लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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डॉ. सिंह, सर्वप्रथम नक्सल मामलों की विभीषिका से केन्द्रीय गृह मंत्री को अवगत करवा पाने की सफलता के लिए प्रशासन का मुखिया होने के नाते आपको बधाई! मुख्यमंत्री जी, नायक वही होते हैं जो आपदा को भी अपनी कर्मठता एवं शौर्य से अवसर में बदल दें। नियति ने आपके समक्ष ऐसा ही अवसर पैदा कर आपको इतिहास के उस मुहाने पर खड़ा कर दिया है जहां एक तरफ आपके पास अपयश की अंधी सुरंग है तो दूसरी ओर यश एवं नायकत्व का कठिन लेकिन शास्वत राजमार्ग। रमन जी, यह तो सर्वमान्य सत्य है कि नक्सल समस्या के असली सूत्रधार अबूझमाड़ के बीहड़ों में नहीं, रायपुर और दिल्ली के अपार्टमेंटों में निवास करते हैं। ये ऐसे-ऐसे मूषक, ऐसे विघ्नसंतोषी हैं जिनकी बिल पता नहीं कहां-कहां तक है। लेकिन न्याय व्यवस्था को सबूतों की जरूरत पड़ती है, सभ्य समाज के न्याय का सिद्घांत भी यही है। लेकिन शातिरों के खिलाफ कुछ सबूत एकत्र करने में आपकी सरकार सफल रही है, इसके लिए निश्चय ही पूरे प्रशासन की प्रशंसा की जानी चाहिए।

लेकिन एक नयी चुनौती भी इसी के साथ आपके समक्ष प्रांरभ हो गई होगी, और वह होगा दानवाधिकारवादियों का जबरदस्त छल प्रपंच एवं रक्तिम मीडिया का जबरदस्त दबाव। यही वह समय होता है जब किसी के जीवन की कठिन परीक्षा होती है। हमारे समक्ष गुजरात का उदाहरण है। अवसरवादी दानवों को, अमानवाधिकारवादियों को, बिचौलिया की भूमिका में कार्य कर रहे समाचार माध्यमों को ठेंगा दिखाकर किस तरह कच्छ की रणभूमि में भी विकास की नर्मदा प्रवाहित की जा सकती है यह प्रेरणा लेने योग्य है। बिना किसी दबाव में आये अनुसंधान एजेंसियों को अपना कार्य करने देकर दण्डकारण्य को राक्षसों से मुक्ति का वाहक बन अपना जन्म सफल करने का अवसर आपके सामने है।

सिंह जी, यूं तो आज नक्सल आंदोलन इतना पतित हो गया है कि इसके विचारों की चर्चा करना भी व्यभिचार के समान लगता है। लेकिन चूंकि यह सारा षडय़ंत्र विचारों के नाम पर हो रहा है, अत: उसका थोड़ा चर्चा करना उचित होगा। जैसा कि सब जानते हैं पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से निकला यह सामाजिक कोढ़ मारो और मारने दो के कुविचार पर आधारित है। इनके विचारों का एकमात्र प्रस्थान बिंदु है हिंसा और अनावश्यक हिंसा। सबसे बड़ी बिडंबना तो यह सामने आ रही है कि हत्या भी उसी समूह का जिसके नाम पर उनके तथाकथित आंदोलन की दुकान चल रही है। सान्याल, सेन, सायल, सुनील, सुभ्रांशु, संदीप, सुभाष आदि बुद्घिविलासी बेहतर समझते हैं कि दूर देश से आयातित इस विचार ने आज तक दुख, आंसू, खून, अनाचार, अत्याचार, दर्द के सिवा इस दुनिया को कुछ नहीं दिया है। ठीकठाक जीवन वसर करने वाले सोवियत रूस के लोग जब चंद ब्रेड के टुकड़े के लिए कई किलोमीटर लंबी लाईन लगाने लगे थे तब सारी दुनिया ने कामरेडों की भयावहता देखी थी। ये लोग बेहतर जानते होंगे कि चीन में 1959-61 के दौरान भीषण अकाल के कारण जब लगभग 4 करोड़ लोग भूख से तड़प-तड़प कर मर रहे थे तो माओ कमसिन लड़कियों के साथ रंगरेलियां मनाने में व्यस्त था। या हम उतने दूर क्यूं जाय…? कल की ही बात है न, जब नंदीग्राम और सिंगुर में ये अवसरवादी अपने सबसे बड़े कथित दुश्मन पुंजीवादियों के लिए लाल कालीन बिछा रहे थे तो उस कालीन को नीचे भी दर्जनों वही सर्वहारा लोग दफन कर दिये गये थे। कामरेडों के उस स्थायी ऐशगाह पश्चिम बंगाल में मजलूमों की लाश पर राक्षसी वृत्तियों का नंगा नाच सारी दुनिया ने देखा और महसूसा था।

