लेखक परिचय

हिमकर श्‍याम

हिमकर श्‍याम

वाणिज्य एवं पत्रकारिता में स्नातक। प्रभात खबर और दैनिक जागरण में उपसंपादक के रूप में काम। विभिन्न विधाओं में लेख वगैरह प्रकाशित। कुछ वर्षों से कैंसर से जंग। फिलहाल इलाज के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से रचना कर्म। मैथिली का पहला ई पेपर समाद से संबद्ध भी।

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हिमकर श्याम

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के संघर्ष को अपार जनसमर्थन मिला है। अन्ना को मिल रहा यह समर्थन दरअसल आम जनता की निराशाओं और आक्रोशों का प्रतिबिंब है। अन्ना ने आम लोगों के भीतर पनप रहे गुस्से को आवाज दी है। शायद यह पहला मौका है जब संसदीय राजनीति आमलोगों के निशाने पर है। परिर्वतन और बदलाव के लिए जो जिद और जुनून चाहिए वह अन्ना की टीम में मौजूद है। जरूरत है इस जज्बे को कारगर मुकाम तक ले जाने की। जनसमूह की इस ताकत का इस्तेमाल व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव के लिए किया जाये तो यह इस आंदोलन की बड़ी सफलता होगी। टीम अन्ना को इस बात का ध्यान रखना होगा कि लोगों का यह उबाल अंजाम तक पहुँचने के पहले ही शिथिल न पड़ जाये। अन्ना का यह संघर्ष अचानक दिखनेवाली क्षणिक चमक मात्र बनकर नहीं रहे, बल्कि यह निरंतर चलनेवाली क्रांतिकारी संघर्ष की प्रक्रिया का हिस्सा बने ताकि वास्तविक स्वराज हासिल किया जा सके।

अब वक्त आ गया है कि यह आंदोलन जनलोकपाल के दायरे से आगे बढ़ कर पूरी व्यवस्था में परिवर्तन की कोई राह निकाले। जन लोकपाल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकता है, भ्रष्टाचार से मुक्त व्यवस्था की उम्मीद इससे नहीं की जा सकती है। समाज में ऐसी बहुत समस्याएं हैं जिनपर तत्काल ध्यान दिये जाने की जरूरत है। हमारी पूरी व्यवस्था बाजारी अर्थव्यवस्था के अधीन है। लोगों की मानसिकता में बदलाव, कॉरपोरेट शासन से मुक्ति और चुनाव प्रक्रिया में सुधार पर भी विचार जरूरी है। ऐसे मौके पहले भी आये हैं लेकिन सब सत्ता परिवर्तन का आंदोलन बन कर रहे गये उससे व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आया। जे.पी का आन्दोलन एक समग्र आंदोलन था जिसका मुख्य ध्येय था शिक्षा प्रणाली में सुधार, सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार का उन्मूलन, भ्रष्ट मंत्रियों और विधायकों के विरूद्ध चेतना जगाना तथा नये मूलभूत चुनावी संशोधनों को लागू करना ताकि स्वच्छ और सस्ते चुनाव हो सके। जेपी़ की संपूर्ण क्रांति सत्ता परिवर्तन की क्रांति बन कर ही रह गयी। स्वराज का अर्थ है देश की बहुसंख्यक जनता का शासन। जाहिर है जहां बहुसंख्यक जनता नीति भ्रष्ट हो या स्वार्थी हो वहां सरकार अराजकता की स्थिति ही पैदा करेगी, उससे ज्यादा कुछ नहीं। वास्तविक स्वराज की स्थापना वहीं हो सकती है, जहां देशवासियों की ज्यादा संख्या ऐसे लोगों की हो जिनके लिए दूसरी सब चीजों से ज्यादा महत्व देश की भलाई हो। इसमें जिसमें निजी लाभ और स्वार्थ भी शामिल है।

