निर्भयी योद्धा और विद्धानों के संरक्षक थे गुरू गोबिंद सिंह-

योगेश कुमार गोयल

सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह जी का 354वां प्रकाश पर्व पटना में तख्त श्री हरिमंदिर पटना साहिब में 20 जनवरी को मनाया जा रहा है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार गुरु गोबिंद सिंह का जन्म 1667 ई. में पौष माह की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को 1723 विक्रम संवत् को पटना साहिब में हुआ था और इस साल 20 जनवरी को यह तिथि है, इसीलिए इसी दिन गुरु गोबिंद सिंह का प्रकाशोत्सव मनाया जाएगा। वैसे गुरु गोबिंद सिंह जयंती दिसम्बर तथा जनवरी के महीने में कभी-कभार एक वर्ष में दो बार भी आती है, जिसकी गणना हिन्दू विक्रमी संवत् कैलेंडर के अनुसार ही की जाती है। बचपन में गुरु गोबिंद सिंह जी को गोबिंद राय के नाम से जाना जाता था। उनके पिता गुरु तेग बहादुर सिखों के 9वें गुरु थे। पटना में रहते हुए गुरू जी तीर-कमान चलाना, बनावटी युद्ध करना इत्यादि खेल खेला करते थे, जिस कारण बच्चे उन्हें अपना सरदार मानने लगे थे। पटना में वे केवल 6 वर्ष की आयु तक ही रहे और सन् 1673 में सपरिवार आनंदपुर साहिब आ गए। यहीं पर उन्होंने पंजाबी, हिन्दी, संस्कृत, बृज, फारसी भाषाएं सीखने के साथ घुड़सवारी, तीरंदाजी, नेजेबाजी इत्यादि युद्धकलाओं में भी महारत हासिल की। कश्मीरी पंडितों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए उनके पिता और सिखों के 9वें गुरु तेग बहादुर जी द्वारा नवम्बर 1975 में दिल्ली के चांदनी चौक में शीश कटाकर शहादत दिए जाने के बाद मात्र 9 वर्ष की आयु में ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखों के 10वें गुरू पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली और खालसा पंथ के संस्थापक बने।
शौर्य और साहस के प्रतीक तथा इतिहास को नई धारा देने वाले अद्वितीय, विलक्षण और अनुपम व्यक्तित्व के स्वामी गुरु गोबिंद सिंह जी को इतिहास में एक विलक्षण क्रांतिकारी संत व्यत्वित्व का दर्जा प्राप्त है। अत्याचार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए उनका वाक्य ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं तां गोबिंद सिंह नाम धराऊं’ सैकड़ों वर्षों बाद आज भी प्रेरणा और हिम्मत देता है। ‘भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन’ वाक्य के जरिये वे कहते थे कि किसी भी व्यक्ति को न किसी से डरना चाहिए और न ही दूसरों को डराना चाहिए। उन्होंने समाज में फैले भेदभाव को समाप्त कर समानता स्थापित की थी और लोगों में आत्मसम्मान तथा निडर रहने की भावना पैदा की। एक आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ वे एक निर्भयी योद्धा, कवि, दार्शनिक और उच्च कोटि के लेखक भी थे। उन्हें विद्वानों का संरक्षक भी माना जाता था। दरअसल कहा जाता है कि 52 कवियों और लेखकों की उपस्थिति सदैव उनके दरबार में बनी रहती थी और इसीलिए उन्हें ‘संत सिपाही’ भी कहा जाता था। उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की थी।