आपको कई बार अवश्य ताज्जुब लगता होगा ये जानकर की दुनिया में दो अतिवादी धारायें एक साथ मानवता को रक्त रंजित कर रही है। एक वह जिसके लिए बाजार और मुनाफा ही सब कुछ है और दूसरा वह जिसके लिए पूंजी जहर के समान है। लेकिन रेत और मृगतृष्णा की तरह यह दोनों तब तक ही अलग दिखते हैं जब तक की उनकी आस्तित्व को चुनौती नहीं मिले। कोला और पेप्सी के जंग की तरह इन दोनों की जंग तब तक रहती है जब तक कि लोग इनका बहिष्कार करना शुरू नहीं कर दे। इन दोनों में एक बात समान है वो यह कि इनके लिए राष्ट्रीय मूल्यों का कोई महत्व नहीं है। एक के लिए रूस और चीन माई-बाप है तो दूसरे के लिए अमेरिका और यूरोप। एक बहुत बड़ी अंतर्राष्ट्रीय हस्ती ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जिस प्रकार लकड़बग्घा अपने शिकार को कभी नहीं छोड़ सकता उसी तरह मार्क्सवादी भी कभी देशद्रोह नहीं छोड़ सकते।

अस्तु। अभी पिछले दिनों ही पर्याप्त साक्ष्य के आधार पर पुलिस ने नरसंहारियों को मानवाधिकार के नाम पर प्रोत्साहित करने के आरोप में एक बड़े मगरमच्छ को पकड़ा था। आपको अनुमान तो रहा ही होगा कि पुलिस के इस सामान्य कदम से भी रायपुर दिल्ली से लेकर सात समंदर पार तक प्रतिक्रिया होगी। सम्पूर्ण देश और पूरी दुनिया के मुट्ठी भर अवसरवादी अपने हितों पर कुठाराघात होता देख, अपनी दुकान बंद होता देख स्वाभाविक रूप से गोलबंद हो गए थे। लेकिन इन अमानुषों के विरूद्ध लड़ाई में आपके पास सत्य, न्याय, लोक और नैतिकता की ताकत थी। जैसा की ऊपर कहा गया है न्याय व्यवस्था को सबूतों की ज़रुरत होती है, यही नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत है। अतः ऐसे किसी गुंडे को भले ही तात्कालिक रूप से उच्चतम न्यायलय द्वारा राहत मिल गयी है, लेकिन अपने आत्म विश्वास की बदौलत नक्सलियों से संघर्ष की इस निर्णायक घड़ी में मानवता निश्चय ही विजयी बनकर निकलेगी। राष्ट्रीय विचारधारा का चंदन निश्चय ही विरप्पनों के कब्जे से निकल सारी दुनिया को सुवासित करेगा, ऐसा दृढ़ विश्वास आपको रखना होगा।

रमन जी, यह जिम्मेदारी हमें लेनी ही होगी कि सार्वाधिक धनी एवं सम्पन्न बस्तर के भोले-भाले वनवासियों की दुर्गति के लिए सरकारें जिम्मेदार रही हैं। अपने जनजातीय बंधुओं के मार्मिक शोषण के लिए निश्चय ही भोपाल और दिल्ली अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। नक्सलियों के कुछ हद तक सफल होने के लिए भी यही कारण जिम्मेदार रहे हैं। लेकिन फिर यहाँ भी हमें एक विडंबना से साक्षात्कार होता है कि जिस दल की सरकार के कारण शोषण के फलस्वरूप नक्सलवाद का विकास हुआ बहुधा उस दल के लोग भी उसी नक्सली अमानवाधिकारवादी के साथ खड़े दिखते रहे हैं। हाल ही में गृह मंत्री ने संसद में यह बयान दिया था कि केंद्र ने नक्सल समस्या को कम कर आँका है। ऐसे में आप अगर “मैडम” के दूत चिदंबरम जी को उनकी ग़लती समझा पाए होंगे। अगर चिदंबरम के प्रदेश प्रवास से उनके इस स्वीकारोक्ति को बल मिला हो तो निश्चय ही आपका प्रयास सफल समझा जाएगा। देश के इतिहास में कई बार ऐसा अवसर आता है जब नागरिकों के पास विकल्प सीमित होते हैं। आपको किसी न किसी एक पक्ष में ही खड़ा रहना होता है। टी नक्सलियों के खिलाफ किये जा रहे किसी भी कारवाई का विरोध आज निश्चय ही नक्सलियों को समर्थन माना जाना चाहिए। बीच का रास्ता अब कोई नहीं बचा है। हमारे इस शब्द में कलमघिस्सुओं को भले ही बुश के चर्चित बयान से साम्यता दिखे, लेकिन उन्हें यह भी समझना होगा कि जब हालात बस्तर जैसे होते हैं तो एक लक्ष्मण रेखा खीचनीं ही होती है, वहां पर समर्थन और विरोध के अलावा तीसरा कोई मार्ग नहीं होता। साथ ही अमरेरिकन राष्ट्रपति के बयान जैसा इस बात को समझने वालों को यह तो पता ही होगा कि आतंकियों के समर्थन में जिस मानवाधिकार के नाम का वे हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं, वह ताकत भी उन्हें उसी अमेरिका और उसकी कठपुतली संयुक्त राष्ट्र से मिली थी। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार चार्टर पर हस्ताक्षर करते हुए भारत ने यह कभी नहीं सोचा होगा कि कुकुरमुत्ते की तरह उगकर मानवाधिकार के दुकानदार, निर्दोष नागरिकों के अस्तित्व के लिए चुनौती बन जायेंगे। हजारों मजलूमों को मार दिये जाने पर उफ तक नहीं करने वाले ये उग्रवादी, आतंकी अफजल को फांसी की सजा मिलते ही हायतौबा मचाने लगते हैं। रायपुर जेल में नक्सली सरगना से 6 महीने में 35 बार मिलने वाले ये लोग उसी जेल में बंद सैकड़ों कैदी की हालचाल भी पूछना अपने व्यस्त बाजारू समय की बर्बादी समझते हैं। इनके अपने बाजार को बचाने या अपने विभिन्न आय स्त्रोतों को कायम रखने की खातिर हम क्यों अपने वनवासी भाई बंधुओं को इंधन बनने दें?