व्यवस्था की विसंगति कहीं न कहीं हमारे निजी चरित्र से जुड़ी हुई है। समाज, राजनीति और प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार जनांदोलनों से प्रभावित होगा, ऐसा नहीं लगता। यह ऐसी समस्या है जिसके खात्मे के लिए जन आंदोलन की नहीं बल्कि जन आचरण में सुधार की जरूरत है। समाज का चरित्र गढ़ने की आवश्यकता है। कभी चरित्र निर्माण स्कूली शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा था। नैतिकता का पाठ पढ़ कर आदमी भ्रष्ट आचरण करने के पूर्व एक बार जरूर सोचा करता था। शायद इस वजह से भ्रष्टाचार पहले इतने व्यापक और वीभत्स रूप में नहीं था। समाज में अब इन बातों का कोई महत्व नहीं रह गया है। समाज में चरित्र का स्थान गौण हो गया है। हमारी व्यवस्था ऐसी हो गयी है कि यदि कोई ईमानदारी से अपने कर्त्तव्यों का निवर्हन करना भी चाहे तो वह ऐसा कर नहीं पाता। ईमानदार बने रहने के लिए अक्सर मानसिक यातनाओं से गुजरना पड़ता है।

महात्मा गांधी का मानना था कि जनता की ओर से की जानेवाली निगरानी ही भ्रष्टाचार से लड़ने का एक असरदार तरीका हो सकती है। लेकिन तब की और आज की स्थिति में बहुत फर्क आया है। तब भ्रष्टाचार इतने बड़े पैमाने पर नहीं था, रोजमर्रा की जिंदगी इससे प्रभावित नहीं थी। आज भ्रष्टाचार जीवन का अनिवार्य अंग बन गया है। सरकार, प्रशासन पूरी तरह से भ्रष्ट लोगों के हाथों में है। गांधी को जिस जनता से निगरानी की अपेक्षा थी वह जनता भी इसका हिस्सा बन चुकी है। समाज का हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में जाने-अनजाने इस खेल में शामिल है। कोई मजबूरी में, कोई सुविधाओं के लिए, कोई निजी स्वार्थां के लिए तो कोई अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्त्ति के लिए। उपभोक्तावादी संस्कृति ने भ्रष्टाचार को और गंभीर बना दिया है। अधिकांश आदमी आज अपनी हैसियत से बेहतर जीवन जीने को लालायित है। पैसा काम कराने और कुछ भी पा लेने का माध्यम बन गया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का कोई भी अंग जनता के प्रति ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ नजर नहीं आ रहा है। पूर्व केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा का दावा सही मानें तो देश के तीस फीसदी लोग पूरी तरह से भ्रष्ट हैं और बमुश्किल २० फीसदी लोग पूरी तरह से ईमानदार माने जा सकते हैं। भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए देश में कई कानून मौजूद हैं। कैग, सीबीआई, पुलिस, जेपीसी, न्यायपालिका जैसी तमाम संस्थाएं हैं। इसके बावजूद भ्रष्टाचार अपनी जगह कायम है। दरअसल व्यवस्था में व्याप्त खामियों की वजह से सारी संस्थाएं निष्प्रभावी हो चुकी हैं। यदि जनलोकपाल बिल पास हो जाये तो भी भष्टाचार नहीं रूकेगा। पहले भी भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए अनगिनत आयोग एवं समितियां गठित की गईं लेकिन नतीजा सिफर रहा। सूचना कानून बन जाने के बाद लोगों को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए एक कारगर हथियार मिला, पर क्या सूचना आयोग भी अपनी जिम्मेवारी सही तरीके से नहीं निभा रहा है?

