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    राष्ट्रीय खेल नीति से बढा खेल के प्रति रूझान

    भगवत कौशिक

    – “पढोंगे लिखोगे बनोंगे नवाब ,खेलोंगे कूदोगे होंगे खराब”अक्सर घर मे बडे बुजुर्गों से इस वाक्य को आपने कई बार सुना होगा क्योंकि पुराने समय में एक धारणा थी  कि पढ़ाई करने से बच्चे का भविष्य सुधरता है, लेकिन खेल कूदने से बच्चा कहीं का नहीं रहता है। इसी कारण माता-पिता अपने बच्चों को खेल कूद से दूर रखते थे। अब जमाना बदल चुका है। अब खेलोंगे कूदोगे बनोंगे नवाब का जमाना आ चुका है।पढाई के साथ साथ हमारे शरीर को फीट एवं तरोताजा रखने के लिए खेल भी हमारे जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज खेलो के क्षेत्र मे हमारे खिलाड़ी नए- नए किर्तिमान स्थापित कर रहे है।आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी मे किसी के पास भी अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने का समय नहीं है ,जिसके कारण लोगों का स्वास्थ्य ढांचा बिगडता जा रहा है।ऐसे मे खेल आज हमारे जीवन के लिए अंत्यत आवश्यक हो गए है।राष्ट्रीय खेल नीति पदक लाओ,ईनाम पाओ व खेलो के उत्थान के लिए केंद्र व राज्य सरकारों के प्रयास के चलते अब खिलाड़ियों के साथ साथ पदकों की संख्या मे भी ईजाफा हुआ है जिसकी बदौलत अब खेल को कैरियर के रूप मे चुनकर देश की युवा पीढी अपनी जिंदगी को सुधार रहे है।आज राष्ट्रीय खेल दिवस है। खेल दिवस के उपर विस्तृत जानकारी –
    ■ राष्ट्रीय खेल दिवस का इतिहास – राष्ट्रीय खेल दिवस 29 अगस्त को हॉकी के महान् खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की जयंती के दिन मनाया जाता है। राष्ट्रीय खेल दिवस की शुरुआत वर्ष 2012 मे हुई।दुनिया भर में ‘हॉकी के जादूगर’ के नाम से प्रसिद्ध भारत के महान् व कालजयी हॉकी खिलाड़ी ‘मेजर ध्यानचंद सिंह’ जिन्होंने भारत को ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलवाया, उनके प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए उनके जन्मदिन 29 अगस्त को हर वर्ष भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
    ■ मेजर ध्यानचंद का जन्म –
     ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 में उत्तरप्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में हुआ। इस दिग्गज ने 1928, 1932 और 1936 ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। भारत ने तीनों ही बार गोल्ड मेडल जीता ।
    ■ मेजर ध्यानचंद के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं-
     ◆महज 16 साल की उम्र में भारतीय सेना में भर्ती होने वाले ध्यानचंद का असली नाम ध्यान सिंह था। ध्यानचंद के छोटे भाई रूप सिंह भी अच्छे हॉकी खिलाड़ी थे जिन्होने ओलंपिक में कई गोल दागे थे।
    ◆ सेना में काम करने के कारण उन्हें अभ्यास का मौका कम मिलता था. इस कारण वे चांद की रौशनी में प्रैक्टिस करने लगे।
    ◆ ध्यान सिंह को चांद की रोशनी में प्रैक्टिस करता देख दोस्तों ने उनके नाम साथ ‘चांद’ जोड़ दिया, जो बाद में ‘चंद’ हो गया
    ◆ ध्यानचंद एम्सटर्डम में 1928 में हुए ओलंपिक में सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी रहे थे. यहां उन्होंने कुल 14 गोल कर टीम को गोल्ड मेडल दिलवाया था। उनका खेल देख एक स्थानीय पत्रकार ने कहा था, जिस तरह से ध्यानचंद खेलते हैं वो जादू है, वे हॉकी के ‘जादूगर हैं।
    ◆ ध्यानचंद का खेल पर इतना नियंत्रण था कि गेंद उनकी स्टिक से लगभग चिपकी रहती थी. उनकी इस प्रतिभा पर नीदरलैंड्स को शक हुआ और ध्यानचंद की हॉकी स्टिक तोड़कर इस बात की तसल्ली की गई, कहीं वह चुंबक लगाकर तो नहीं खेलते हैं।
    ◆ मेजर की टीम ने साल 1935 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का दौरा किया था। यहां उन्होंने 48 मैच खेले और 201 गोल किए। क्रिकेट के महानतम बल्लेबाज डॉन ब्रैडमैन भी उनके कायल हो गए। उन्होंने कहा, वो (ध्यानचंद) हॉकी में ऐसे गोल करते हैं, जैसे हम क्रिकेट में रन बनाते हैं।