‘बिचित्र नाटक’ को गुरु गोबिंद सिंह की आत्मकथा माना जाता है, जो उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह ‘दशम ग्रंथ’ का एक भाग है, जो गुरु गोबिंद सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है। इस दशम ग्रंथ की रचना गुरू जी ने हिमाचल के पोंटा साहिब में की थी। कहा जाता है कि एक बार गुरु गोबिंद सिंह अपने घोड़े पर सवार होकर हिमाचल प्रदेश से गुजर रहे थे और एक स्थान पर उनका घोड़ा अपने आप आकर रुक गया। उसी के बाद से उस जगह को पवित्र माना जाने लगा और उस जगह को पोंटा साहिब के नाम से जाना जाने लगा। दरअसल ‘पोंटा’ शब्द का अर्थ होता है ‘पांव’ और जिस जगह पर घोड़े के पांव अपने आप थम गए, उसी जगह को पोंटा साहिब नाम दिया गया। गुरु जी ने अपने जीवन के चार वर्ष पोंटा साहिब में ही बिताए, जहां अभी भी उनके हथियार और कलम रखे हैं।
1699 में बैसाखी के दिन तख्त श्री केसगढ़ साहिब में कड़ी परीक्षा के बाद पांच सिखों को ‘पंज प्यारे’ चुनकर गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी, जिसके बाद प्रत्येक सिख के लिए कृपाण या श्रीसाहिब धारण करना अनिवार्य कर दिया गया। वहीं पर उन्होंने ‘खालसा वाणी’ भी दी, जिसे ‘वाहे गुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह’ कहा जाता है। उन्होंने जीवन जीने के पांच सिद्धांत दिए थे, जिन्हें ‘पंच ककार’ (केश, कड़ा, कृपाण, कंघा और कच्छा) कहा जाता है। गुरु गोबिंद सिंह ने ही ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को सिखों के स्थायी गुरु का दर्जा दिया था। सन् 1708 में गुरु गोबिंद सिंह ने महाराष्ट्र के नांदेड़ में शिविर लगाया था। वहां जब उन्हें लगा कि अब उनका अंतिम समय आ गया है, तब उन्होंने संगतों को आदेश दिया कि अब गुरु ग्रंथ साहिब ही आपके गुरु हैं। गुरु जी का जीवन दर्शन था कि धर्म का मार्ग ही सत्य का मार्ग है और सत्य की हमेशा जीत होती है। वे कहा करते थे कि मनुष्य का मनुष्य से प्रेम ही ईश्वर की भक्ति है, अतः जरूरतमंदों की मदद करो। अपने उपदेशों में उनका कहना था कि ईश्वर ने मनुष्यों को इसलिए जन्म दिया है ताकि वे संसार में अच्छे कर्म करें और बुराई से दूर रहें।
उन्होंने कई बार मुगलों को परास्त किया। आनंदपुर साहिब में तो मुगलों से उनके संघर्ष और उनकी वीरता का स्वर्णिम इतिहास बिखरा पड़ा है। सन् 1700 में दस हजार से भी ज्यादा मुगल सैनिकों को सिख जांबाजों के सामने मैदान छोड़कर भागना पड़ा था और गुरु जी की सेना ने 1704 में मुगलों के अलावा उनका साथ दे रहे पहाड़ी हिन्दू शासकों को भी करारी शिकस्त दी थी। मुगल शासक औरंगजेब की भारी-भरकम सेना को भी आनंदपुर साहिब में दो-दो बार धूल चाटनी पड़ी थी। गुरु गोबिंद सिंह के चारों पुत्र अजीत सिंह, फतेह सिंह, जोरावर सिंह और जुझार सिंह भी उन्हीं की भांति बेहद निडर और बहादुर योद्धा थे। अपने धर्म की रक्षा के लिए मुगलों से लड़ते हुए गुरु गोबिंद सिंह ने अपने पूरे परिवार का बलिदान कर दिया था। उनके दो पुत्रों बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह ने चमकौर के युद्ध में शहादत प्राप्त की थी। 26 दिसम्बर 1704 को गुरु गोबिंद सिंह के दो अन्य साहिबजादों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं करने पर सरहिंद के नवाब द्वारा दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया था और माता गुजरी को किले की दीवार से गिराकर शहीद कर दिया गया था। नांदेड़ में दो हमलावरों से लड़ते समय गुरु गोबिन्द सिंह के सीने में दिल के ऊपर गहरी चोट लगी थी, जिसके कारण 18 अक्तूबर 1708 को नांदेड में करीब 41 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई थी। नांदेड़ में गोदावरी नदी के किनारे बसे हुजूर साहिब में उन्होंने अंतिम सांस ली थी।

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