पेंडुलम की मानिंद नेपाली डेमोक्रेसी

●      श्याम सुंदर भाटिया

दुनिया में मानवीय हक-हकुकों के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली मुफीद मानी जाती है। अमेरिका से लेकर हिंदुस्तान की सियासत में लोकतंत्र के सफर की मिसाल बेमिसाल है। अमेरिका के ताजा तरीन जख्मों को न कुरेदें तो दोनों लोकतांत्रिक देशों का सिस्टम दीगर देशों के लिए अनुकरणीय है। भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान के सियासी और लोकतांत्रिक नासूरों का जिक्रा फिर कभी करेंगे, लेकिन फिलवक्त भारत समेत दुनिया की नजर नेपाल पर है। नेपाल में लोकतंत्र पेंडुलम मानिंद हिचकोले भर रहा है। संविधान और लोकतांत्रिक प्रणाली के दायरे में नेपाल, वहां के सियासी संग्राम, राजनीतिक गठबंधन की विश्वसनीयता, लोकतांत्रिक ढांचा, राजशाही-लोकशाही पर मंथन की दरकार है। नेपाल के 250 बरसों के इतिहास में डेमोक्रेसी सिस्टम नई-नवेली दुल्हन की मानिंद है। अंध ड्रैगन समर्थक वहां के प्रधानमंत्री श्री केपी शर्मा ओली और कल तक उनके सियासी मित्र रहे पुष्प कमल दहल प्रचंड के बीच सियासी चालें दुनिया के सामने हैं। नेपाल में सत्तारुढ़ दल- नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी -एनसीपी अब ओली-प्रचंड खेमों में दो फाड़ है। एक-दूसरे को नीचा दिखाने और एक-दूसरे से शक्तिशाली होने की होड़ लगी है। शतरंज के खेल की मानिंद शह और मात की चालें जारी हैं। प्रधानमंत्री ओली ने गए साल 20 दिसंबर को सत्ता संघर्ष के चलते अचानक प्रतिनिधि सभा को भंग करके राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी से देश में नए सिरे से चुनाव कराने की अनुशंसा कर दी थी। राष्ट्रपति भवन ने भी बिना समय गंवाए चंद घंटों बाद प्रतिनिधि सभा को भंग करके तीस अप्रैल और दस मई को चुनाव कराने का बिगुल बजा दिया था, लेकिन प्रचंड गुट ने ओली के इस असंवैधानिक कदम को ललकारते हुए कहा, नेपाल में मुश्किल से हासिल की गई संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य प्रणाली को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। प्रचंड भी चुप बैठने वालों में नहीं हैं। उन्होंने करीब एक माह बाद 22 जनवरी को ओली के खिलाफ एक बड़ी रैली करके 24 जनवरी को कार्यवाहक पीएम ओली को न केवल कम्युनिस्ट पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया, बल्कि प्रचंड गुट ने ओली की सदस्यता को भी प्रभाव से रद्द कर दिया। इससे पूर्व प्रचंड गुट ओली को अध्यक्ष पद से भी हटा चुका है।

ऐसे में पड़ोसी देश नेपाल में बड़ा सियासी भूचाल आ गया है। 68 साल के ओली के सियासी भविष्य पर सवाल दर सवाल उठने लगे हैं। क्या ओली अपने सियासी दुश्मन प्रचंड से हार मान लेंगे? पार्टी से बेदखल होने के बाद ओली की पीएम की कुर्सी चली जाएगी? क्या सुप्रीम कोर्ट ओली के पक्ष में फैसला देगी या फिर विपक्ष में? यह बाद दीगर है, ओली का प्रतिनिधि सभा को भंग किया जाना संवैधानिक नहीं है। नेपाल के संविधान विशेषज्ञ भीमार्जुन आचार्य इसे नेपाल के नए संविधान के साथ धोखा बताते हैं। कहते हैं, सिर्फ सरकार के अल्पमत या त्रिशंकु होने पर ही इसे भंग किया जा सकता है, लेकिन अभी ऐसे हालात नहीं थे। नेपाली सियासी गलियारों में चर्चा है, मनभेद और मतभेद इतने आगे बढ़ चुके हैं, राजनीति के चतुर खिलाड़ी ओली भी अपने सियासी दुश्मन से सहज पराजित होने वाले नहीं हैं। अब दोनों ही गुट नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी और चुनाव चिन्ह को लेकर अपने-अपने दावे पेश करेंगे। सत्ता की भूख की यह लड़ाई फिर से चुनाव आयोग से लेकर शीर्ष अदालत की शरण में होगी। प्रतिनिधि सभा भंग करने के खिलाफ प्रचंड खेमा पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहा है। एनसीपी से ओली को बाहर करने से पहले प्रचंड गुट ने वैधानिक गुणा-भाग किया है। प्रचंड गुट ने इस बड़े एक्शन से पहले ओली को पार्टी विरोधी गतिविधियों और संसद को भंग किए जाने के फैसले को लेकर को उनसे जवाब-तलब किया था। जारी कारण बताओ नोटिस में तीन दिन के भीतर जवाब देने को कहा गया था, लेकिन ओली ने कोई जवाब नहीं दिया।

