बुढ़ापा


बचपन का अंजाम बुढ़ापा |
है जीवन की शाम बुढ़ापा |

       यदि कर्म अच्छे होते तो ,
      अक्सर  आता काम बुढ़ापा |

       किन्तु जवानी व्यर्थ गई तो ,
       हो जाता बेकाम बुढ़ापा |

       बचपन पैदा हो जाना है,
       मर जाने का नाम बुढ़ापा |

       काम क्रोध में लगे रहे तो,
       बन जाता गुमनाम बुढ़ापा |
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प्रभुदयाल श्रीवास्तव
लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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