लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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mamtaमृत्युंजय दीक्षित
8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 व एक हजार के नोटों के बंद करने की घोषणा के बाद विपक्ष जनता के समक्ष आ रही समस्याओं का मुददा उठाकर पीएम मोदी व केंद्र सरकार को हर तरह से घेरने का प्रयास कर रहा है। लेकिन वह इसमें विफल होता जा रहा है। नोटबंदी के खिलाफ 13 दलों के मोर्चे ने विगत 2 नवंबर को आक्रोश दिवस व भारतबंद का ऐलान किया था। लेकिन इसके विपरीत पीएम मोदी ने कुशीनगर की जनसभा में जनता के सामने बोलना पसंद किया और उन्होंनेेेे जनता से एकदम साफ शब्दों में कहाकि हम कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं वहीं विपक्ष भारतबंद कर रहा है। पीएम मोदी की बातांे का पूरे देश की जनता में व्यापक असर हुआ और आक्रोश दिवस व भारतबंद पूरी तरह से फ्लाप हो गया। नोटबंदी के मामले में पूरा विपक्ष सड़क से संसद तक हंगामा तो कर रहा है लेकिन जनता उनका साथ नहीं दे रही है। जनता बड़े आराम से धैर्य के साथ पंक्तिबद्ध होकर सरकार का सहयोग कर रही है। देश में फिलहाल कहीं अराजकता नहीं हैं, कहीं दंगे का वातावरण नहीं हैं लेकिन विपक्षी दल व माननीय सर्वोच्च न्यायालय को देश के हालात बेहद खराब नजर आ रहे हैं।
देश के राजनैतिक परिदृश्य व सामाजिक परिवेश में एक बहुत बड़ा बदलाव महसूस किया जा रहा है। घोर वामपंथी राज्यों में भी बंद फ्लाप हो गया । एक समय था जब वामदलों की एक आवाज से ही पूरा दक्षिण भारत व बंगाल पूरी तरह से बंद हो जाता था। तब मीडिया बिलकुल अगल तरह से भारत बंद आदि को पेश करता था। लेकिन इस बार तो सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि स्वयं वामपंथी दलों के कार्यालयों के बाहर लगने वाली दुकानें व व्यापारिक प्रतिष्ठान भी पूरी तरह से खुले रहे। वामपंथ प्रभावित राज्योें में कहीं भी अराजकता व भय का वातावरण नहीं था। बिहार में ट्रेनों का संचालन बाधित करने का प्रयास अवश्य किया गया। वामपंथी दलों की राज्य इकाईयां भले ही अपने हाईकमानों को खुश करने के लिये झूठा प्रेसनोट जारी कर रही हों कि बंद पूरी तरह से सफल रहा लेकिन वास्तव में हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। सोशल मीडिया में भी बंद का पुरजोर विरोध किया गया था। जिसमें यह भी कहा जा रहा था कि जो व्यापारी अपनी दुकानें बंद रखेगा उसको बाद में कालेधन का समर्थक माना जायेगा और उसकी दुकान से कोई सामान नहीं खरीदा जायेगा। वही बंद विफल होने के बाद विरोधी दल यह भी तर्क देने में लग गये हैं कि एक ओर तो अधिकांश व्यापारी वर्ग नोटबंदी के कारण परेशान है तथा काफी नुकसान उठा रहा है। इसके कारण ही उसने फिलहाल भारत बंद का समर्थन नहीं किया।
वहीं दूसरी ओर वामपंथी दलों के बुजुर्ग नेता यह बात समझ गये हैं कि बंद पूरी तरह से विफल रहा है। बुजर्ग वामपंथी नेता विमान बोस का कहना है कि #भारतबंद को लेकर हमारी रणनीति पूरी तरह से विफल व फ्लाप रही है। उनका कहना है कि हम लोगों ने समझा था कि नोटबंदी पर जनता हमारे साथ है। वामपंथी दलों की यह सोच एक बुरा सपना बन गयी है। उन्हंे अच्छी तरह से समझ लेना चाहिये कि अब देश बदल रहा है। देश अब पुरानी परिपाटी की राजनीति पर नहीें चलने वाला है। कांग्रेस व अन्य क्षेत्रीय दलों का कोई असर नहीं पड़ा। यदि देखा जाये तो नोटबंदी पर विपक्ष की कोई एकराय ही नहीं है। बिहार में नोटबंदी पर मुख्यमंत्री नीतिश कुुमार पूरी तरह से पीएम मोदी का समर्थन कर रहे हैं। उनके रूख के कारण बिहार में महागठबंधन में दरार दिखलायी पड़ रही है। नीतिश की पार्टी जद (यू ) में ही दो फाड़ दिखलायी पड़ रहे हैं। राज्यसभा संासद शरद यादव नोटबंदी के खिलाफ है। देश के पांच मुख्यमंत्री नोटबंदी का समर्थन कर चुके हैं। केवल बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही इस पूरे प्रकरण को उठा रही हैं तथा विपक्षी एकता का प्रयास कर रही हैं। उप्र की बसपा नेत्री मायावती व समाजवादी दल पूरी तरह से आक्रोशित तो हैं लेकिन उप्र की जनता ने बंद व आक्रोश दिवस पर साथ नहीं दिया है।
