विश्ववार्ता

नेतन्याहू की चेतावनी सही साबित हो रही- फ्रांस चरमपंथी इस्लाम के सामने झुक रहा है!


-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 20 अक्टूबर 2026 को मीडिया के बीच बहुत ही स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा कि फ्रांस “चरमपंथी इस्लाम के आक्रमण” के आगे समर्पण कर चुका है। “उन्होंने समय पर तैयारी नहीं की, बस हार मान ली। वे चरमपंथी इस्लाम के आगे झुक गए।” बेंजामिन नेतन्याहू ने सलाह दी है कि लड़ो, तुष्टिकरण मत अपनाओ। और कहा कि जो सात अक्टूबर 2023 को हमास का हमला हुआ था उस दिन ही उन्होंने इमैनुएल मैक्रों को चेतावनी दी थी कि “अगर हम इन्हें यहां नहीं खत्म करेंगे, तो वे पेरिस में होंगे, अब ठीक यही हो रहा है।”

ये बयान “आक्रामक” हैं क्योंकि सच्चाई आक्रामक होती है। फ्रांस वर्षों से जिहादी आतंकवाद, राजनीतिक इस्लामवाद की घुसपैठ और एकीकरण की विफलता से जूझ रहा है। 17 अक्टूबर 2026 की हिंसा, लूटपाट, आगजनी, सार्वजनिक इमारतों पर हमले को अल्ट्रा-वाम और अवसरवादी अपराधियों पर डालकर मुख्य समस्या को छिपाना आसान है, किेंतु नेतन्याहू का इशारा उस गहरी बीमारी की ओर है जो फ्रांस और पूरे पश्चिम को खोखला कर रही है। इस्लामी चरमपंथ! वस्‍तुत: यह कोई “भ्रम” नहीं है। यह दस्तावेजित, खूनी और विस्तारवादी विचारधारा है।

नेतन्याहू का बयान और फ्रांस की मौजूदा तस्वीर

नेतन्याहू ने यूरोप को “थका हुआ महाद्वीप” कहा और कट्टर वामपंथ तथा कट्टरपंथी इस्लाम दोनों को फ्रांस-ब्रिटेन के विनाश का जिम्मेदार ठहराया। वैसे उनका यह वक्‍तव्‍य फ्रांस द्वारा 2025 में फिलिस्तीन को मान्यता देने के बाद बिगड़े रिश्तों के बीच आया है, पर हम इसे सिर्फ राजनीति कहकर खारिज नहीं कर सकते हैं। 17 अक्टूबर को रोजगार, महंगाई और स्कूलों की स्थिति को आधार बनाकर प्रदर्शन हुए। आंकड़ों के मुताबिक 5.5 लाख से अधिक लोग सड़कों पर आए। शांतिपूर्ण मार्च के साथ-साथ ल्योन में पर्यटन कार्यालय जलाया गया, लिमोज में ऐतिहासिक नगर भवन आग की चपेट में आया, सैकड़ों दुकानें लूटी गईं, कारें जलाई गईं। करीब 2400 गिरफ्तारियां और लगभग 1000 पुलिसकर्मी बुरी तरह से घायल हुए हैं, किंतु ये पूरी कहानी नहीं है।

फ्रांसीसी शहरों में बार-बार होने वाली ऐसी हिंसा में प्रवासी पृष्ठभूमि के युवाओं की बड़ी भागीदारी देखी जाती रही है। 2005 के बनलीय दंगे भी इसी पैटर्न के थे। 2026 में भी कुछ स्थानों पर फिलिस्तीनी-अल्जीरियाई फ्लैग, व्यक्तिगत नारे और कुछ मुस्लिम छात्र संगठनों (जैसे Étudiants Musulmans de France, जिसे कुछ रिपोर्टों में मुस्लिम ब्रदरहुड से जोड़ा गया) की उपस्थिति दर्ज हुई। दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों और ट्रंप ने इसे आप्रवासन से जोड़ा। बेशक, सरकार ऐसी घटनाओं के बाद कोई अधिकारिक जातीय आंकड़े जारी नहीं करती, लेकिन समस्या को नकारा नहीं जा सकता है, न हीं “सिर्फ आर्थिक” कहकर रफा-दफा करना सही है।

