नया चेहरा, नयी पार्टी 

अनिल अनूप
शिरोमणि अकाली दल से निष्कासित रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा, डॉ. रतन सिंह अजनाला और सेवा सिंह सेखवां अब नये अकाली दल का गठन करेंगे। रविवार को अमृतसर में बैठक के बाद ब्रह्मपुरा ने इसकी घोषणा की। आम  आदमी पार्टी के बागी एवं निलंबित नेता सुखपाल सिंह खेहरा और लोक इंसाफ पार्टी के प्रधान एवं लुधियाना से विधायक सिमरजीत सिंह बैंस भी उनके साथ होंगे।
ब्रह्मपुरा ने घोषणा की कि समानांतर शिरोमणि अकाली दल बनाया जाएगा, जिसके दरवाजे सभी के लिए खुले होंगे। आगे की रणनीति की घोषणा 14 दिसंबर को की जाएगी, जो शिअद का स्थापना दिवस भी है। खडूर साहिब से सांसद ब्रह्मपुरा ने कहा कि नयी पार्टी 1920 में गठित अकाली दल की मूल विचारधारा पर ही आधारित होगी। ब्रह्मपुरा के साथ मौजूद सेखवां और अजनाला ने कहा कि बादल-मजीठिया की पंथ विरोधी नीतियों का उन्होंने पार्टीलाइन के दायरे में विरोध किया, लेकिन उन्हें वह मुद्दे जनता की अदालत में उठाने चाहिये थे। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख को माफी, बरगाड़ी बेअदबी कांड और बहबल कलां में पुलिस फायरिंग जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए इन नेताओं ने सुखबीर बादल और बिक्रम मजीठिया पर अकाली दल को अपूरणीय क्षति पहुंचाने का आरोप लगाया। नेताओं ने कहा कि पिछले दस वर्षों से अकाली दल पर बादल और मजीठिया परिवारों का कब्जा है। इन दोनों परिवारों ने पार्टी के सिद्धांतों को दरकिनार कर पंथक मसलों के हल के लिए कार्य करने के बजाए अपने राजनीतिक हितों को प्राथमिकता दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि बादल और मजीठिया परिवार ने केबल, रेत-बजरी, परिवहन और भू-माफिया बनाकर राज्य को लूटा तथा आपराधिक तत्वों को अपने राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि बादल के नेतृत्व वाले अकाली दल को सिखों ने पूरी तरह से नकार दिया है। पंथ विरोधी नीतियों के कारण ही गत विधानसभा चुनाव में अकाली दल 15 सीटों पर सिमट गया। उन्होंने कहा कि वैसे भी बादल परिवार ने उसे ‘प्राइवेट लिमिटेड’ कंपनी बना रखा है।पंजाब की सिख राजनीति एक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। परिवर्तन का यह दौर पूर्व में स. प्रकाश सिंह बादल की सरकार के दौरान उस समय से शुरू हो गया था जब वरिष्ठ अकाली नेताओं की जगह उनके युवा बेटे-बेटियों को अकाली सरकार व संगठन में स्थान देने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। प्रकाश सिंह बादल ने पहले अपने साथी व सहयोगी अकाली नेताओं के बेटे-बेटियों को सरकार व संगठन में स्थापित करने के बाद अपने बेटे सुखबीर बादल को आगे किया था। सुखबीर पिछले एक दशक से अकाली दल बादल के केन्द्र बिन्दू बने हुए हैं। अगर अकाली दल बादल इस बार भी प्रमुख विपक्षी दल बनकर उभरने में सफल हो जाता तो शायद अब भी बागी सुर सुनने को न मिलते।अकाली दल बादल को पिछले विधानसभा चुनावों में मिली हार के एक नहीं अनेक कारण है। लेकिन एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि जो लोग आज बगावत की राह पर चल रहे हैं यह अतीत में सत्ता सुख पाते समय अपने कर्तव्य, कर्म करने को भी भूल गए थे। अपने क्षेत्र व क्षेत्र के लोगों के प्रति जवाबदेह रवैया न अपनाते हुए केवल और केवल बादल परिवार की ओर आंख लगाए रखे। आज इनको लगता है कि उनका राजनीतिक भविष्य बादल के नेतृत्व में धूमिल है, इसलिए वह जहां अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं वहीं अकाली दल बादल के तथा बादल व मजीठिया परिवार के विरोधियों को भी साथ आने का आह्वान कर रहे हैं।2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों तक तो शायद नया अकाली दल अपना संगठन बनाने में तो सफल हो लेकिन चुनावी सफलता मुश्किल है। जहां तक 2022 में हो होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों का प्रश्न है तब तक उपरोक्त नेताओं और उनके संगठन की क्या स्थिति बनती है, उस बारे ठोस रूप से तो आज कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन संभावना यही है कि यह वरिष्ठ नेता तब तक थक-हार कर बैठ जाएंगे। क्षणिक चर्चा से अधिक नया अकाली दल पंजाब की राजनीति में कोई विशेष भूमिका निभाने में सफल नहीं होने वाला।

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