भ्रष्टाचारी ताकतों के आगे सरकार और व्यवस्था लाचार है। यह अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को भी प्रभावित कर रहा है। भ्रष्टाचार का खामियाजा सबसे अधिक गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। मुनाफाखोरी और जमाखोरी के कारण महंगाई बढ़ती जा रही है। बाजार पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। आम आदमी को मिलनेवाली सुविधाएं महंगी हो रही हैं। विकास की दौड़ में काफी पीछे रह गये इस तबके को अपने लिए चलायी जा रही योजनाओं की सुविधाएं प्राप्त करने के लिए भी रिश्वत देना पड़ता है। इसमें मनरेगा जैसी गरीबों के हितों का ध्यान में रखनेवाली योजना भी शामिल है। कैग ने अपनी सालाना रिपोर्ट में इस योजना में जारी करप्शन पर ऊंगली उठायी है। विधायक और सांसद निधि से होनेवाले विकास कार्यों में कमीशनबाजी और भ्रष्टाचार की बात लंबे अरसे से चल रही है। कई राजनैतिक दलों ने इस निधि के खात्मे की बात भी कही, लेकिन मामला वहीं का वहीं रहा। बिहार के मुख्यमंत्री ने इसके खात्मे की पहल कर एक उदाहरण जरूर पेश किया है। सरकारी कार्यालयों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले लगातार सुर्खियां बटोरते रहते है। कुछ छोटे अधिकारियों के खिलाफ कभी-कभी कार्रवाई भी की जाती है। मगर अधिकांश मामलों में बड़े अधिकारियों पर हाथ नहीं डाला जाता। स्थानीय निकाय से लेकर प्रधानंत्री कार्यालय तक भ्रष्टाचार के घेरे में हैं। उच्चतम न्यायालय ने सरकारी विभागों में फैले भ्रष्टाचार पर गहरी चिंता जताते हुए एक बार कहा था कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में भ्रष्टाचार पर कोई नियंत्रण नहीं है, विशेष रूप से इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स और एक्साइज विभाग में अधिक भ्रष्टाचार है। पहले पुलिस, आबकारी और पीडब्लूडी सबसे भ्रष्ट विभाग माने जाते थे। प्रबंध सलाहकार कंपनी के ताजा सर्वें में रीयल स्टेट, टेलीकॉम, शिक्षा व गरीबी उन्मूलन, बैंकिंग व बीमा, रक्षा, आइटी, वीपीओ और ऊर्जा को भ्रष्ट क्षेत्र माना गया है। सर्वें में के अनुसार रीयल स्टेट और टेलीकॉम सबसे भ्रष्ट क्षेत्र हैं।

पिछले कुछ दिनों में हाउसिंग लोन कांड, बैंक एफडी घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला और टेलीकॉम घोटाले उजागर हुए, जिनकी राशि खरबों में हैं। मौजूदा लोकसभा में १८२ सांसद ऐसे हैं जिनपर भ्रष्टाचार और अपराध के मामले दर्ज हैं। कई क्षेत्रीय दलों के नेता भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे हुए हैं। घोटाले का खेल केंद्र में नहीं राज्यों में भी चल रहा है। झारखंड जैसे प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और मंत्री अरबों के मालिक हैं। कई मुख्यमंत्रियों और पूर्व मुख्यमंत्रियों पर आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज है। मुलायम सिंह, लालू प्रसाद यादव, ओम प्रकाश चौटाला, मायावती, जयललिता उनमें प्रमुख हैं। कनार्टक की बीजेपी सरकार पर जमीन घोटाले के आरोप लगाए गये हैं। टेलीकॉम घोटाले ने तो उद्योगजगत, नौकरशाही, राजनेताओं और मीडिया के सांठ-गांठ का चौंकानेवाले चेहरा उजागर किया है।