फ्रांस को “लोकतंत्र का आदर्श” कहने वाले अक्सर ये भूल जाते हैं कि पिछले दो दशकों में यहां जिहादी हमलों की लंबी सूची है, जैसे कि  2015 में चार्ली हेब्दो हमला (12 मारे गए), बाटाकलान और अन्य हमलों में 130 से अधिक मौतें हुईं, जिसकी आईएसआईएस ने जिम्मेदारी ली। 2016 में नीस में ट्रक हमला के दौरान 86 मौतें।2012: टूलूज में मोहम्मद मेराह ने यहूदी स्कूल में बच्चों और सैनिकों को मारा। 2020: शिक्षक सैमुअल पैटी की सिर कलम करके हत्या, वह भी सिर्फ कार्टून दिखाने के लिए की गईं। ऐसे ही अन्‍य कई और हमले: स्ट्रासबर्ग, ट्रैक्टर हमले, चाकू हमले।

अब आप गहराई से विचार करें, इन सभी के पीछे कौन हैं? तब एक ही उत्‍तर आएगा, इस्‍लामिक जिहादी चरमपंथी!  ये “अकेले भेड़िए” नहीं थे। ये नेटवर्क, ऑनलाइन प्रचार, जेलों में कट्टरीकरण और विदेश से लौटे लड़ाकों से जुड़े थे। फ्रांसीसी खुफिया एजेंसियों ने हजारों कट्टरपंथी निगरानी सूची में डाले। मुस्लिम आबादी के एक छोटे लेकिन खतरनाक हिस्से में शरीयत को फ्रांसीसी कानून से ऊपर रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है, इसी चरमपंथ का यह परिणाम है कि फ्रांस जब चाहे तब अचानक से जल उठता है।

मई 2025 की सरकारी रिपोर्ट: राजनीतिक इस्लामवाद की घुसपैठ

मई 2025 में फ्रांसीसी गृह मंत्रालय की रिपोर्ट ने मुस्लिम ब्रदरहुड और राजनीतिक इस्लामवाद को “राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा” बताया। रिपोर्ट के अनुसार ब्रदरहुड से जुड़े संगठन स्कूलों, मस्जिदों और स्थानीय संस्थाओं में “एंट्रीज्म” (धीरे-धीरे घुसपैठ) कर रहे हैं। Musulmans de France को मुख्य शाखा बताया गया, जो सैकड़ों मस्जिदों और संगठनों को नियंत्रित करता है। लक्ष्य सिर्फ एक ही है- स्थानीय स्तर पर “इकोसिस्टम” बनाना, जन्म से मृत्यु तक मुसलमानों की जिंदगी को अपने नियमों से बांधना और धर्मनिरपेक्ष कानून को कमजोर करना।⁠

रिपोर्ट यह भी बताती है कि ये हिंसक जिहाद नहीं, बल्कि सूक्ष्म, दीर्घकालिक रणनीति है। कतर और तुर्की से धन आता है। मैक्रों ने उपायों का निर्देश दिया, लेकिन राजनीतिक दबाव और “इस्लामोफोबिया” के आरोप के डर से कार्रवाई कमजोर रही। अब यही वह “तुष्टिकरण” है जिसकी नेतन्याहू निंदा करते हैं।

विश्व स्तर पर इस्लामी चरमपंथ और जिहाद का खतरा

इस्लामी चरमपंथ कोई “फ्रांसीसी समस्या” नहीं है। यह वैश्विक विचारधारा है। सात अक्टूबर 2023 को हमास ने इजरायल में 1200 से अधिक लोगों की हत्या की, महिलाओं पर अत्याचार किए, बंधक बनाए। हमास का चार्टर और प्रचार खुले तौर पर यहूदियों के खिलाफ है और शरीयत आधारित शासन चाहता है। आईएसआईएस ने सीरिया-इराक में खलीफा घोषित कर याजिदियों, ईसाइयों और शियाओं का नरसंहार किया। बोको हराम, अल-शबाब, तालिबान, हौथी, ये सभी इसी धारा के हैं।

