भारत में खुशहाली की प्रेरणा एवं प्रोत्साहन की जरूरत

-ललित गर्ग-

हर दिन खुश रहने, प्रसन्नता जाहिर करने एवं जीवन में खुशियों का स्वागत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस 20 मार्च को मनाया जाता है, जिसे इंटरनेशल डे ऑफ हैप्पीनेस कहा जाता है। वर्ष 2013 के बाद से इसे पूरे विश्व में मनाया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 12 जुलाई 2012 को एक संकल्प लिया कि विश्वभर के लोगों का जीवन खुशी और प्रसन्नता पर आधारित बने। कोरोना महामारी के कारण आम जन-जीवन में खुशी का पैमाना काफी गिरा है, लोगों के बीच खुशियों का स्तर घटता गया और मानसिक रोग, तनाव, परेशानियों, आत्महत्याओं का स्तर बढ़ने लगा इसलिए सभी के लिए जरूरी है कि वे खुश रहें, प्रसन्नता बांटें एवं बटोरे, छोटी-छोटी चीजों में खुशियां ढूंढना सीखें।
अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस एक विश्वव्यापी आंदोलन की भांति कार्य कर रहा है जो प्रसन्नता को मौलिक मानव अधिकार बनाये जाने हेतु जागरूकता प्रदान कर रहा है। इस दिवस की आवश्यकता इसलिये सामने आयी कि जीवन की समस्याएं सघन होती जा रही है, नकारात्मकता का व्यूह मजबूत होता जा रहा है, खुशी एवं प्रसन्न जीवन का लक्ष्य अधूरा ही रह रहा है, इनसे बाहर निकलना असंभव-सा होता जा रहा है। दूषित और दमघोंटू वातावरण में आदमी अपने आपको टूटा-टूटा सा अनुभव कर रहा है। आर्थिक असंतुलन, बढ़ती महंगाई, बिगड़ी कानून व्यवस्था एवं भ्रष्टाचार उसकी धमनियों में कुत्सित विचारों का रक्त संचरित कर रहा है। ऐसे जटिल हालातों में इंसान कैसे खुशहाल जीवन जी सकता है? यह जटिल प्रश्न ही इस दिवस को मनाने की आधारभित्ति बना।
प्रसन्नता के मामले में भारत में लगातार गिरावट दर्ज होने के कारणों में राजनीतिक अस्थिरता एवं भ्रष्टता बड़ा कारण है, जिससे यहां की अधिकतर आबादी तनावग्रस्त, नाखुश, परेशान है। संयुक्त राष्ट्र की ‘विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट 2019’ के अनुसार, भारत खुशहाल देशों की सूची में सात स्थान नीचे गिरकर 140वें स्थान पर पहुंच गया था। इस तरह यह गंभीर चिंता की बात है कि हम प्रसन्न समाजों की सूची में पहले की तुलना और नीचे आ गये हैं। खुशी एवं प्रसन्नता हम सबकी जरूरत है, लेकिन प्रश्न है कि क्या हमारी यह जरूरत पूरी हो पा रही है, ताजा आकलन से तो यही सिद्ध हो रहा है कि हम खुशी एवं प्रसन्नता के मामले में लगातार पिछड़ रहे हैं। विडम्बनापूर्ण स्थिति तो यह है कि हमारा भारतीय समाज एवं यहां के लोग पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित अपने ज्यादातर पड़ोसी समाजों से कम खुश है।
यहां प्रश्न यह भी है कि आखिर हम खुशी और प्रसन्नता के मामलें क्यों पीछेे हैं, जबकि पिछले कुछ समय से भारतीय अर्थव्यवस्था की तेजी को पूरी दुनिया ने स्वीकार किया है। अनेक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संगठनों ने इस मामले में हमारी पीठ ठोकी है। यही नहीं, खुद संयुक्त राष्ट्र ने मानव विकास के क्षेत्र में भारतीय उपलब्धियों को रेखांकित किया है। हमने कोरोना महामारी का जिस तरह मुकाबला किया एवं इन संकट क्षणों में भारत सहित दुनिया को उबरने में सहायता की, वह विशेष उल्लेखनीय है। बावजूद इसके, खुशहाली में हमारा मुकाम इतना नीचे होना आश्चर्यकारी है। दरअसल पिछले दो-ढाई दशकों में भारत में विकास प्रक्रिया अपने साथ हर मामले में बहुत ज्यादा विषमता लेकर आई है। जो पहले से समर्थ थे, वे इस प्रक्रिया में और ताकतवर हो गए हैं। यानी लखपति करोड़पति हो गए और करोड़पति अरबपति बन गए। एकदम साधारण आदमी का जीवन भी बदला है लेकिन कई तरह की नई समस्याएं उसके सामने आ खड़ी हुई हैं। कोरोना के कारण व्यापार की अस्त-व्यस्तता, नौकरी-रोजगार में कटौती, अर्थव्यवस्था में गिरावट, महंगाई, पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम, रुपया का अवमूल्यन, किसानों की दुर्दशा, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था, महिलाओं पर बढ़ते अपराध, शिक्षा, चिकित्सा ऐसे अनेक ज्वलंत मुद्दे हंै जिनका सामना करते हुए व्यक्ति निश्चित ही तनाव में आया है, उसकी खुशियां कम हुई है, जीवन में एक अंधेरा व्याप्त हुआ है। यह अलग बात है कि इन बुनियादी मसलों के खड़े रहने पर भी जिन्दगी तो चलती ही रही है मगर यह जीना भी कोई जीना है! ये सवाल ऐसे हैं जिनका सामना करते हुए व्यक्ति की खुशहाली में कमी आयी है।