उप्र में इस दौरान कई जिलों से खबरें आ रही हैं कि कांग्रेसियों ने प्रदर्शन के दौरान नोटों को जलाया भी है। इस पर सोशल मीडिया में व्यापक प्रतिक्रिया आ रही है कि यह कांग्रेसी जाली नोटों व कालेधन को ही जलाकर व बहाकर अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं। विपक्ष पूरी तरह से कन्फ्यूज हो गया है। लेकिन वामपंथी अपनी हकीकत को पहचानने में कुछ सीमा तक सफल रहे हैं। लेकिन फिर भी वह जनता के बीच आक्रोशित ही रहेंगे। अभी बंगाल व केरल से उनका वर्चस्व समाप्त हुआ है अब बस त्रिपुरा की बारी हैं। बंद व दिवस से साफ पता चल रहा है कि अब देश की जनता पुरानी परिपाटी और व्यवस्था से उब चुकी है तथा वह व्यापक बदलाव चाह रही है। यही कारण है कि वह अब देशहित व बदलाव की चाहत में पीएम मोदी को 50 दिन देने के लिए तैयार हो गयी है। लेकिन यही बात विरोधी दलों को रास नहीं आ रही है।
राजनैतिक विश्लेषकों का अनुमान था कि नोटबंदी का भाजपा की चुनावी राजनीति पर व्यापक असर पड़ेगा और भाजपा आने वाले सभी चुनावों में हारेगी लेकिन फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा है। अभी उपचुनावों में भाजपा अपनी सीटें जीतने में सफल रही तथा महाराष्ट्र के निकाय चुनाव जो पूरी तरह से नोटबंदी के बाद ही हुये थे में भाजपा की लहर चली। इन चुनावों में भाजपा ने शरद पवार के गढ़ को ध्वस्त करने में कामयाबी हासिल की है। महाराष्ट्र के निकाय चुनाव वहां की सरकार का लिटमस टैस्ट भी था जिसमें मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस की लोकप्रियता का पैमाना भी तय हाना थ जिसमें वह सफल हो गये हैं। हालांकि यह चुनाव #भाजपा – #शिवसेना ने मिलकर लड़ा था। शिवसेना नोटबंदी का लगातार विरोध कर रही है और सामना के संपादकीय में मोदी सरकार पर तीखे तंज भी कस रही है। फिलहाल वहां पर भाजपा काफी मजबूत हुयी है तथा अब वह अपनी इस सफलता को आगामी चुनावों में भुनाने की कोशिश अवश्य करेगी। अगर पीएम मोदी 50 वें दिन स्थिति को पूरी तरह से संभालने मंे कामयाब हो जाते हैं तब उनकी आगे की राह और असान हो जायेगी।नोटबंदी के फैसले के बाद गुजरात के स्थानीय निकय चुनावांेंदो नगर निगमों और एक तालुक पंचायत पर पर कब्जाकर लिया। विभिन्न नगर निगमों , तालुक और जिला पंचायतों में हो रही मतगणना में भी बीजेपी 31 में से 23 सीटांे पर आगे चल रही थी। बीजेपी ने बलसाड जिले के वापी नगर निगम में 44 में से 41 सीटों पर कब्जा जमाया है। इन स्थानी निकाय चुनावों में कांग्रेस के खाते में केवल तीन सीटें ही आ सकीं। इसी तरह सूरत के कनकपुर – कानसाड नगर निगम में भाजपा ने विरोधियों का सफाया करर दिया है।यहां पर 28 में से 27 सीटों पर जीत हासिल की है।गोंडाल तालुक पंचायत सीट पर भी भाजपा ने कब्जा किया। यहां पर 22 में से 18 सीटों पर सफलता प्राप्त की है। यह पंचायत पहले कांग्रेस के पास थी। इस जीत से भाजपा में उत्साह का आलम है। अब वह पूरी ताकत के साथ यह बता रही है कि जनता #नोटबंदी के साथ है और विपक्षी दल #कालेधन और भ्रष्टाचार के साथ।

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