह में खड़ा इंतजार कर रहा है अपने किसी सपूत का जो गांव की काया
कल्प को बदल सके।
लोहार का तबले पर वार
गांव का छोरा बना संगीतज्ञ
बैतूल जिले के इस प्राचिन गांव में गांव लोहार का काम सिर्फ गांव के किसानो के लिए उसकी जरूरत उपयोगी सामानो का
निमार्ण कार्य होता था। बैलगाड़ी का युग था तब गन्ने का घाना और उसके लिए जरूरी उपयोगी पूरी सामग्री लोहे की चादर
को पीट- पीट कर बनाई जाती थी । गन्ने के रस को भटट्ी पर खौला कर गुड़ बनाने में अहम भूमिका निभाने वाली लोहे
की पूरी कढ़ाई गांव का लोहार 15 – से 20 दिन की मेंहनत के बार बनाता था। उस दौर में मुद्रा नहीं वस्तु विनीमय का
होता था। गांव के के किसान हर जरूरत मंद को पूरे साल का कार्य ठेका दे देता था जिसके बदले उसे उसकी आवश्क्यता के
अनुमात में सामग्री देता था। इसी क्रम को सालाना वस्तु विनीमय कहते थे। ग्राम रोंढ़ा में बढ़ई के दो, लोहार के दो, ऐसे
जरूरत मंद लोगो के घर फिक्स थे। गांव के लोहार पूरे परिवार में महिला से लेकर पुरूष और जवां बच्चे तक घन से ठोकने –
पीटने का पुश्तैनी काम किया करते थे। गांव के एक लोहार परिवार के मुखिया दीना विश्वकर्मा को पूरा गांव दीना काका जी
के नाम से पुकारता था। काका जी के परिवार के दो बेटे उमेश और कुंज बिहारी चुरागले कुंजू मेरे बचपन का मित्र था। कुंजू
के हाथो की मार से लोहा पीट – पीट कर पतला हो जाता था लेकिन उन्ही हाथ की ऊंगलियां तब तबले , ढोलक एवं
हारमोनियम पर पड़ती थी तो एक नए सूर को ताल और लय मिलती थी। कुंजू की सख्त हाथो की कोमल ऊंगलियों ने उसे
संगीत शिक्षक बना दिया आज वह छिन्दवाड़ा जिले की सौसर स्थित रेमण्ड के स्कूल में संगीत शिक्षक के रूप में कार्यरत है।
कुंजू का बेटा भी अपने पिता की तरह संगीत में डिग्री – डिप्लोमा ले चुका है लेकिन उसका मन कहीं और अपनी प्रतिभा को
स्थापित करने का है। इस गांव से निकले लोगो ने हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है। जिला मुख्यालय का एक मात्र संगीत
महाविद्यालय के प्राचार्य पद पर स्व प्रेरणा से सेवा देने वाले का नाम रमेश पंवार है जो कभी स्वर्गीय रविन्द्र जैन के रूम
पार्टनर हुआ करते थे।
यहां तक आते – आते सुख जाती है सभी नदियां
हमे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा……
ग्राम रोंढ़ा विकास की संभावनाओं से कोसो दूर है। यहां पर के प्रमुख लोगो का धंधा खेती – किसान था लेकिन गांव के
गरीब मजदूर किसान ने अपना पेट काट कर अपने बेटे को सरकारी नौकरी की चौखट तक पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं
छोड़ी। गांव की वर्तमान में 18 सौ के लगभग आबादी में 20 प्रतिशत युवा होगें जो पढ़ लिखने के बाद भी कुछ नहीं कर पा
रहे है। गांव की छोरियां नर्सिंग एवं टीचिंग के क्षेत्र में भले ही सफलता के शिखर पर पहुंच गई हो लेकिन सरकारी नौकरी
वाला इस गांव में छोरा मिलना अब दुभर हो गया है। गांव की छोरियां सरकारी नौकरी की ओर दौड़ी चली जा रही है

नतीजा यह निकला कि जिस गांव की एक भी महिला सरकारी नौकरी में नहीं थी , आज उसी गांव की पचास से अधिक
छोरियां शादी के पहले और बाद में सरकारी नौकरी करने लगी है। जिस गांव के हर घर से दो से लेकर चार तक युवक
१९६० से १९७० के दशक में सरकारी नौकरी में थे, आज उसी गांव में युवको की सरकारी नौकरी का प्रतिशत घटते क्रम में
रसातल में पहुंच चुका है। बैतूल जिले के इस गांव की कृषि योग्य जमीन भाई – बटवारे एवं तथाकथित शौक के चलते बिकने
के बाद आज ऐसी स्थिति आ गई है गांव में कोई बड़ा किसान ऐसे नहीं मिलेगा जो सौ पचास एकड़ का अकेला मालिक
हो…! ग्राम रोंढा के बारे में एक बात सार्वजनिक रूप से कहीं जा सकती है कि जिस गांव के लोगो के पास पचास एकड़
जमीन सिर्फ जानवरो की चरवाई के लिए हुआ करती थी आज उनके पास चार एकड़ जमीन नक्शे में खोजने से नहीं मिल
पा रही है। ठेसका , सराड़, सिमोरी, चिचढाना ताप्ती के किनारे के ऐसे गांव है जो रोंढ़ा के पंवारो के जानवरो की चरवाई
की जमीनो पर बसे है। भीमपुर विकासखण्ड का ग्राम सिमोरी में बसी आबादी के पास उसके मकान का मालिकाना हक नहीं
है जिसके पीछे की वज़ह यह है कि पूरा गांव रोंढा के एक परिवार की जानवरो की छोटे झाड़ो के जंगलो की जमीन पर बसा
है। जिसका मालिकाना हक जिसके परिवार की जमीन पर दर्ज था अब वह इस दुनिया में नहीं है। ग्राम रोंढा के बारे में
स्वर्गीय दुष्यंत कुमार की ए पंक्तियां सटिक बैठती है कि
यहां तक आते – आते सुख जाती है सभी नदियां, हमें मालूम है पानी कहां ठहरा होगा।

रामकिशोर दयाराम पंवार रोंढावाला

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