पुणे के हवाला कारोबारी हसन अली खान पर टैक्स चोरी और हवाला लेन-देन का मामला चल रहा है। हसन जैसे आर्थिक अपराधी कई और भी हैं। अनुमानतः विदेशी बैंकों में सर्वाधिक धन नेताओं के ही हैं। आजादी के बाद से अब तक ५०० अरब डालर भारत से बाहर ले जाया गया है। यह पैसा देश की बुनियादी विकास की जरूरतों को पूरा कर सकता था। जीएफआई (ग्लोबल फाइनेंशियन इंटेग्रिटी) के अध्ययन का अनुमान है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की कुल अवैध रकम का करीब ७२.२ फीसदी विदेशों में जमा है। पिछले साल स्विट्जरलैंड ने कहा था कि वह उन भारतीयों के नाम उजागर करने को तैयार है जिन्होंने स्विस बैंकों में अरबों रुपये जमा कर रखे हैं। इसके बावूजद सरकार उन खाताधारियों का नाम उजागर नहीं कर पायी। भाजपा इस मुद्दे पर लगातार सरकार को घेरती रही है। भाजपा ने २००९ के आम चुनावों में प्रचार के दौरान विदेशों में जमा काले धन को चुनावी मुद्दा भी बनाया था। काले धन पर हल्ला मचानेवाली भाजपा भी अपने छह साल के शासन में इसपर कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पायी थी। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकारें असहाय और मूकदर्शक बनी हुई हैं। मनमोहन सिंह की जिस ईमानदार और बेदाग छवि के बूते यूपीए दोबारा सत्ता में आयी थी, मंहगाई और भ्रष्टाचार ने उस छवि को धूमिल कर दिया। उनकी सरकार काले धन को लेकर भी पिछले कुछ समय से आरोपों का वार झेल रही है। इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी से जनता के बीच गलत संदेश जा रहा है। विकीलिक्स का खुलासा सवाल खड़ा करता है।

उच्च पदों पर बैठे लोगों में भ्रष्टाचार के संबंध में महात्मा गांधी ने आजादी के बाद ही चेतावनी दी थी। भ्रष्टाचार पर बोलते हुए उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जरूरत है। भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लगायी गयी तो यह देश और पार्टी दोनों को नुकसान पहुंचाएगा। सरदार पटेल सार्वजनिक जीवन में सर्वोच्च ईमानदारी के पक्षधर नेताओं में से थे। राजनीतिक भ्रष्टाचार पर उनका रवैया काफी सख्त था। डॉ राधाकृष्णन का मानना था कि जब तक भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद सत्ता की लालसा, मुनाफाखोरी और कालाबाजारी का नाश नहीं होगा तब तक जीवनोपयोगी वस्तुओं के उत्पादन और वितरण के साथ-साथ प्रशासन में कार्यकुशलता का स्तर बढ़ाने में हम सक्षम नहीं हो पाएंगे। इन बातों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। मंत्रियों से संबंधित भ्रष्टाचार पर नेहरू का रवैया नरम था। यदि नेहरू शुरू में ही पूंजीपतियों एवं भ्रष्ट नेताओं को प्रश्रय देने से बचते तो आज देश की स्थिति भिन्न होती। दो बार कार्यवाहक प्रधानंमत्री की जिम्मेदारी निभानेवाले गुलजारी लाल नंदा ने राजनीति के बदलते स्वरूप को देखते हुए कहा था कि आपराधिक स्तर की राजनीति कैंसर के समान घातक होगी। उनका यह कथन आज बिल्कुल सही प्रतीत होता है। प्रधानमंत्री के रूप में लाल बहादुर शास्त्री ने उच्च पदों पर भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कुछ साहसिक कदम जरूर उठाए। संथानम कमिटी उन्हीं के समय बनायी गयी थी और केन्द्रीय सतर्कता आयोग का भी गठन किया गया।

आजादी को छह दशक हो गये। पहले तीन दशक में देश की सत्ता में कांग्रेस पार्टी का एकाधिकार कायम रहा। ज्यादतर प्रदेशों में कांग्रेस की सरकार रही। इसलिए घोटालों की फेहरिस्त में इस पार्टी का नाम सबसे ऊपर है। लेकिन अन्य पार्टियां भी खुद को इससे अलग नहीं रख सकीं। भ्रष्टाचार के मामले में सभी राजनीतिक पार्टियां एक सी हैं। भ्रष्टाचार पर वह तभी तक गंभीर दिखती हैं जब तक वे सत्ता से दूर रहती हैं। सत्ता मिलते ही सबकुछ पूर्ववर्ती सरकारों की तर्ज पर ही चलता है। सत्ता में आने के बाद सभी की कार्यशैली कमोवेश एक जैसी ही रहती है। लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति जनता के हाथों में है। जनता ही संसद और विधानसभा में अपने प्रतिनिधि चुन कर भेजती है। अगर अपने अधिकारों का प्रयोग वह ईमानदारी से नहीं करती तो उसे शिकायत का कोई हक नहीं है।

