राजनीति

पंजाब केसरी लाला लाजपत राय और हिसार: एक अटूट और ऐतिहासिक रिश्ता

​भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी, ‘पंजाब केसरी’ और ‘शेर-ए-पंजाब’ के नाम से विख्यात लाला लाजपत राय का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। यद्यपि उनका जन्म पंजाब के मोगा जिले के ढुडीके गांव में हुआ था और देश के लिए उनका सर्वोच्च बलिदान लाहौर में हुआ, लेकिन उनके संपूर्ण जीवन, व्यक्तित्व और राजनीतिक दर्शन को आकार देने में हरियाणा के ऐतिहासिक शहर ‘हिसार’ की भूमिका सबसे अहम रही है। हिसार लाला जी के लिए केवल एक शहर या कार्यस्थल नहीं था, बल्कि यह उनकी कर्मभूमि, उनकी ससुराल और उनके सामाजिक-राजनीतिक जीवन की पहली पाठशाला था। इस शहर के प्रति उनका विशेष और आत्मीय लगाव था, जिसने हिसार के इतिहास को हमेशा के लिए एक नई पहचान दी।

​लाला लाजपत राय का हिसार से रिश्ता उनके पेशेवर जीवन की शुरुआत से भी पहले जुड़ गया था। वर्ष 1877 में, जब वे मात्र 12-13 वर्ष के किशोर थे, उनका विवाह हिसार के एक प्रतिष्ठित अग्रवाल परिवार की कन्या राधा देवी से हुआ था। राधा देवी का परिवार हिसार के पुराने शहर स्थित ऐतिहासिक (मोहल्ला कानूगोयां) ‘जैन गली’ में निवास करता था। इस विवाह ने हिसार को लाला जी की ससुराल बना दिया। इसी पारिवारिक और गहरे व्यक्तिगत संबंध ने उनके मन में हिसार की मिट्टी, यहाँ की संस्कृति और यहाँ के लोगों के प्रति एक सहज और स्थायी प्रेम उत्पन्न किया।

​रोहतक से वकालत की परीक्षा पास करने के बाद, वर्ष 1886 में लाला लाजपत राय स्थायी रूप से अपनी ससुराल यानी हिसार आ गए। उन्होंने खजांचीयान बाजार के एक कोने पर स्थित मकान किराये पर लिया और अपनी वकालत की शुरुआत की। अपनी कुशाग्र बुद्धि, वाक्पटुता और न्यायप्रियता के बल पर वे जल्द ही हिसार के सबसे सफल, प्रतिष्ठित और लोकप्रिय वकीलों में गिने जाने लगे। हिसार के लोगों ने भी उन्हें एक बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने परिवार का हिस्सा मानकर भरपूर स्नेह दिया। लाला जी का हिसार से लगाव इसी बात से प्रमाणित होता है कि उन्होंने अपने जीवन को केवल अदालती मुकदमों और धन कमाने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि शहर के सर्वांगीण विकास का बीड़ा भी अपने कंधों पर उठा लिया।

​हिसार के नागरिक विकास में उनकी रुचि उनके गहरे शहर-प्रेम का प्रतीक थी। उनकी सर्वधर्म लोकप्रियता का सबसे बड़ा उदाहरण यह था कि वे एक मुस्लिम बाहुल्य वार्ड से निर्विरोध नगर पालिका पार्षद चुने गए। वर्ष 1889 में वे हिसार नगर पालिका के पहले भारतीय मानद सचिव बने। सचिव के पद पर रहते हुए, उन्होंने शहर की कायापलट करने का प्रयास किया। उन्होंने हिसार में पहली पक्की (मेटल्ड) सड़क का निर्माण करवाया, जो बिश्नोई धर्मशाला से होते हुए रेलवे स्टेशन तक जाती थी। नागरिक सुविधाओं और बुनियादी ढांचे में उनके इसी अभूतपूर्व योगदान के कारण, स्थानीय इतिहासकार उन्हें आदर के साथ ‘हिसार का शिल्पकार’ कहते हैं।
​लाला जी का हिसार के प्रति लगाव केवल भौतिक विकास तक सीमित नहीं था; वे यहाँ के निवासियों का बौद्धिक और आध्यात्मिक उत्थान भी चाहते थे। स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों से गहराई से प्रभावित होकर, उन्होंने 1886 में ही अपने सहयोगियों के साथ मिलकर हिसार में आर्य समाज की नींव रखी। उन्होंने व्यक्तिगत प्रयास और जनसहयोग से धन एकत्रित किया, जिसके परिणामस्वरूप 1893 में हिसार में भव्य आर्य समाज मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ। उन्होंने हिसार के मंच का उपयोग समाज में फैली छुआछूत, जातिगत भेदभाव और अशिक्षा जैसी कुरीतियों को मिटाने के लिए किया। शिक्षा के प्रसार के लिए उनके द्वारा किए गए प्रयासों ने ही बाद में इस क्षेत्र में दयानंद एंग्लो-वैदिक डीएवी शिक्षण संस्थानों के लिए एक मजबूत मार्ग प्रशस्त किया।हिसार के चंदूलाल एंग्लो – वैदिक उच्च विद्यालय (सीएवी ) जो लाला चंदू लाल रईस के सहयोग से उनके ही प्रयास का परिणाम हैं।

​इसके साथ ही, हिसार की जनता में राष्ट्रीयता और देशभक्ति की लौ जगाने का श्रेय भी लाला लाजपत राय को जाता है। उन्होंने हिसार में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली शाखा स्थापित की और शहरवासियों को स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा से जोड़ा। वे हिसार और यहाँ के लोगों का राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करने में गर्व महसूस करते थे। वर्ष 1888 (इलाहाबाद) और 1889 के कांग्रेस अधिवेशनों में उन्होंने हिसार के प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया और अपने साथ लाला चूड़ामणि और लाला छबीलदास जैसे स्थानीय नेताओं को भी राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाई।

​लाला लाजपत राय 1886 से 1892 तक, लगभग छह वर्ष हिसार में रहे। 1892 में राष्ट्रीय स्तर पर अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करने और उच्च न्यायालय में अभ्यास करने के उद्देश्य से वे लाहौर चले गए, लेकिन हिसार के साथ उनका भावनात्मक, वैचारिक और पारिवारिक संबंध जीवन पर्यंत बना रहा। हिसार उनके जीवन का वह उर्वरक मैदान था, जहां एक युवा और आदर्शवादी वकील ने खुद को एक कुशल प्रशासक, महान समाज सुधारक और देश के शीर्ष स्वतंत्रता सेनानी के रूप में गढ़ा। आज भी हिसार की हवाओं, उसकी पुरानी चार दीवारी की गलियों और आर्य समाज के इतिहास में लाला लाजपत राय की वह गहरी छाप और उनका इस शहर के प्रति वह विशेष लगाव जीवंत महसूस होता है।

सुरेश गोयल धूप वाला