लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

भारत के समक्ष परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता हासिल करने का एक और अवसर अगले माह आ रहा है। जून 2017 में स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में एनएसजी देशों की बैठक होगी। इसे लेकर भारत ने रूस से आक्रामकता के लहजे में कहा है कि वह चीन पर पर्याप्त दबाव डालते हुए भारत को एनएसजी की सदस्यता हासिल कराने में मददगार बने। इसके बदले में कुडनकुलम परमाणु संयंत्र की दो नई ईकाईयों का सौदा भारत से कर ले। अन्यथा भारत को विवश होकर परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए विदेशी सहयोग को दरकिनार करके, स्वदेशी तकनीक विकसित करनी होगी। हालांकि 48 देशों के इस समूह में रूस भारत का समर्थक है, किंतु चीन का घनिश्ठ सहयोगी होने के नाते रूस चीन पर पर्याप्त दबाव नहीं बना पा रहा है। चीन की ‘वन बेल्ट-वन रोड‘ (ओबीओआर) परियोजना में भी रूस महत्वपूर्ण भागीदार है। प्रधानमंत्री मोदी के तीन साल के कार्यकाल में यह पहला अवसर है, जब भारत ने अपना हित साधने के लिए रूस जैसे ताकतवर देश को दो टूक षब्दों में चेताया है।

पिछले साल जून-2016 में दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में हुई बैठक में भारत को इस समूह में शामिल करने पर गंभीरता से विचार हुआ था, लेकिन चीन ने यह कहते हुए रोड़ा अटका दिया था कि भारत ने अब तक परमाणु निरस्त्रीकरण संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए है। दरअसल चीन की मंशा है कि भारत के साथ उसके मित्र देश पाकिस्तान और ईरान को भी यह सदस्यता मिले। इन दोनों देशों ने भी एनपीटी पर दस्तखत नहीं किए हैं। चीन का अब भी यही रुख बरकरार है। इसीलिए भारत ने अपने कूटनीतिक प्रयास तेज करते हुए रूस को पैंतरेबाजी दिखानी पड़ी है। 1 जून से नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा के दौरान वहां के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ होने वाली बातचीत में यह मुद्दा मजबूती से उठना तय है। इसी क्रम में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने भी इस पूर्ण अधिवेशन में हिस्सा लेने वाले सभी सदस्य देशों से वार्ता शुरू कर दी है।

रूस के जरिए चीन को साधने के लिए विदेश मंत्रालय ने हाल ही में अपनी रणनीति को ठोस व व्यावहारिक रूप दिया है। मोदी की रूस यात्रा का अजेंडा तय करने के लिए विदेश मंत्री सुशमा स्वराज और भारत यात्रा पर आए रूस के उप प्रधानमंत्री दमित्री रोगोजिन के बीच मुलाकत में एनएसजी पर चीन का रुख और कुडनकुलम परमाणु बिजली परियोजना की ईकाई 5 और 6 पर समझौते के परिप्रेक्ष्य में बातचीत हुई। लेकिन रोगोजिन ने कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया। नरेंद्र मोदी से भी रोगोजिन की बातचीत में इस मुद्दे को उठाया गया। परंतु बातचीत बेनतीजा रही। भारत का तर्क है कि एनएसजी की सदस्यता में रोड़ा अटकने से हम इस संयंत्र के लिए स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकसित करने को मजबूर होंगे। रूस के सहयोग से तमिलनाडू में स्थापित इस परियोजना की दो ईकाईयों से ऊर्जा का उत्पादन शुरू हो गया है। दो निर्माणाधीन हैं और दो के लिए रूस से अनुबंध होना है। इसलिए भारत ने अवसर का लाभ उठाने की दृष्टि से रूस के साथ यह पैंतरा खेला है। भारत को उम्मीद है कि यदि रूस पर्याप्त दबाव बनाता है तो चीन के रुख में परिवर्तन आ सकता है। हालांकि चीन के राजदूत लुओ झाओहुइ ने पिछले महीने स्पष्ट किया है कि एनएसजी की सदस्यता के लिए भारत की कोशिशों के प्रति चीन के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है।