व्यवस्था की सारी शक्तियां व्यापारियों, उद्योगपतियों व कारपोरेट जगत के हाथों में है। चुनाव में अरबों रूपये बहाये जाते हैं। इस चुनावी खर्च के लिए राजनेताओं, व्यापारियों, नौकरशाहों और दलालों का एक गठजोड़ तैयार हो गया है। सभी एक दूसरे के हितों को ध्यान में रखकर काम करते हैं। हर पार्टी के कुछ खास नेताओं पर इस उगाही का जिम्मा होता है। इस धन का उपयोग चुनावों के अलावा सरकारें बनाने और गिराने के लिए भी किया जाता रहा है। गांधीजी चुनावों के लिए चंदा लेने के खिलाफ थे। लेकिन राजनीतिक पार्टियां द्वारा पूंजीपतियों से चुनाव निधि के लिए चंदा उगाहना और सत्ता में आने के बाद चंदे के बदले आर्थिक लाभ पहुंचाने की परंपरा सी बन गयी है। साठ के दशक में ही राजनीति में काले धन की बात सामने आ गयी थी। भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनी १९६४ में संथानम कमिटी की रिपोर्ट में राजनीति और काले धन के गठजोड़ पर चिंता जतायी गयी थी। इस पर विचार के बजाए नीति निर्धारकों ने आयकर की धारा के तहत राजनीतिक पार्टी को दिये गये चंदे पर छूट का प्रावधान कर दिया। समाजसेवा का दावा करनेवाली सामाजिक और धार्मिक संगठनों में भी यह प्रवृत्ति दिखलायी पड़ती है। सारे संगठन पैसा बनाने का माध्यम मात्र हैं। धर्म और आस्था भारतीय समाज में बेहद संवेदनशील मसले हैं। बाजार ने धर्म का चेहरा कारपोरेट बना दिया।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात नयी नहीं है। उच्चतम न्यायालय की एक पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के बारे में कहा था कि समथिंग इज राटेन अर्थात यहां कुछ सड़ गया है, उसकी साफ-सफाई की आवश्यकता है। सन २००१ में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्त्ति एस.पी.भरूचा ने कहा था कि न्यायालयों के २० फीसदी न्यायाधीश भ्रष्ट हो चुके हैं। बाजारवाद ने जीवन के हर पहलू को प्रभावित किया है। मीडिया की साख और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे हैं। मीडिया में वह ही दिखलाया जा रहा है जो बाजार दिखलाना चाहता है। बाजार ने ही पेड न्यूज और मीडिया पैकेज जैसे शब्दों को जन्म दिया है जिसने प्रायोजित समाचारों और सूचनाओं की राह खोली है। पेड न्यूज यानी पैसे के एवज में खबरें छापना। इसके पूर्व भी मीडिया पर सत्ता की दलाली और पैरोकारी के मामले सामने आते रहे हैं। आम जनता के नजर में सर्वाधिक विश्वसनीय हमारी सेना है। सेना में उठ रहे भ्रष्टाचार के मामले चिंता का विषय है।

संकट जनता के भरोसे का है। भ्रष्टाचार एक बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने खड़ा है। कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया सभी की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। कोई भी सही तरीके से अपने दायित्वों का निवर्हन नहीं कर रहा है। भ्रष्टाचार से पूरी तरह से मुक्त समाज की परिकल्पना संभव नहीं है। जनता तात्कालिक लाभ का मोह त्याग कर सड़कों पर उतरेगी, तभी इसका हल निकल सकता है। जो लोग भ्रष्टाचार की मुहिम चला रहे हैं या उससे जुड़ रहे हैं, उनकी ईमानदारी संदेह से परे होनी चाहिए। बदलाव जरूरी है और इसकी शुरुआत कहीं न कहीं से होनी चाहिए। अन्ना का आंदोलन बदलाव का वाहक बन सकता है बशर्तें भीड़ में शामिल लोग बदलाव की शुरुआत खुद को बदल कर करें।

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