    ◆ वियना में ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगाई और दिखाया कि वे कितने जबर्दस्त खिलाड़ी थे।
    ■ मेजर ध्यानचंद की उपल्बधियां -मेजर ध्यानचंद के नेतृत्व मे हॉकी के क्षेत्र में वर्ष 1928, 1932 और 1936 में तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते। मेजर ध्यानचंद को उनके शानदार स्टिक-वर्क और बॉल कंट्रोल की वजह से हॉकी का ‘जादूगर’ भी कहा जाता था। उन्होंने अपना अंतिम अंतर्राष्ट्रीय मैच 1948 में खेला। उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर के दौरान 400 से अधिक गोल किए। भारत सरकार ने ध्यानचंद को 1956 में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया
    ■ ठुकरा दिया था हिटलर का प्रस्ताव -भारत की आजादी से पूर्व हुए ओलंपिक खेल में सर्वश्रेष्ठ हॉकी टीम जर्मनी को 8-1 से हराने के बाद जर्मन तानाशाह हिटलर ने मेजर ध्यानचंद को अपनी सेना में उच्च पद पर आसीन होने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उन्होंने हिटलर के प्रस्ताव को ठुकराकर भारत और भारतीयों का सीना सदा-सदा के लिए चौड़ा कर दिया था। 
    ■ खेल दिवस पर राष्ट्रपति करते है पुरस्कृत –
    खेल दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति देश की प्रमुख खेल हस्तियों को खेलों के सबसे बड़े अवॉर्ड खेल रत्न, अर्जुन अवॉर्ड, द्रोणाचार्य अवॉर्ड और ध्यानचंद अवॉर्ड से सम्मानित करते हैं।कोविड-19 महामारी के कारण पहली बार राष्ट्रीय खेल पुरस्कार वितरण समारोह 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस पर वर्चुअल आयोजित किया जाएगा। जहां चयनित एथलीट, कोच और अन्य विजेता राष्ट्रीय खेल प्राधिकरण (साई) केंद्र में इकट्ठे होने के बाद राष्ट्रपति भवन से लाइव जुड़ेंगे। खेल मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, ‘नीला (खेल रत्न के लिए) और लाल (अर्जुन पुरस्कार के लिए) ब्लेजर उनके पदकों के साथ (खेल रत्न विजेताओं के लिए) और कांस्य मूर्तियों (अर्जुन पुरस्कार विजेताओं के लिए) को समारोह से पहले दे दी जाएंगी।
    ■ इन खिलाड़ियों को मिलेंगे पुरस्कार –
    ◆राजीव गांधी खेल रत्न : रोहित शर्मा (क्रिकेट), मरियप्पन थंगावेलु (पैरा एथलीट), मनिका बत्रा (टेबल टेनिस), विनेश फोगाट (कुश्ती), रानी रामपाल (हॉकी)
    ◆द्रोणाचार्य पुरस्कार (लाइफटाइम कैटेगरी)  : 
    धर्मेंद्र तिवारी (तीरंदाजी), पुरुषोत्तम राय (एथलेटिक्स), शिव सिंह (बॉक्सिंग), रोमेश पठानिया (हॉकी), कृष्ण कुमार हुड्डा (कबड्डी), विजय भालचंद्र मुनिश्वर (पैरा लिफ्टर), नरेश कुमार (टेनिस), ओमप्रकाश दहिया (कुश्ती)
    ◆द्रोणाचार्य पुरस्कार (रेगुलर कैटेगरी) : जूड फेलिक्स (हॉकी), योगेश मालवीय, (मलखंब), जसपाल राणा (निशानेबाजी), कुलदीप कुमार हंडू (वुशु), गौरव खन्ना (पैरा बैडमिंटन)
    ◆अर्जुन पुरस्कार : अतानु दास (तीरंदाजी), दुती चंद (एथलेटिक्स), सात्विकसाईराज रेंकीरेड्डी, चिराग शेट्टी, (बैडमिंटन), विशेष भृगुवंशी (बास्केटबॉल), मनीष कौशिक, लवलीना बोरगोहेन (मुक्केबाजी) इशांत शर्मा, दीप्ति शर्मा (क्रिकेट), अजय आनंत सावंत (घुड़सवारी), संदेश झिंगन (फुटबॉल), अदिति अशोक (गोल्फ), आकाशदीप सिंह, दीपिका (हॉकी), दीपक (कबड्डी) सरिका सुधाकर काले (खो खो), दत्तू बबन भोकानल (रोइंग), मनु भाकर, सौरभ चौधरी (निशानेबाजी), मधुरिका सुहास पाटकर (टेबल टेनिस) दिविज शरण (टेनिस), शिवा केशवन (ल्यूज), दिव्या काकरान, राहुल अवारे (कुश्ती), सुयश नारायण जाधव (पैरा तैराकी), संदीप (पैरा एथलीट), मनीष नरवाल (पैरा निशानेबाजी)
    ◆ध्यानचंद पुरस्कार : कुलदीप सिंह भुल्लर, जिंसी फिलिप्स (एथलेटिक्स), प्रदीप गंधे, तृप्ति मुरगुंडे (बैडमिंटन), एन उषा, लक्खा सिंह (मुक्केबाजी), सुखविंदर सिंह संधू (फुटबॉल), अजीत सिंह (हॉकी), मनप्रीत सिंह (कबड्डी), जे रंजीत कुमार (पैरा एथलीट), सत्यप्रकाश तिवारी (पैरा बैडमिंटन), मंजीत सिंह (रोइंग), सचिन नाग (तैराकी), नंदन पाल (टेनिस), नेत्रपाल हुड्डा (कुश्ती) 