यूरोप में, ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग्स (ज्यादातर पाकिस्तानी-मुस्लिम पृष्ठभूमि), स्वीडन-जर्मनी-फ्रांस में नो-गो जोन जैसी शिकायतें, चर्चों पर हमले, यहूदी विरोधी घटनाएं। 2015-2017 के यूरोपीय हमलों की लहर आईएसआईएस से प्रेरित थी। आंकड़े बताते हैं कि पश्चिमी देशों में इस्लामी आतंकवाद अन्य विचारधाराओं से कहीं अधिक जानलेवा रहा है। वहीं, जिहाद की क्लासिकल व्याख्या में “दा’वाह” के साथ-साथ “किताल” (लड़ाई) शामिल है। आधुनिक जिहादी इसे “अविश्वासियों” के खिलाफ लागू करते हैं। राजनीतिक इस्लामवादी लोकतंत्र का इस्तेमाल करके बहुसंख्यक बनने के बाद नियम बदलना चाहते हैं। यूरोप में जन्म दर, आप्रवासन और समानांतर समाज इस प्रक्रिया को तेज करते हैं। नेतन्याहू का “पेरिस में होंगे” वाला दावा इसी तर्क पर आधारित है।

फ्रांस की रैंकिंग और सड़कों की सच्चाई

अब दृष्टि दूसरे नजरिए से भी विचार करने की है- फ्रांस प्रेस स्वतंत्रता और लोकतंत्र सूचकांकों में ऊंचा स्थान रखता है, किंतु जब ल्योन का पर्यटन कार्यालय जल रहा हो, दुकानें लूटी जा रही हों और पुलिस “नियंत्रण खो” चुकी हो, तो ये रैंकिंग खोखली लगती हैं। स्वतंत्रता का मतलब है कि कोई भी समूह, फिर चाहे अल्ट्रा-वाम हो या इस्लामी कट्टरपंथी या अन्‍य कोई ही क्‍यों न हो, वह कानून से ऊपर नहीं हो सकता है। फ्रांसीसी गणतंत्र का मॉडल “लाइसिटे” (धर्मनिरपेक्षता) पर टिका है। जब राजनीतिक इस्लामवाद इसको चुनौती देता है, तो राज्य को मजबूत जवाब देना चाहिए, न कि “सहिष्णुता” के नाम पर पीछे हटना!

नेतन्याहू की भाषा कुछ लोगों को “इस्लामोफोबिक” लगती है, यहां तथ्यों को नाम देने से डरना ही असली खतरा है। फ्रांस में मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा भले ही शांतिपूर्ण है, किंतु छोटे कट्टरपंथी अल्पसंख्यक और उनकी राजनीतिक छत्रछाया समस्या पैदा कर रही है। एकीकरण विफल रहा है क्योंकि कुछ समुदाय फ्रांसीसी मूल्यों को स्वीकार करने के बजाय अपनी समानांतर व्यवस्था चाहते हैं।

 लड़ने का समय

नेतन्याहू ने सही कहा है, तुष्टिकरण की नीति काम नहीं करती। फ्रांस को अपनी सीमाएं नियंत्रित करनी होंगी, कट्टरपंथी नेटवर्कों (हिंसक और राजनीतिक दोनों) पर सख्ती करनी होगी, 2025 की रिपोर्ट के सुझावों पर अमल करना होगा, और कानून का समान प्रवर्तन सुनिश्चित करना होगा। 17 अक्टूबर की हिंसा ने दिखाया कि राज्य सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में कमजोर पड़ रहा है। जब चरमपंथी ताकतें, चाहे वामपंथी हों या इस्लामी, सड़कों पर हावी होती जा रही हैं, तो सामान्य नागरिक और व्यवसायी नुकसान उठाते हैं।

विश्व के लिए इस्लामी चरमपंथ और जिहाद का खतरा कम नहीं हुआ है, दिनों दिन यह बढ़ता जा रहा है, भारत भी इससे लगातार लड़ रहा है । हमास, आईएसआईएस और उनके समर्थक अभी भी सक्रिय हैं। ऐसे में यूरोप अगर “थका हुआ” बना रहा, तो नेतन्याहू की चेतावनी सच साबित होती रहेगी। फ्रांस को अपने गणतंत्रवादी मूल्यों की रक्षा करनी होगी, न सिर्फ रैंकिंग में, बल्कि सड़कों पर। लड़ो। समर्पण मत करो। अन्‍यथा भविष्‍य में अपने मूल अस्‍तित्‍व को समाप्‍त होते देखने के लिए तैयार रहो!