डाक्टर रमन, आप बेहतर जानते होंगे कि नक्सलवाद छत्तीसगढ़ के लिए एक कैंसर से कम नहीं है। और कैंसर के विषाणु को समाप्त करने के लिए जब कीमोथेरेपी किया जाता है तो कुछ स्वस्थ और अच्छी कोशिकायें भी चपेट में आ जाती है। हो सकता है सरकार के इस कदम से आपको राजनीतिक रूप से शहीद हो जाना पड़े। पिछले दिनों का केन्द्रीय गृहमंत्री का हस्तक्षेप संबंधी बयान शायद ऐसा ही इशारा करता है। या राजनीतिक शहादत ही क्यूँ? अपनी औकात पर आ जाने पर ये खूंखार आपको वास्तविक रूप से भी निशाना बना सकते हैं।लेकिन आप बेहतर जानते हैं कि “एक बार इस राह पे मरना सौ जन्मों के समान है।” गीता में यही तो कहा था श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कि “यदि तुम धर्मयुद्घ में वीरगति को प्राप्त हुए तो स्वर्ग का एश्वर्य तुम्हारे लिये होगा और अगर विजयी हुए तो पृथ्वी के यशस्वी नायक तुम होगे। अनुसंधान एजेंसियां अपना काम बिना किसी राग-द्वेष, दबाव के करे तो सच्चाई निश्चय ही प्याज के छिलके की तरह उतरती चली जाएगी। यही बस्तर बंधुओं की शहादत को श्रद्धांजलि भी होगा।

जहां तक जन सुरक्षा कानून का प्रश्र है तो निश्चय ही इससे किसी भी निर्दोष या सामान्य नागरिक को भयभीत होने की जरूरत नहीं है। कानून चाहे जितना भी कठोर हो, फैसला अंतत: न्यायालय को ही करना होता है। अपनी न्याय प्रणाली की यह भावना है कि सौ दोषी भले ही छूट जाए लेकिन एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिले। आतंकियों से मुक्ति हेतु बनाये गये इस कानून का विरोध निश्चय ही “चोर की दाढ़ी में तिनका” को परिलक्षित करता है। मुख्यमंत्री जी चोर की दाढ़ी से वह तिनका निकलवा देने का समय अब आ गया है। तिनका-तिनका कर जोड़े गये वनवासी बंधु के आश्रय एवं उसके अस्तित्व की रक्षा का विलक्षण इतिहास आपकी सरकार के द्वारा ही लिखा जाना है। नक्सलियों के समूल नाश के बाद शेष कुशल!

– पंकज झा.

8 Responses to “नक्सलवाद/ डॉ. रमन आप इतिहास के मुहाने पर खड़े हैं!”

  1. mukesh agrawal

    litrally very true facts u have mentioned…we have to solve it on multiple angle to eradicte this problem &to save the history of 10 year cg to upcoming rea of state.