    ■आज भी नहीं मिला वो सम्मान-भारत को ओलंपिक में 3 स्वर्ण पदक दिलवाने वाले ध्यानचंद को आज तक भारत रत्न से नहीं नवाजा गया है। जबकि हमेशा से उन्हें भारत का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान दिए जाने की मांग उठती रही है। हालांकि पहले खेल जगत की उपलब्धियों के आधार पर भारत रत्न दिए जाने का प्रावधान नहीं था। लेकिन सचिन तेंदुलकर को इस सम्मान से नवाजे जाने के लिए इस प्रावधान में संशोधन किया गया था। लेकिन उसके बाद भी आज तक ध्यानचंद को यह सम्मान नहीं दिया गया है।
    ■अपनी मौत से दो महीने पहले कहा था –
    ‘जब मैं मरूँगा, पूरी दुनिया रोएगी लेकिन भारत के लोग मेरे लिए एक आंसू नहीं बहाएंगे, मुझे पूरा भरोसा है’।
    लगातार तीन बार भारत को ओलंपिक गोल्ड मेडल्स दिलाने वाले मेजर ध्यानचंद, वही ध्यानचंद जिन्हें आज़ादी से पहले बच्चा-बच्चा जानता था। लेकिन बाद के दिनों में जिन्हें हर किसी ने भुला दिया।

    भारत जैसे विशाल देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। हमें बस प्रतिभा की पहचान करनी है। खेल स्वस्थ और बीमारी मुक्त लंबी आयु का जीवन जीने का एक तरीका है और राष्ट्रीय खेल दिवस कई प्लेटफार्मों में से एक है जो पूरे देश में इस संदेश को फैलाने में मदद करता है। खेल युवाओं के बीच मित्रता की भावना पैदा करते हैं और उनमें एकता की भावना विकसित होती है। यह न केवल व्यक्ति के दिमाग को तेज़ बनाता है बल्कि मन को मजबूत और सक्रिय भी बनाता है और हमारे देश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि यह भी कहती है कि जो लोग खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं वे न केवल खेल में बल्कि जीवन में भी अपना मूल्य साबित करते हैं।खेल जगत में तमाम सफल खिलाड़ियों के होने के बावजूद, भारतीय मां-बाप आज भी खेल में बच्चों की रूचि को सीरियसली नहीं लेते हैं क्योंकि किसी ना किसी मोड़ पर खिलाड़ी को अपने खेल को अलविदा कहना ही होगा।
    इसके साथ ही खेलो मे बढता राजनैतिक हस्तक्षेप खेलों के विकास के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है।आजकल खेलो के नाम पर अनेकों यूनियन बन गई है जो एक दूसरे की टांग खिचाई मे देश के भविष्य के साथ साथ खेलो के भविष्य से भी खिलवाड़ कर रहे है।

    भगवत कौशिक
    भगवत कौशिक
    मोटिवेशनल स्पीकर व राष्ट्रीय प्रवक्ता अखिल भारतीय साक्षरता संघ

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