विकास की सार्थकता इस बात में है कि देश का आम नागरिक खुद को संतुष्ट और आशावान महसूस करे। स्वयं आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ बने, कम-से-कम कानूनी एवं प्रशासनिक औपचारिकताओं का सामना करना पड़े, तभी वह खुशहाल हो सकेगा। समस्याओं के घनघोर अंधेरों के बीच उनका चेहरा बुझा-बुझा है। न कुछ उनमें जोश है न होश। अपने ही विचारों में खोए-खोए, निष्क्रिय और खाली-खाली से, निराश और नकारात्मक तथा ऊर्जा विहीन। हाँ सचमुच ऐसे लोग पूरी नींद लेने के बावजूद सुबह उठने पर खुद को थका महसूस करते हैं, कार्य के प्रति उनमें उत्साह नहीं होता। ऊर्जा का स्तर उनमें गिरावट पर होता है। क्यों होता है ऐसा? कभी महसूस किया आपने? यह स्थितियां एक असंतुलित एवं अराजक समाज व्यवस्था की निष्पत्ति है। ऐसे माहौल में व्यक्ति खुशहाल नहीं हो सकता।
एक महान विद्वान ने कहा था कि जब हम स्वार्थ से उठकर अपने समय को देखते हुए दूसरों के लिए कुछ करने को तैयार होते हैं तो हम सकारात्मक हो जाते हैं। सरकार के निस्वार्थ होने पर ही आम आदमी के खुशहाली के रास्ते उद्घाटित हो सकते हैं। तभी आम आदमी को ऊर्जा एवं सकारात्मकता से समृद्ध किया जा सकता है, और तभी जीवन को आनंदित बनाया जा सकता हैं। यही आनन्द एवं खुशहाली समाज और राष्ट्र के लिए भी ज्यादा उपयोगी साबित हो सकती है। कामना हमें शुभ, सुखमय एवं खुशहाल जीवन की करनी होगी। लेकिन इसके लिये अवसरवादी, अनैतिक एवं गलत मूल्यों के खिलाफ आवाज भी तो उठानी ही होगी।
खुशहाल भारत को निर्मित करने के लिये आइये! अतीत को हम सीख बनायें। उन भूलों को न दोहरायें जिनसे हमारी रचनाधर्मिता जख्मी हुई है। जो सबूत बनी हैं हमारे असफल प्रयत्नों की, अधकचरी योजनाओं की, जल्दबाजी में लिये गये निर्णयों की, सही सोच और सही कर्म के अभाव में मिलने वाले अर्थहीन परिणामों की। एक सार्थक एवं सफल कोशिश करें खुशहाली को पहचानने की, पकड़ने की और पूर्णता से जी लेने की। एक शोध में पाया गया है कि जो लोग अच्छी नींद लेते हैं वे अधिक खुश रहते हैं इसलिए नींद के साथ समझौता न करें। कम नींद लेने वालों पर नकारात्मक चीजें जल्दी हावी होती हैं। हमेशा खुश रहने के लिये जरूरी है अपना ज्यादातर समय सकारात्मक और खुशमिजाज लोगों के साथ बिताएं ।
भारत के लोगों की प्रसन्नता एवं खुशी के लिये जरूरी है उनके स्वास्थ्य के स्तर को ऊंचा उठाना एवं उन्नत स्वास्थ्य की जीवनशैली निरूपित करना है। किसी भी देश की संपन्नता इस बात से भी आंकी जाती है कि वहां के लोग कितने स्वस्थ और खुशहाल हैं। भारत में स्वास्थ्य एवं खुशी की स्थितियों को लेकर समय-समय पर होने वाले सर्वेक्षणों में चिंताजनक आंकड़ें आते रहते हैं। हर इंसान में तंदुरुस्त रहन-सहन की आदत कोे प्रोत्साहन देने और लोगों के जीवन के लिये अच्छे स्वास्थ्य का वातावरण निर्मित करने लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयास अनूठे हैं, जिससे आमजीवन को उन्नत, खुशहाल एवं स्वस्थ बनाने की दिशा में उजाला फैला है। क्योंकि जिनके पास खुशी है, स्वास्थ्य है, उन्नत सपने हैं उनके पास आशा है, और जिसके पास आशा है, उसके पास जिंदगी में सब कुछ है। सुख है, शांति है और प्रसन्नता है। खुशी वह बेशकीमती दौलत है जिसे दुनिया की सारी दौलत मिलकर भी नहीं खरीद सकती। अमीर होने के लिए अपनी खुशी को दांव पर लगाना आधुनिक जीवन की एक बड़ी विषमता एवं विसंगति है, क्योंकि यह सत्य है कि खुशी दौलतों की भी दौलत है।
हालांकि भारत की संस्कृति में खुशहाली की प्रेरणा प्राचीन समय से दी जाती रही है। पर जैसे-जैसे विकास और जीवन में सुख-सुविधाएं बढ़ती गई, लोग इसके महत्व को भूलते गए या फिर कुछ व्यस्तताओं के चलते अपेक्षित ध्यान नहीं दे पाते। भारत की उस प्राचीन परंपरा को अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस पर जीवंतता देकर जीने को नया अंदाज देना होगा, तभी भारत वास्तविक रूप में खुशहाल देशों की पंक्ति में अग्रिम स्थान पा सकेगा। जीवन सांसों को नया आयाम देने के लिये खुशी एक रामबाण औषध है, इसका सेवन स्वयं करना होगा और दूसरों को इसके लिये प्रेरित करना होगा।

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