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  2. anil pusadkar

    आपसे शत प्रतिशत सहम्त हूं और आपकी बेबाक कलम को नमन करता हूं।

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  3. डॉ. महेश सिन्‍हा

    महेश सिन्हा

    सटीक विश्लेषण
    इनके आका आंध्र प्रदेश से लेकर बंगाल तक फैले हैं
    इन देशद्रोहियों को तस्करी से हथियार मिलते हैं ये गृह मंत्री ने स्वीकार किया है
    जब श्री लंका जैसा छोटा देश अपनी समस्या स्वयं सुलझा सकता है तो हम क्या सक्षम नहीं हैं

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  4. Jeet Bhargava

    वनवासियों को टरका कर नक्सलवाद के नाम पर एश करने वाले ‘एस’- सान्याल, सेन, सायल, सुनील, सुभ्रांशु, संदीप, सुभाष न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के लिए घातक हैं. यह नित नए नारे गढ़कर और उपद्रवी योजनाये लेकर देश को तोड़ने और गरीबो को बहकाकर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकना चाहते हैं. आज छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड और महाराष्ट्र में भी नक्सलवादी और माओवादी अपनी हिंसक गतिविधियाँ बखूबी कर रहे हैं. लेकिन छतीसगढ़ में डॉ रमण सिंह ही नहीं बल्कि आम जनता भी उनका असली चेहरा पहचान गयी है और उन्हें मुंह तोड़ जवाब दे रही है. इसलिए यह लगातार छत्तीसगढ़ को बदनाम करने के तुच्छ अभियान में लगे हुए हैं. दुर्भाग्य की बात है कि खुद को मुख्यधारा का मीडिया और साहित्य कहने वाली जमात में भी माओ और नक्सलवाद के हमदर्दों ने घुसपैठ की है. जो जनता को गुमराह करने के लिए जुटे हुए हैं. ऐसे में इनके खिलाफ उंगुली उठाना वाकई में हिम्मत का काम है. जिसके लिए डॉ. रमण और छत्तीसगढ़ की जनता और पुलिस-प्रशासन ही नहीं बल्कि आप जैसे कलम के सिपाही भी बधाई के पात्र हैं.

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  5. Samar Singh

    बेहद दमदार बात. आपने मुखरता और प्रखरता के साथ वनवासी बंधुओं की बात राखी है और कम्युनिस्टो को बेनकाब किया है. अब वक्त आ गया है कि मानवाधिकार, साम्यवाद, सेकुलरवाद, आदि के नाम पर जो रक्त रंजित लाल आतंक फ़ैल रहा है उसके पीछे की हकीकत जनता के सामने आये. आपकी साहसी लेखनी को सलाम.

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  6. दिनेशराय द्विवेदी

    आप की बहुत सी बातों से सहमति नहीं है। आज भी सारी दुनिया के शोषितों के लिए मार्क्सवाद एक आवश्यक विचारधारा बनी हुई है, तो उस का कारण यह है कि यह विचारधारा ही है जो कि आज की समस्याओं का हल तलाशती है। लेकिन यह एक सौ बरस से अधिक पुराना दर्शन है। यह शोषकों के लिए मारक है। इस कारण से शोषक भी इस विचारधारा का चोला पहनने लगा है। हमेशा से मार्क्सवादी आंदोलनों में पूंजीवाद और साम्राज्यवाद घुसपैठ करता आया है। दुनिया भर में यही हो रहा है। अब जब शोषक एक क्रांतिकारी विचारधारा का नकाब ओढ़ कर सामने आ रहा है तो उस से लड़ना आसान नहीं रहता। यही छत्तीसगढ़ और भारत के अन्य क्षेत्रों में हो रहा है। इस समस्या पर अत्यन्त गंभीरता से शोध करना होगा सही और छद्म मार्क्सवाद को समझना होगा छद्म मार्क्सवाद को नंगा करना होगा और समस्या से निपटने के रास्ते तलाशने होंगे। सब से बड़ी बात तो यह कि जिन लोगों की ओर से नक्सलवादी यह सब कारगुजारियाँ कर रहे हैं उन में विश्वास जगाना होगा और उन्हें नक्सलवादियों से अलग-थलग करना होगा। यह काम अत्यंत दुष्कर है, लेकिन असंभव नहीं है। आदिवासियों में सब से पहले यह विश्वास जगाना होगा कि उन का वर्तमान जंगल जो उन का जीवन है उन से नहीं छीना जाएगा। उत्खनन के तमाम पट्टे और स्वीकृतियाँ रद्द करनी होंगी। जब राज्य विश्वास अर्जित कर ले और आदिवासियों को आम जीवन के इतना नजदीक ले आए उन्हें उत्खनन से परेशानी न हो। तो उत्खनन किया जा सकता है। नक्सलवाद से निपटने का और कोई जरिया मुझे नजर नहीं आता है।

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