एनएसजी का सदस्य बनने की प्रक्रिया में स्विट्जरलैंड, अमेरिका, फ्रांस और मैक्सिको ने भारत को रचनात्मक सहयोग देने का वचन दिया है। यदि भारत को एनएसजी की सदस्यता मिल जाती है तो भारत की ऊर्जा संबंधी जरूरतें तो पूरी होंगी ही, साथ ही वह परमाणु शक्ति संपन्न देश कहलाने लग जाएगा। हालांकि चीन की तरह स्विट्जरलैंड और मैक्सिको भी खिलाफत कर रहे थे, क्योंकि भारत ने फिलहाल परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत नहीं किए हैं। दरअसल 2008 में हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग समझौते के तहत भारत को इस समूह में शामिल करने पर सहमति बन गई थी। इसलिए जिन देशों ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ;आईएईए में उक्त समझौते को स्वीकृति दी थी, उनका नैतिक दायित्व बनता है कि वे एनएसजी में भारत के पक्ष में खड़े दिखाई दें। ब्रिटेन, रूस और फ्रांस पहले से ही भारत के समर्थन में हैं। अब अकेला चीन है, जो भारत का खुलेआम विरोध कर रहा है।

दरअसल चीन के अपने स्वार्थ हैं। चीन अपने परमाणु कारोबार को बड़े स्तर पर फैलाना चाहता है। पिछले दो दशक में वह अनेक परमाणु इकाइयां भी स्थापित कर चुका है। गोया, भारत यदि परमाणु संपन्न शक्ति के रूप में उभर आता है तो चीन का परमाणु बाजार प्रभावित होगा। इसलिए चीन कह रहा है कि भारत के साथ-साथ पाकिस्तान और ईरान को को भी एनएसजी की सदस्यता दी जाए। दरअसल चीन की अंदरूनी मंशा पाकिस्तान में अपने परमाणु केंद्र स्थापित करने की है। इस लिहाज से अमेरिका समेत आतंकवाद विरोधी देशों की आषंका है कि पाक जिस तरह से आतंकवाद की गिरफ्त में है, उसके मद्देनजर पाक को एनसीजी का सदस्य बनाया जाना, दुनिया के भविष्य के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकता है। यह खतरा इसलिए भी हैं, क्योंकि बीते समय पाकिस्तान परमाणु तस्करी का केंद्र रहा है। 2004 में पाक वैज्ञानिक एक्यू खान के गिरोह द्वारा उत्तरी कोरिया और लीबिया को परमाणु सामग्री की तस्करी करने का खुलासा हुआ था। जबकि एनएसजी का मकसद परमाणु हथियारों का प्रसार नियंत्रित करना है। लिहाजा संदिग्ध चरित्र के पाकिस्तान को विपरीत प्रकृति की अंतरराष्ट्रीय महत्व की संस्था की सदस्यता कैसे दी जा सकती है ? हालांकि इस परिप्रेक्ष्य में चीन का चरित्र भी पाक-साफ नहीं है। दुर्भाग्य से यही देश भारत की सदस्यता में इसलिए बाधा हैं, क्योंकि नए देश की सदस्यता का निर्णय बहुमत के समर्थन की बजाय सर्वसम्मति से होता है। लिहाजा कोई एक सदस्य देश भी विरोध करता है तो नए देश की सदस्यता खतरे में पड़ जाती है। चीन यह कुटिल नीति इसलिए भी अपना रहा है, क्योंकि यदि भारत के साथ पाकिस्तान की सदस्यता संभव नहीं होती है तो पाकिस्तान की सदस्यता भारत विरोध के चलते हमेशा के लिए खटाई में पड़ जाएगी ? न्यूजीलैंड ने भी भारत को पूरा भरोसा नहीं दिया है। हालांकि मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री जाॅन की इस संदर्भ में संवाद बना चुके है। तुर्की समर्थन तो कर रहा है, लेकिन उसकी मंशा है कि पाकिस्तान को भी भारत के साथ सदस्य बना लिया जाए। इस बैठक से पहले मोदी जर्मनी और स्पेन जाने वाले हैं, वहां द्विपक्षीय वार्ता के साथ इस मुद्दे पर भी बातचीत होगी।

इस सब के बावजूद जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर भारत को परमाणु ऊर्जा संपन्न देश बनाया जाना इसलिए जरूरी है, जिससे कार्बन उत्सर्जन की कटौती में भारत की भूमिका रेखांकित हो। दरअसल औद्योगिक विकास के साथ-साथ भारत की ऊर्जा संबंधी जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। ऊर्जा के क्षेत्र में बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाते हुए मोदी सरकार सौर ऊर्जा के क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रही है। बावजूद भारत की डीजल और पेट्रोल पर निर्भरता अत्याधिक है, गोया एनएसजी की सदस्यता मिल जाती है तो भारत की ऊर्जा संबंधी बड़ी जरूरतें परमाणु ऊर्जा की उपलब्धता से पूरी होने लग जाएंगी।

 

 

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