लेखक परिचय

हरि शंकर व्यास

हरि शंकर व्यास

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t s thakurभारत के चीफ जस्टिस की आंखे नम हो जाए, आवाज भर्रा जाए तो मतलब गंभीर है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में भावुक हुए! वह भी उनसे अपील करते हुए! इसका अर्थ है न्यायपालिका और सरकार में बात दिल से बिगड़ी हुई है। दोनों एक-दूसरे की सोच और जरूरत को समझ नहीं रहे है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर इस बात पर भावुक हुए कि जज मुकद्दमों का अंबार कैसे संभाले? उन्होने सरकार से अपील की कि वे जजों की संख्या बढ़ाए। अभी 21 हजार है उसे 40 हजार किया जाना चाहिए!

भला इस बात में मीनमेख कैसे निकाला जा सकता है? सवाल है चीफ जस्टिस को इमोशनल अपील करने की जरूरत क्यों हुई? लगता है राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ती आयोग के अनुभव ने गतिरोध बनाया है। सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच व्यवस्थागत संवाद भी शायद नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने संसद के बनाए न्यायिक नियुक्ती आयोग को खारिज कर यथास्थिति बनाए रखने का जो काम किया है उससे ऐसा गतिरोध बना है जिसमें आला जजों की नियुक्ती भी लगभग अटक गई है।

चीफ जस्टिस ने ठिक कहा कि 3 करोड मुकद्दमे लंबित हैं। लाखों लोग जेल में है। जज उनके केस नहीं सुन पा रहे है। हाईकोर्ट में 38 लाख से अधिक पेंडिंग मुकद्दमे हैं। हाईकोर्ट में 434 जजों की वेकेंसी है। जस्टिस ठाकुर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट जब 1950 में बना तो आठ जज थे और एक हजार केस थे। 1960 में 14 जज हुए और केस 2247। सन् 2009 में जज 31 हुए तो केस बढकर 77,151 हो गए। 2014 में जजों की संख्या जस की तस है पर केस 81,553 हो गए। इस साल चार महीने में ही 17,482 नए केस दाखिल हुए है।

जीफ जस्टिस ने आगे अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहां कि नौ जज पूरे साल में 81 केस सुनते हैं जबकि भारत में छोटे से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का एक-एक जज 2600 केस सुनता है। विदेशों से आने वाले जज समझ नहीं पाते कि हमारे यहां जज ऐसे हालात में कैसे काम करते हैं? केंद्र कहता है कि हम मदद को तैयार हैं लेकिन जिम्मा राज्यों का है और राज्य यह कह कर टाले रहते है कि फंड केंद्र को देना होता है।

चीफ जस्टिस की बेबाकी आईना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीफ जस्टिस की भावुकता पर तुरत हस्तक्षेप करते हुए ठिक कहा कि मैं ऐसा इंसान नहीं हूं जो बात सुनकर चला जाऊंगा। यदि संवैधानिक सीमाएं न हो तो चीफ जस्टिस की टीम और सरकार के प्रमुख लोग आपस में बैठ कर समाधान निकाले। मैं निश्चित ही कोई रास्ता ढूंढूगा।

रास्ता निकालना जरूरी है। हकीकत है कि मोदी सरकार ने अपनी तह जो कोशिश की उसे न्यायपालिका ने सही नहीं लिया। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ती आयोग के मुद्दे ने दोनों पक्षों में परस्पर सर्द रिश्ता बनाया है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बैंच ने जजों की नियुक्ती के अधिकार में नई व्यवस्था को किसी भी रूप में स्वीकार न करने की बात कर कार्यपालिका, विधायिका और सार्वजनिक विमर्श में अपनी जो स्थिति बनाई है उससे जिम्मा और जवाबदेही उसी की बनी है। कोई माने या न माने भारत की न्यायिक व्यवस्था की पहली जरूरत सुधार की है। आज मुकद्दमों की संख्या के कारण ही अदालतों का काम सवालों के घेरे में नहीं है बल्कि फैसलों की गुणवत्ता, पारदर्शिता, मनमानी और भ्रष्टाचार के कई पहलू भी इस व्यवस्था को घेरे हुए है। मामूली बात नहीं है कि मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के तुरंत बाद सबसे बडा फैसला राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन का लिया और उसे संसद ने सर्वानुमति से पास किया। इसलिए कि पक्ष हो या विपक्ष वह जनता की इस मनोभावना को जान –समझ रहा है कि न्यायपालिका में भी वैसे सुधार जरूरी है जैसे कार्यपालिका, राजनैतिक-चुनावी व्यवस्था में हुए है या हो रहे है। व्यवस्था के सभी अंग जवाबदेह बने, पारदर्शिता में बांधे जाए और सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट को बिल्कुल अनछुआ रखे तो धारणा क्या गलत नहीं बनेगी? हाल में पूरे देश ने देखा-समझा कि कैसे सुप्रीम कोर्ट को ही अपने रिटायर चीफ जस्टिस के कॉमन मेडिकल टेस्ट की व्यवस्था को खारिज करने का फैसला बदलना पडा या उत्तराखंड के चीफ जस्टिस के फैसले पर स्टे करना पडा।

कोई माने या न माने, मुकद्दमों के अटके रहने के साथ फैसलों की गुणवत्ता का सवाल अहम हो गया है। यह बहस बार-बार तथ्यों के साथ हो रही है कि न्यायिक व्यवस्था में भाई-भतीजावाद, कुछ परिवारों, लॉबियों का दबदबा, एकाधिकार हावी है। भारत में कानूनी शिक्षा में भारी फैलाव है। लाखों-लाख नौजवान इस पेशे में आ रहे है लेकिन ये जब डिग्री ले कर अदालतों में काम शुरू करते है तो समझ आता है कि दूर के ढोल सुहाने है। कुछ परिवार, पुराने पेशेवरों और लॉबियों में ही नियुक्तियां होती है और धंधेबाजी। इसलिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ती आयोग एक अनिवार्यताः है। इस मसले में मोदी सरकार को डटे रहना चाहिए। किसी दूसरे नाम से या तरीके से नियुक्ती व्यवस्था को पारदर्शी, ईमानदार और कंपीटिटिव बनाना चाहिए।

चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट को समझाना चाहिए कि नियुक्ती से पहले उसकी व्यवस्था समय के तकाजे के अनुसार बने।

सो यदि प्रधानमंत्री अपनी बात के पक्के है और चीफ जस्टिस को यदि नियुक्कियां करानी है तो दोनों तरफ की टीम को बैठ कर बीच का ऐसा नया रास्ता निकालना चाहिए जिससे जजों की हजारों पैंडिग नियुक्तियां नए तरीके से, नई पारदर्शिता से हो। नियुक्ती का बेसिक स्तर यूपीएससी की सिविल परीक्षा के साफ-सुथरे तरीके से ही होना चाहिए।

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