नोट बंदी : विकास की तरफ बढ़ते भारत के कदम

करीब 35 हजार करोड़ का कालाधन बाहर आ चुका है। कश्मीर में सुरक्षा बलों पर होने वाले पथराव पर रोक लगी है। इससे यह जाहिर है कि अलगाववादी या पाकिस्तान एजेंट पांच-पांच सौ देकर युवकों को पथराव के लिए प्रेरित करते थे। यहां तक कि नक्सली आतंकी भी कह रहे है कि नोटबंदी का गरीबों के हित में निर्णय है और वे समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का मन बना रहे है। जनता के लिए कल्याणकारी योजनाएं लागू हुई है।

notebandiभ्रष्टाचार को बढ़ावा देगा भारत बंद
सुरेश हिन्दुस्थानी
यह बात सौ प्रतिशत सत्य है देश ने विकास के रास्ते पर कदम बढ़ाना प्रारंभ कर दिए हैं। केन्द्र सरकार ने नोट बंदी करके चारों दिशाओं में फैली भ्रष्टाचारी अव्यवस्था पर करारी चोट की है। इससे जहां अवैध रुप से कमाई करने वालों पर तुषारापात हुआ है, वहीं आम जनता के लिए प्रगति के द्वार खुलते हुए दिखाई दे रहे हैं। #नोटबंदी से पहले हर विपक्षी राजनीतिक दल के निशाने पर केन्द्र सरकार रही थी, इसके बाद भी विपक्ष ने सत्ता पक्ष को दोषी बताने की हर कार्यवाही की है। विपक्ष ने हमेशा ही कभी कालेधन के मुद्दे पर तो कभी विदेश यात्राओं को लेकर केन्द्र सरकार के मुखिया नरेन्द्र मोदी को आड़े हाथ लिया, लेकिन नोट बंदी के बाद ऐसे आरोप लगाने वालों की बोलती बंद हो गई है। सर्वे संस्थाओं द्वारा किए गए सर्वे में भी यह साफ हो गया है कि नोट बंदी का कदम काले धन पर लगाम लगाने का सबसे सटीक कदम है। इतना ही नहीं देश की जनता ने इस कदम का पूरा समर्थन किया है। विरोध केवल वही लोग कर रहे हैं, जो सरकार के विरोध में हैं। उन्हें तो केवल सरकार के विरोध करने का बहाना चाहिए। जहां तक हमारे देश के विरोधी दलों की बात है तो यह कहना तर्कसंगत होगा कि उन्हें केवल सरकार को घेरने का बहाना चाहिए। पहले वह काले धन लाने के मुद्दे पर सरकार को घेर रहे थे, जब सरकार ने काले धन को बाहर निकालने और उसे रद्दी करने का उपक्रम प्ररंभ किया तो इन्ही राजनीतिक दलों ने फिर से केन्द्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने का निरर्थक प्रयास किया है। मेरी समझ में एक बात नहीं आ रही कि विपक्ष आखिर चाहता क्या है। क्या वह देश में ऐसी सरकार चाहता है कि वह विदेशी संकेत पर काम करे, अगर ऐसा है तो यह देश के लिए अत्यंत ही घातक कदम कहा जा सकता है। आज देश की जनता इस बात को भलीभांति समझ रही है कि कौन सा कदम देश के हित में है और कौन सा विरोध में। इसलिए वर्तमान में राजनीतिक दलों को यह भ्रम लगभग छोड़ देना चाहिए कि वह जनता को भ्रमित कर सकते हैं।

विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा सरकार की नोट बंदी के विरोध में बाजार बंद का आह्वान किया है। इस बाजार बंदी के आह्वान का सोशल मीडिया पर देश की की जनता ने कई गम्भीर सवाल उठाए हैं। यहाँ तक कि भारत बन्द के इस अभियान का भारत की जनता ने शत प्रतिशत विरोध ही किया है। हजारों में एक दो समर्थन की पोस्ट केवल राजनेताओं की ही होती है। जब सोशल मीडिया पर भारत बंद का जबरदस्त विरोध किया जा रहा है, तक कांग्रेस सहित अन्य विरोधी दलों को देश की जनता की आवाज पर भी ध्यान देना चाहिए। इन दलों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि एक समय देश भ्रष्टाचार से बुरी तरह से प्रताड़ित हो चुका है। अब जब सरकार ने #कालेधन और #भ्रष्टाचार के लिए अभियान चलाया है तो देश की जनता के साथ राजनीतिक दलों को भी इसका समर्थन करना चाहिए। सोशल मीडिया पर नोट बंदी पर जो भी पोस्ट दिखाई दे रही है। उनमें हर कोई भारत बंद का विरोध करता दिखाई दे रहा है, यहां तक कि लोग अपने मित्रों से यह भी कह रहे हैं कि मेरा जो भी मित्र भारत बंद का समर्थन कर रहा है, वह मुझे मित्र सूची से हटा दे, क्योंकि मैं राष्ट्रभक्त होने के कारण भारत बंद का विरोध करता हूँ।
देश के राजनीतिक दलों द्वारा वर्तमान केन्द्र सरकार के बारे में यह प्रश्न हमेशा चर्चा में रहता है कि मोदी सरकार के आने के बाद सामाजिक, आर्थिक और सुरक्षा की दृष्टि से क्या बदलाव हुए हैं। उनके लिए सरकार की नोट बंदी उचित जवाब हो सकता है कि भाजपा और स्वयं नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रवादी नीतियों को घोषित करते हुए जनता का समर्थन प्राप्त किया है। राष्ट्रवाद का आशय यही है कि देश की एकता व अखंडता एवं सुरक्षा के साथ जनता के कल्याण के लिए सरकार का ध्यान केंद्रित रहे। इस संदर्भ में मोदी सरकार  द्वारा की गई पहल की समीक्षा की जा सकती है। देश में अलगाववादी आतंकवादी और देश विरोधी तत्व है, उनके खिलाफ कड़ाई से कार्रवाई की जा रही है। सीमा का अतिक्रमण कर भारत में हिंसा करने वालों का सफाया किया जा रहा है। यही नहीं दुश्मनी करने वाले पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई की गई। इसके साथ ही कश्मीर के अधिकांश अलगाववादी नेता जेल में है। सुरक्षा को सुदृढ़ करने एवं सेना की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए आधुनिक हथियार उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
सीमा पार से होने वाले आतंकवाद को हवा देने का काम करने वाली ताकतों का भंडाफोड़ करने वाली केन्द्र सरकार के अभियान के बाद हमारे देश में ही ऐसे बयान दिए जा रहे हैं कि जैसे वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हों। भारतीय राजनेताओं के ऐसे बयान निसंदेह आतंकी बनाने के लिए भारतीय युवकों को प्रेरित करते हैं। सरकार द्वारा उनके खिलाफ न केवल कार्रवाई की जा रही है बल्कि उनको मोटी रकम देने वालों को भी रोका जा रहा है। इसका ताजा उदाहरण विवादित इस्लामिक उपदेशक नाइक जो आतंकवादी बनने के लिए मुस्लिम युवकों को प्रेरित करता रहा है। उसके खिलाफ अपराधिक मामला दर्ज कर उसके एनजीओ इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के खिलाफ कार्रवाई प्रारंभ हो गई है। इस संदर्भ में जानना होगा कि जाकिर नाइक के भाषणों पर मलेशिया, ब्रिटेन और कनाडा में प्रतिबंध है। उसके विदेशी फंडिंग की जांच की जा रही है। उसके बारह ठिकानों पर छापे मारे गए हैं। इसी प्रकार पुराने पांच सौ, एक हजार की नोट बंदी से चाहे लोगों को थोड़ी बहुत असुविधा हुई हो, लेकिन उसके अच्छे परिणाम भी सामने आने लगे हंै। करीब 35 हजार करोड़ का कालाधन बाहर आ चुका है। कश्मीर में सुरक्षा बलों पर होने वाले पथराव पर रोक लगी है। इससे यह जाहिर है कि अलगाववादी या पाकिस्तान एजेंट पांच-पांच सौ देकर युवकों को पथराव के लिए प्रेरित करते थे। यहां तक कि नक्सली आतंकी भी कह रहे है कि नोटबंदी का गरीबों के हित में निर्णय है और वे समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का मन बना रहे है। जनता के लिए कल्याणकारी योजनाएं लागू हुई है। वेतनवृद्धि से हर छोटा-बड़ा सरकारी कर्मचारी लखपति की कतार में खड़ा दिखाई दे रहा है। चारों ओर मोदी-मोदी की गूंज सुनाई देती है। देश में चारों ओर विकास का आलोक दिखाई देता है।

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