लेखक परिचय

डा. अरविन्द कुमार सिंह

डा. अरविन्द कुमार सिंह

उदय प्रताप कालेज, वाराणसी में , 1991 से भूगोल प्रवक्ता के पद पर अद्यतन कार्यरत। 1995 में नेशनल कैडेट कोर में कमीशन। मेजर रैंक से 2012 में अवकाशप्राप्त। 2002 एवं 2003 में एनसीसी के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। 2006 में उत्तर प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ एनसीसी अधिकारी के रूप में पुरस्कृत। विभिन्न प्रत्रपत्रिकाओं में समसामयिक लेखन। आकाशवाणी वाराणसी में रेडियोवार्ताकार।

Posted On by &filed under आर्थिकी, जन-जागरण.


 
डा. अरविन्द कुमार सिंह
अध्यापन और सेना की नौकरी को आज भी मूल्यपरक व्यवसाय के रूप में देखा जाता है। क्या आज के दौर में युवा वर्ग अपने आप को नैतिक मूल्यो के निर्वहन में असर्मथ पा रहा है? या अर्थ के आर्कषण ने उसे नैतिक मूल्यो के व्यवसाय के प्रति विमुख कर रख्खा है? अधिकंाश युवाओं की रूची अब अध्यापन या सेना की नौकरी में नहीं रही। अध्ययन तो वो अच्छे से अच्छे अध्यापको से करना चाहते है पर उनके जैसा बनना नही। इस बिन्दू पर अभिवावको की पसन्द युवाओं से बहुत हटकर नही। अजीब विडम्बना है इंसान की। सीता जी जबतक जगंल में थी तबतक उन्हे सोने का हिरण चाहिये था पर जब वही सीता सोने की लंका में चली गयी तो उन्हे सोने से ज्यादा राम का आभाव खटकने लगा। आखिर ऐसा क्यो?
कुछ ऐसे ही प्रश्नो का उत्तर हमने विभिन्न वैचारिक तबको के बीच खोजने का प्रयास किया। यह संपूर्ण लेख इस दिशा में गहन शोध का दावा तो नही करती पर प्रश्नो के उत्तर के करीब पहुचने का प्रयास जरूर करती है।
वाराणसी स्थित उदय प्रताप इण्टर कालेज के त्रिदिवसीय शैक्षिक पैनल निरीक्षण का आखिरी दिन था। 19 दिसम्बर को विद्यालय निरीक्षण के सन्दर्भ में जिला विद्यालय निरीक्षक श्री अवध किशोर सिंह उदय प्रताप कालेज के एक विज्ञान की कक्षा में पहुॅचे। श्री सिंह भौतिक विज्ञान पर अच्छी पकड रखते है। भौतिक विज्ञान के सवालो के दायरे से बाहर निकलकर आपने बच्चो से जानना चाहा कि आप पढाई पूरी कर क्या बनना चाहते है। हर व्यवसाय के प्रति रूझान का उत्तर तो आया पर किसी बच्चे ने अध्यापक बनने की बात नही कही। इस पेशे के प्रति बच्चो की बेरूखी का सबब श्री सिंह ने अध्यापको की बैठक में जानना चाहा।
मेरे एक अध्यापक मित्र ने मुझसे कहा – ‘‘ डा. साहब, यह जिद क्यो कि बच्चा अध्यापक ही बने’’। मैने कहा – सवाल अध्यापक ही बनने की जिद का नही, सवाल किसी लडके का अध्यापक बनने में दिलचस्पी के न होने का है।
और इस बिन्दू पर मुझे लगा इस प्रश्न का उत्तर उन्ही के बीच तलाशा जाय जो इससे सीधे तौर पर प्रभावित होते है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ज्यादा बेहतर स्थान इस प्रश्न के उत्तर के लिये और कहाॅ हो सकती थी।
स्थान काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के जोधपुर कालोनी स्थित श्रीवास्तव की चाय की दुकान। समय प्रातः 9.30 बजे दिन। दिन रविवार। छात्र, राजा राम मोहन राय छात्रावास के। ज्यादातर छात्र एम. ए. प्रोफेसनल सोशल वर्क के । अनिरूद्ध यादव पीस मैनेजमेन्ट से अध्ययन कर रहे है। जबाव देने में काफी मुखर। प्रश्न सुनते ही प्राथमिक पाठशाला के अध्यापको के रवैये पर सवालिया निशान खडा करते है। उनका कहना था ‘‘ वर्तमान शिक्षा प्रणाली को हम नकार तो नही सकते आप ही बतलाये यदि ऐसा नही होता तो अन्य व्यवसायों में अच्छे लोग आखिरकार कहाॅ से जाते। सरकार ने अध्यापको की नौकरियों पर रोक लगा रखी है क्या युवा इन नौकरियो के लिये रूका रहे?