नेपाल में प्रतिनिधि सभा और राष्ट्रीय सभा दो सदन हैं। सरकार बनाने के प्रतिनिधि सभा में बहुमत जरुरी होता है। प्रतिनिधि सभा के 275 ने से 170 सदस्य सत्तारुढ़ एनसीपी- नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के पास हैं। नेपाल में 2015 में नया संविधान बना था।  2017 में अस्तित्व में आई संसद का कार्यकाल 2022 तक का था। 2018 में ओली के नेतृत्व वाली सीपीएन -यूएमएल और पुष्प कमल दहल प्रचंड के नेतृत्व वाली सीपीएन (माओवादी केंद्रित) का विलय होकर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी -एनसीपी का गठन हुआ था। विलय के समय तय हुआ था, ढाई वर्ष ओली पीएम रहेंगे तो ढाई वर्ष प्रचंड पीएम रहेंगे। प्रचंड चाहते थे, एक पद-एक व्यक्ति के सिद्धांत पर एनपीसी को चलाया जाए, इसीलिए प्रचंड ओली पर पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने का दबाव डालते रहे, लेकिन ओली टस से मस नहीं हुए थे। इसके उलट जब प्रचंड को पीएम का पद सौंपने का वक्त आया तो उन्होंने संसद भंग करने की सिफारिश कर दी थी। उल्लेखनीय है, 44 सदस्यों वाली स्टैंडिंग कमेटी में भी ओली अल्पमत में थे। प्रचंड के पास 17, ओली के पास 14 और नेपाल के साथ 13 सदस्य हैं।  प्रतिनिधि सभा भंग करने से पूर्व भी दिलचस्प सियासी कहानी है। एनसीपी के असंतुष्ट प्रचंड गुट ने 20 दिसंबर की सुबह पीएम ओली के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पत्र का नोटिस दिया था। प्रचंड खेमे ने राष्ट्रपति से विशेष सत्र बुलाने का आग्रह भी किया था, लेकिन ओली समर्थकों को इसकी भनक लग गई थी। साथ ही साथ ओली अपने खिलाफ राजशाही वापसी को लेकर देश में हो रहे धरने और प्रदर्शन से भी खासे तनाव में थे। नतीजन प्रधानमंत्री ओली ने आनन-फानन में संसद भंग करने की सिफारिश कर दी थी। बताते हैं, इस अविश्वास प्रस्ताव को प्रचंड खेमे के मंत्रियों और 50 सांसदों का समर्थन प्राप्त था। 

नेपाल में राजशाही और लोकशाही की लुका-छिपी 70 बरसों से जारी है। इस पड़ोसी देश को पहले गोरखा राज्य के नाम से जाना जाता था। इसके इतिहास का जिक्र फिर कभी करेंगे। नेपाल में सबसे पहले 1951 में लोकतंत्र की स्थापना हुई। 1960 में राजा महेंद्र को लोकशाही अनुकूल नहीं लगी तो उन्होंने संसद को भंग कर दिया। इसी के साथ नेपाल में लोकतान्त्रिक व्यवस्था खत्म हो गई। राजशाही का फिर से कब्जा हो गया। 2008 में नेपाली राजशाही की फिर विदाई हो गई। माओवादियों ने चुनाव जीतने के बाद राजा को अपदस्थ   कर दिया था। अंततः नेपाल में नया संविधान 20 सितम्बर, 2015 को लागू हुआ। भारत  के डॉ. भीमराव आंबेडकर की मानिंद नेपाल की संविधान रचियता भी दलित समाज की कृष्णा कुमार पेरियार हैं। नेपाल इससे पहले दुनिया का एक मात्र हिन्दू राष्ट्र था, लेकिन मौजूदा संविधान में नेपाल धर्मनिरपेक्ष है। इसमें कोई शक नहीं, नेपाली डेमोक्रेसी आजकल कड़े इम्तिहान से गुजर रही है। संत कबीर दास ने कहा था, बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होए… सरीखा कथन मौजूदा वक्त में नेपाल के प्रधानमंत्री श्री केपी शर्मा ओली पर शत-प्रतिशत चरितार्थ हो रहा है।

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