‘‘। उनका दर्द भाई – भतीजावाद को लेकर भी था। कुमारी अंकिता वशिष्ठ का कहना था – ’’ आज का युवा सम्मान का भूखा है। अध्यापन का व्यवसाय अब सम्मान का द्ययोतक नही रहा, मुझे पूरी विनम्रता से कहने दे इसके जिम्मेदार स्वंय अध्यापक ही है, ऐसे में यदि युवा नीली बत्ती वाली नौकरियों के प्रति आर्कषित हो रहा है तो आश्चर्य कयों?‘‘
ब्रिजेश कुमार मिश्रा ने अलग हटकर अपनी बात रखी। ‘‘ आज का दौर आर्थिक युग का दौर है। कौन नही चाहता उसके पास अपने सपनो को पूरा करने के लिये ढेर सारा पैसा हो। ऐसे में व्यवसायों में आर्थिक आर्कषण को नकारने की बात इस युग का सबसे बडा झूठ होगा।‘‘
मितेन्द्रिय रोहिताश ने दार्शनिक अंदाज में अपनी बात रखी – ‘‘ सिर्फ चाहने से काई अध्यापक बन जायेगा , मुझे ऐसा नही लगता, सम्पूर्ण हिन्दूस्तान में यह शोध का विषय होगा कि अपनी पसन्द का नौकरी पाने वालो का प्रतिशत कितना है। बेरोजगारी के दबाव के आलम में सच तो यह है पैसा देकर जो नौकरी मिल जाय, दाल रोटी के लिये वही बहुत है।’’
गोविन्द केशरी ने इस प्रश्न के उत्तर को अध्यापको के पाले में ही डाल दिया – ‘‘ एक छात्र गीली मिट्टी के समान है। उसे राम बना लो या रावण, उसे फर्क नही पडता। इसकी कमान तो उस गुरू रूपी कुम्हार के हाथों में है, जिसमें सृजन की विलक्षण प्रतिभा है।’’ मेरे गिलास की चाय खत्म हो चुकी थी।
मैं जगमोहन सिंह राजपूत, पूर्व निदेशक एनसीईआरटी के इन पंक्तियों का अर्थ इन बच्चो के वक्तव्यों में तलाशता हुआ वहाॅ से रवाना हुआ, जिसे उन्होने अपने एक लेख में लिखा था – ‘‘ उच्च शिक्षा का क्या अर्थ है, जो व्यक्ति को मानव मूल्यों, कर्तव्यों, सामाजिक सरोकारो तथा जीवन के अध्यात्मिक लक्ष्यों से परिचित न कराए?’’ आज के आर्थिक युग में मूल्यों को तलाशना नयी दुनिया को खोजने के बराबर है।
व्योमेश चित्रवंश पेशे से वकील है, जनाब पत्रकारिता का भी  शगल रखते है। जब इस प्रश्न को मैने मोबाईल के माध्यम से इनसे पूछा तो बडे बेबाकी से आपका जबाव था -‘‘ सच तो ये है आज का युवा नैतिक मूल्यों के निर्वहन में विश्वास नहीं रखता । अध्यापन समाज में नैतिक मूल्यो को स्थापित करने वाले पेशे के रूप में देखा जाता है। यही स्वरूप सेना की नौकरी का भी है। अगर प्राईवेट सेक्टर में पैसा अच्छा मिलता हो, सम्मान हो और जान का खतरा भी कम हो  तो आप ही बताईये युवाओं को कौन सी नौकरी पसन्द करनी चाहिये?‘‘ आपने बडी बेबाकी से अपना ही उदाहरण दिया – ‘‘ अब मुझे ही देख लिजिए, झूठ को सच और सच को झूठ साबित करने का पेशा है हमारा। मूल्य सिर्फ क्लाjobएन्त के प्रति वफादारी का है। आप चाहे तो इसे हमारा नैतिक मूल्य भी कह सकते है।‘‘
एक छोटे से प्रश्न ने हमारे समक्ष उत्तरो का बरगद खडा कर दिया और मैं था कि उस प्रश्न का ही उत्तर खोज रहा था –
अजीब विडम्बना है इंसान की। सीता जी जबतक जगंल में थी तबतक उन्हे सोने का हिरण चाहिये था पर जब वही सीता सोने की लंका में चली गयी तो उन्हे सोने से ज्यादा राम का आभाव खटकने लगा। आखिर ऐसा क्यो?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *